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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

पातजल-योगसूत्र-२ १९९

Page 216Permalink

पातजल-योगसूत्र-२ १९९

दूसरे मे परिणत हो जाता है और इनसे संसार मे कोई भी अछूता नही रहता—ये सबके पास आते हैं। वे विवेकी पुरुष देखते है कि मनुष्य सारा जीवन मृगजल के पीछे दौड़ता रहता है और कभी अपनी वासनाओ को पूर्ण नही कर पाता। एक समय महाराज युधिष्ठिर ने कहा था, 'जीवन मे सबसे आश्चर्य-जनक घटना तो यह है कि हम प्रतिक्षण प्राणियो को कालकवलित होते देखते हैं, फिर भी सोचते है कि हम कभी नही मरेंगे।' चारो ओर मूर्खो से घिरे रहकर हम सोचते है कि हमी एकमात्र पण्डित है। चारो ओर सब प्रकार की चचलता के दृष्टान्तो से घिरे रहकर हम सोचते है कि हमारा प्यार ही एकमात्र स्थायी प्यार है। यह कैसे हो सकता है ? प्यार भी स्वार्थपरता से भरा है। योगी कहते हैं, 'अन्त में हम देखेंगे कि दोस्तो का प्रेम, सन्तान का प्रेम, यहाँ तक कि पति-पत्नी का प्रेम भी धीरे-धीरे क्षीण होकर नाश को प्राप्त हो जाता है।' नाश ही इस ससार का धर्म है—वह किसी भी वस्तु को अछूता नही रखता। जब मनुष्य ससार की समस्त वासनाओ मे, यहाँ तक कि प्यार में भी निराश हो जाता है, तभी मानो आश्चर्यचकित के समान वह समझ पाता है कि यह ससार भी कैसा भ्रम है, कैसा स्वप्न के समान है। तभी वैराग्य की एक किरण उसके हृदय मे फैलती है, तभी वह जगदातीत सत्ता की मानो थोड़ीसी झलक पाता है। इस ससार को छोडने पर ही पारलौकिक तत्त्व हृदय मे उद्भासित होता है, इस ससार के सुख में आसक्त रहते तक यह कभी सम्भव नही होता। ऐसे कोई महात्मा नही हुए, जिन्हे यह उच्चावस्था प्राप्त करने के लिए इन्द्रिय-सुख-भोग त्यागना न पड़ा हो। दुःख का कारण है—प्रकृति की विभिन्न शक्तियो का