राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा
पातंजल-योगसूत्र १७३
पातंजल-योगसूत्र १७३
का अर्थ मात्र प्रकाशित करती है, तब उसे निर्वितर्क अर्थात् वितर्कशून्य समाधि कहते हैं।
व्याख्या—पहले जिस शब्द, अर्थ और ज्ञान की बात कही गई है, उन तीनो का एक साथ अभ्यास करते-करते एक समय ऐसा आता है, जब वे और अधिक मिश्रित नही होते, तब हम अनायास ही इन त्रिविध भावो का अतिक्रमण कर सकते है। अब पहले हम यही समझने की विशेष चेष्टा करेगे कि ये तीन क्या हैं। देखो, यह चित्त है। यह हमेशा याद रखना कि चित्त अर्थात् मनस्तत्त्व की उपमा सरोवर से दी गई है और शब्द या वाक्य अर्थात् वस्तु का कम्पन मानो उसके ऊपर एक प्रवाह के समान है। तुम्हारे अपने भीतर ही यह स्थिर सरोवर विद्यमान है। मान लो, मैने 'गाय' शब्द का उच्चारण किया। ज्योही वह तुम्हारे कान में प्रवेश करता है, त्योही तुम्हारे चित्तरूपी सरोवर मे एक प्रवाह उठा देता है। यह प्रवाह ही 'गाय' शब्द से सूचित भाव या अर्थ है। तुम जो सोचते हो कि मै एक गाय को जानता हूँ, वह केवल तुम्हारे मन के भीतर रहनेवाली एक तरग मात्र है। वह बाह्य एव आभ्यन्तर शब्द-प्रवाह की प्रतिक्रिया के रूप मे उत्पन्न होती है। उस शब्द के साथ वह प्रवाह भी नष्ट हो जाता है, वाक्य या शब्द के बिना प्रवाह रह ही नही सकता। तुम पूछ सकते हो कि जब हम गाय के बारे में केवल सोचते हैं, पर बाहर से कोई शब्द कानो में नही पहुँचता, तब भला शब्द कहाँ रहता है ? उत्तर यह है कि तब वह शब्द तुम स्वय करते हो। तब तुम अपने मन-ही-मन 'गाय' शब्द का धीरे-धीरे उच्चारण करते रहते हो, और बस उसी से तुम्हारे भीतर एक प्रवाह आ जाता है। शब्द के इस अन्तर्वेग के बिना कोई प्रवाह नही आ-
| -१७४ | राजयोग |
|---|
-सकता, और जब यह अन्तर्वेग बाहर से नही आता, तब भीतर से ही आता है। शब्द के साथ ही प्रवाह का भी नाश हो जाता है। तब फिर बच क्या रहता है? तब उस प्रतिक्रिया का परिणाम भर बच रहता है। वही ज्ञान है। हमारे मन के अन्दर ये तीनो इतने दृढसम्बद्ध होकर है कि हम उन्हे अलग नही कर सकते। ज्योही शब्द आता है, त्योही इन्द्रियां कम्पित हो उठती है और प्रतिक्रिया के रूप में एक प्रवाह उठ जाता है। ये तीनो क्रियाएँ एक के बाद एक इतनी शीघ्रता से होती है कि उनमे एक को दूसरे से अलग करना अत्यन्त कठिन है। यहाँ जिस समाधि की बात कही गई है, उसका दीर्घकाल तक अभ्यास करने पर समस्त सस्कारो की आधारभूमि स्मृति शुद्ध हो जाती है, और तब हम उनमें से एक-दूसरे को अलग कर सकते हैं। इसी को निर्वितर्क समाधि कहते हैं।
एतयैव सविचारा निर्विचारा च सूक्ष्मविषया व्याख्याता ॥४४॥
**सूत्रार्थ—**पूर्वोक्त दो सूत्रो में सवितर्क और निर्वितर्क जिन दो समाधियों की बात कही गई है, उन्हीं के द्वारा सूक्ष्मतर विषयवाली सविचार और निर्विचार समाधियो की भी व्याख्या कर दी गई है।
**व्याख्या—**यहाँ पहले के ही समान समझना चाहिए। भेद केवल इतना है कि पूर्वोक्त दोनो समाधियो के विषय स्थूल हैं और यहाँ वे विषय सूक्ष्म हैं।
सूक्ष्मविषयत्वं चालिङ्गपर्यवसानम् ॥४५॥
**सूत्रार्थ—**सूक्ष्म विषयों की अवधि प्रधान पर्यन्त है।
**व्याख्या—**पञ्च महाभूत और उनसे उत्पन्न समस्त वस्तुओं को स्थूल कहते हैं। सूक्ष्म वस्तु तन्मात्रा से शुरू होती है। इन्द्रिय, मन (अर्थात् साधारण इन्द्रिय—समस्त इन्द्रियो की