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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

पातंजल-योगसूत्र-२ १८९

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पातंजल-योगसूत्र-२ १८९

जहाँ तक हम जानते हैं, आज जिन क्रियाओं को हम स्वाभाविक या सहज प्रेरणा से उत्पन्न कहते हैं, वे सब पहले विचारपूर्वक ज्ञान की क्रियाएँ थी और अब निम्नभावापन्न होकर इस प्रकार स्वाभाविक हो पड़ी हैं। योगियो की भाषा मे, सहज ज्ञान या सहज प्रेरणा विचार की निम्नभावापन्न क्रमशकुचित अवस्था मात्र है। विचार-जनित ज्ञान अवनतभावापन्न होकर स्वाभाविक सस्कार के रूप मे परिणत हो जाता है। अतएव यह बात पूर्णरूपेण युक्तिसगत है कि हम इस जगत् में जिसे सहज प्रेरणा कहते है, वह विचार-जनित ज्ञान की निम्नावस्था मात्र है। पर चूंकि यह विचार प्रत्यक्ष-अनुभूति बिना नही हो सकता, इसलिए समस्त सहज प्रेरणाएँ पहले की प्रत्यक्ष-अनुभूतियो के फल हैं। मुरगी के बच्चे चील से डरते हैं, बतक के बच्चे पानी पसन्द करते हैं, ये दोनो पहले की प्रत्यक्ष-अनुभूतियो के फलस्वरूप है। अब प्रश्न यह है कि यह अनुभूति जीवात्मा की है, अथवा केवल शरीर की ? बतक अभी जो कुछ अनुभव कर रही है, वह उस बतक के पूर्वजो की अनुभूति से आया है, अथवा वह उसकी अपनी प्रत्यक्ष-अनुभूति है ? आधुनिक वैज्ञानिक कहते है, वह केवल उसके शरीर का धर्म है, पर योगीगण कहते है कि वह मन की अनुभूति है और वह शरीर के भीतर से होकर आ रही है। इसी को पुनर्जन्मवाद कहते हैं।

हमने पहले देखा है कि हमारा समस्त ज्ञान—प्रत्यक्ष, विचारजनित या सहज—एकमात्र प्रत्यक्ष-अनुभूतिरूप ज्ञान की प्रणाली से होकर ही आ सकता है; और जिसे हम सहज ज्ञान या सहज प्रेरणा कहते है, वह हमारी पूर्व प्रत्यक्ष-अनुभूति का फल है, वह पूर्व अनुभूति ही आज अवनतभावापन्न होकर सहज

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प्रेरणा के रूप में परिणत हो गई है और यह सहज प्रेरणा फिर से विचारजनित ज्ञान में परिणत हो जाती है। सारे संसार भर में यही क्रिया चल रही है। इस पर ही भारत में पुनर्जन्मवाद की एक प्रधान युक्ति स्थापित हुई है। पूर्वानुभूत बहुतसे भय के संस्कार कालान्तर में इस जीवन के प्रति ममता के रूप में परिणत हो जाते हैं। यही कारण है कि बालक बिलकुल बचपन से ही अपने आप डरता रहता है, क्योकि उसके मन में दुःख का पूर्व अनुभूतिजनित संस्कार विद्यमान है। अत्यन्त विद्वान् मनुष्यो में भी—जो जानते हैं कि यह शरीर एक दिन चला जायगा, जो कहते हैं कि 'आत्मा की मृत्यु नहीं, हमारे तो सैकडो शरीर हैं, अतएव भय किस बात का'—ऐसे विद्वान् पुरुषो में भी, उनकी सारी विचारजनित धारणाओ के बावजूद भी हम इस जीवन के प्रति प्रगाढ ममता देखते हैं। जीवन के प्रति यह ममता कहाँ से आई ? हमने देखा है कि यह हमारे लिए सहज या स्वाभाविक हो गई है। योगियो की दार्शनिक भाषा में कह सकते हैं कि वह संस्कार के रूप में परिणत हो गई है। ये सारे संस्कार सूक्ष्म (तनु) और गुप्त (प्रसुप्त) होकर मन के भीतर मानो सोए हुए पड़े हैं। मृत्यु के ये सब पूर्व अनुभव— वह सब जिसे हम सहज प्रेरणा या सहज ज्ञान कहते हैं—मानो अवचेतन अर्थात् ज्ञान की निम्न भूमि में पहुँच गए हैं। वे चित्त में ही वास करते हैं। वे वहाँ निष्क्रिय रूप से अवस्थान करते हो, ऐसी बात नहीं, वरन् भीतर-ही-भीतर कार्य करते रहते हैं।

स्थूल रूप में प्रकाशित चित्तवृत्तियो को हम समझ सकते हैं और उनका अनुभव कर सकते हैं, उनका दमन अधिक सुगमता से किया जा सकता है। पर इन सब सूक्ष्मतर संस्कारो का

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दमन कैसे होगा ? उन्हें कैसे दबाया जाय ? जब मैं क्रुद्ध होता हूँ, तब मेरा सारा मन मानो क्रोध की एक बड़ी तरंग में परिणत हो जाता है। मैं वह अनुभव कर सकता हूँ, उसे देख सकता हूँ, उसे मानो हाथ में लेकर हिला-डुला सकता हूँ, उसके साथ अनायास ही, जो इच्छा हो वही कर सकता हूँ, उसके साथ लड़ाई कर सकता हूँ, पर यदि मैं मन के अत्यन्त गहरे प्रदेश में न जा सकूँ, तो कभी भी मैं उसे जड़ से उखाड़ने में सफल न हो सकूँगा। कोई मुझे दो कड़ी बातें सुना देता है, और मैं अनुभव करता हूँ कि मेरा खून गरम होता जा रहा है। उसके और भी कुछ कहने पर मेरा खून उबल उठता है और मैं अपने आपे से बाहर हो जाता हूँ, क्रोध-वृत्ति के साथ मानो अपने को एक कर लेता हूँ। जब उसने मुझे सुनाना आरम्भ किया था, उस समय मुझे अनुभव हो रहा था कि मुझमें क्रोध आ रहा है। उस समय क्रोध अलग था और मैं अलग; किन्तु जब मैं क्रुद्ध हो उठा, तो मैं ही मानो क्रोध में परिणत हो गया। इन वृत्तियों को जड़ से—उनकी सूक्ष्मावस्था से ही उखाड़ना पड़ेगा, वे हमारे ऊपर कार्य कर रही है, यह समझने के पहले ही उन पर संयम करना पड़ेगा। संसार के अधिकतर मनुष्यों को तो इन वृत्तियों की सूक्ष्मावस्था के अस्तित्व तक का पता नहीं। जिस अवस्था में ये वृत्तियाँ अवचेतन अर्थात् ज्ञान की निम्न भूमि से थोड़ी-थोड़ी करके उदित होती हैं, उसी को वृत्ति की सूक्ष्मावस्था कहते हैं। जब किसी सरोवर की तली से एक बुलबुला ऊपर उठता है, तब हम उसे देख नहीं पाते; केवल इतना ही नहीं, जब वह सतह के बिलकुल नजदीक आ जाता है, तब भी हम उसे देख नहीं पाते, पर जब वह ऊपर उठकर फट जाता है और एक लहर फैला देता है, तभी हम उसका

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अस्तित्व जान पाते हैं। इसी प्रकार जब हम इन वृत्तियों को उनकी सूक्ष्मावस्था में ही पकड़ सकेंगे, तभी हम उन्हें रोकने में समर्थ हो सकेंगे। उनके स्थूल रूप धारण करने के पहले ही यदि हम उनको पकड़ न सके, उनको संयत न कर सके, तो फिर किसी भी वासना पर सम्पूर्ण रूप से जय प्राप्त कर सकने की आशा नहीं। वासनाओं को संयत करने के लिए हमें उनके मूल में जाना पड़ेगा। तभी हम उनके बीज तक को दग्ध कर डालने में सफल होंगे। जैसे भूने हुए बीज जमीन में बो देने पर फिर अंकुरित नहीं होते, उसी प्रकार ये वासनाएँ भी फिर कभी उदित न होंगी।

ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः ॥१०॥

**सूत्रार्थ—**उन सूक्ष्म संस्कारों को प्रतिप्रसव यानी प्रतिलोम-परिणाम के द्वारा (अर्थात् चित्त को अपने कारण में विलीन करने के साधन द्वारा) नाश करना पड़ता है।

**व्याख्या—**ध्यान के द्वारा जब चित्तवृत्तियाँ नष्ट हो जाती हैं, तब जो बच रहता है, उसे सूक्ष्म संस्कार या वासना कहते हैं। उसको नष्ट करने का उपाय क्या है? उसे प्रतिप्रसव अर्थात् प्रतिलोम-परिणाम के द्वारा नष्ट करना पड़ता है। प्रतिलोम-परिणाम का अर्थ है—कार्य का कारण में लय। चित्तरूप कार्य जब समाधि के द्वारा अस्मितारूप अपने कारण में लीन हो जाता है, तभी चित्त के साथ ये सब संस्कार भी नष्ट हो जाते हैं।

ध्यानहेयास्तद्वृत्तयः ॥११॥

**सूत्रार्थ—**ध्यान के द्वारा उनकी (स्थूल) वृत्तियाँ नष्ट करनी पड़ती हैं।

**व्याख्या—**ध्यान ही इन बड़ी तरंगों की उत्पत्ति को रोकने का एक प्रधान उपाय है। ध्यान के द्वारा मन की ये वृत्तिरूप-

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पातंजल-योगसूत्र-२ १९३

लहरे दब जाती हैं। यदि तुम दिन-पर-दिन, मास-पर-मास, वर्ष-पर-वर्ष, इस ध्यान का अभ्यास करो—जब तक वह तुम्हारे स्वभाव मे न भिद जाय, जब तक तुम्हारे इच्छा न करने पर भी वह ध्यान आप-से-आप न आने लगे—तो क्रोध, घृणा आदि वृत्तियाँ संयत हो जायेंगी।

क्लेशमूलः कर्माशयो दृष्टादृष्टजन्मवेदनीयः ॥१२॥

सूत्रार्थ—कर्मसंस्कारो के समुदाय की जड़ ये सब पूर्वोक्त क्लेश ही हैं; वर्तमान या भविष्य में होने वाले जीवन में वे फल प्रसव करते हैं।

व्याख्या—कर्माशय का अर्थ है इन सस्कारो की समष्टि। हम जो भी कार्य करते है, वह मानस-सरोवर मे एक लहर उठा देता है। हम सोचते है कि इस काम के समाप्त होते ही वह लहर भी चली जायगी, पर वास्तव में वैसा नही होता। वह तो बस सूक्ष्म आकार भर धारण कर लेती है, पर रहती वही है। जब हम उस कार्य को स्मरण मे लाने का प्रयत्न करते है, त्योही वह फिर से उठ आती है और लहर-रूप धारण कर लेती है। इससे यह स्पष्ट है कि वह मन के ही भीतर छिपी हुई थी, यदि ऐसा न होता, तो स्मृति ही सम्भव न होती। अतएव हर एक काम, हर एक विचार, वह चाहे शुभ हो चाहे अशुभ, मन के सबसे गहरे प्रदेश में जाकर सूक्ष्मभाव धारण कर लेता है और वही सचित रहता है। सुखकर या दुखकर सभी प्रकार के विचार को क्लेश कहते है, क्योकि योगियो के मतानुसार दोनो से ही अन्त में दुःख उत्पन्न होता है। इन्द्रियो से जो सब सुख मिलते हैं, वे अन्त में दुःख ही लाते है, क्योकि भोग से और अधिक भोग की तृष्णा होती है और इसका अनिवार्य फल होता है—दुःख। मनुष्य की वासना का कोई अन्त नही, वह लगातार वासना-पर-

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वासना रखता जाता है और जब ऐसी अवस्था में पहुँचता है, जहाँ उसकी वासना पूर्ण नहीं होती, तो फल होता है—दुःख। इसीलिए योगीगण शुभ-अशुभ समस्त संस्कारों की समष्टि को क्लेश कहते हैं, वे सब आत्मा की मुक्ति में बाधक होते हैं।

हमारे सारे कार्यों के सूक्ष्म मूलस्वरूप संस्कारों के बारे में भी ऐसा ही समझना चाहिए। वे कारणस्वरूप होकर इहजीवन अथवा परजीवन में फल प्रसव करते हैं। विशेष स्थलों में ये संस्कार, विशेष प्रबल रहने के कारण, बहुत शीघ्र अपना फल दे देते हैं, अत्युत्कट पुण्य या पाप कर्म इहजीवन में ही अपना फल सामने ला देता है। योगीगण कहते हैं कि जो मनुष्य इहजीवन में ही अत्यन्त प्रबल शुभ संस्कार उपार्जन कर सकते हैं, उन्हें मृत्यु तक वाट जोहने की आवश्यकता नहीं होती, वे तो इसी जीवन में अपने शरीर को देव-शरीर में परिणत कर सकते हैं। योगियों के ग्रन्थों में इस प्रकार के कई दृष्टान्तों का उल्लेख मिलता है। ये व्यक्ति अपने शरीर के उपादान तक को बदल डालते हैं। ये लोग अपने शरीर के परमाणुओं को ऐसे नए ढंग से ठीक कर लेते हैं कि उनको फिर और कोई बीमारी नहीं होती, और हम लोग जिसे मृत्यु कहते हैं, वह भी उनके पास नहीं फटक सकती। ऐसी घटना न होने का तो कोई कारण नहीं है। शरीरविधानशास्त्र खाद्य का अर्थ बतलाते हैं—सूर्य से शक्ति-ग्रहण। वह शक्ति पहले वनस्पति में प्रवेश करती है, उस वनस्पति को कोई पशु खा लेता है, फिर उस पशु को कोई मनुष्य। इसे वैज्ञानिक भाषा में व्यक्त करना हो, तो कहना पड़ेगा कि हमने सूर्य से कुछ शक्ति ग्रहण करके उसे अपने अंगीभूत कर लिया। यदि यही बात हो, तो इस शक्ति

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को अपने अन्दर लेने के लिए केवल एक ही तरीका क्यो रहना चाहिए ? पौधे हमारी तरह शक्तिग्रहण नही करते; और हम जिस प्रकार शक्ति सग्रह करते हैं, धरती उस प्रकार नही करती। पर तो भी सभी किसी-न-किसी प्रकार से शक्तिसग्रह करते ही हैं। योगियो का कहना है कि वे केवल मन की शक्ति के द्वारा शक्तिसग्रह कर सकते हैं। वे कहते हैं कि हम बिना किसी साधारण उपाय का अवलम्बन किए ही यथेच्छ शक्ति भीतर ले सकते हैं। जैसे एक मकडी अपने ही उपादान से जाला बनाकर उसमे बद्ध हो जाती है और जाले के तन्तुओ का सहारा लिए बिना कही नही जा सकती, उसी प्रकार हमने भी अपने ही उपादान से इस स्नायु-जाल की सृष्टि की है और अब उस स्नायु-प्रणाली का बिना अवलम्बन किए कोई काम ही नही कर सकते। योगी कहते है, हम क्यो उसमे बद्ध हो ?

इस तत्व को और एक उदाहरण देकर समझाया जा सकता है। हम पृथ्वी के किसी भी भाग में विद्युत्-शक्ति भेज सकते हैं, पर उसके लिए हमे तार की जरूरत पड़ती है। किन्तु प्रकृति तो बिना तार के ही बडे परिमाण मे यह शक्ति भेजती रहती है। हम भी वैसा क्यों न कर सकेगे ? हम चारो ओर मानस-विद्युत् भेज सकते हैं। हम जिसे मन कहते हैं, वह बहुत कुछ विद्युत्-शक्ति के ही सदृश है। स्नायु के बीच मे जो एक तरल पदार्थ प्रवाहित होता है, उसमे बडे परिमाण मे विद्युत्-शक्ति है, इसमें कोई सन्देह नही, क्योकि विद्युत् के समान उसके भी दोनो ओर विपरीत शक्तिद्वय दिखाई पडती है, तथा विद्युत् के अन्यान्य सब धर्म उसनें भी देखे जाते है। इस विद्युत्-शक्ति को अभी हम केवल स्नायुओ में से ही प्रवाहित कर सकते

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है। पर बात यह है कि स्नायुओ की सहायता लिए बिना ही हम इसे क्यो नही प्रवाहित कर सकेगे ? योगी कहते है, हाँ, यह पूरी तरह से सम्भव है, और सम्भव ही नही, वरन् इसे कार्य में भी परिणत किया जा सकता है। और जब तुम इसमे कृत-कार्य हो जाओगे, तब सारे ससार भर मे अपनी इस शक्ति को परिचालित करने मे समर्थ हो जाओगे । तब तुम किसी स्नायु-यन्त्र की सहायता लिए बिना ही किसी भी स्थान मे, किसी भी शरीर द्वारा कार्य कर सकोगे । जब तक आत्मा इस स्नायु-यन्त्ररूप प्रणाली के भीतर से काम करती रहती है, हम कहते है, कि मनुष्य जीवित है, ओर जब इन यन्त्रो का कार्य बन्द हो जाता है, तो कहते है कि मनुष्य मर गया । पर जब मनुष्य इस प्रकार के स्नायु-यन्त्र की सहायता से, या बिना उसकी सहायता के भी, कार्य करने मे समर्थ हो जाता है, तब उसके लिए जन्म और मृत्यु का कोई अर्थ नही रह जाता । ससार मे जितने शरीर है, वे सब-के-सब तन्मात्रायो से बने हुए हैं, उनमें भेद है केवल तन्मात्राओ के विन्यास की प्रणाली मे । यदि तुम्ही उस विन्यास के कर्ता हो, तो तुम इच्छानुसार शरीर की रचना कर सकते हो । यह शरीर तुम्हारे सिवाय और किसने बनाया है ? अन्न कौन खाता है ? यदि कोई और तुम्हारे लिए भोजन करता रहे, तो तुम कोई अधिक दिन जीवित न रहोगे । उस अन्न से रुधिर भी कौन तैयार करता है ? अवश्य तुम्ही । उस रुधिर को शुद्ध करके कौन धमनियो में प्रवाहित करता है ? तुम्ही । हम शरीर के मालिक हैं और उसमे वास करते हैं। उसका किस प्रकार पुनर्गठन किया जाय, बस इसी ज्ञान को हम खो बैठे हैं। हम यन्त्र के समान अवनतस्वभाव हो गए है। हम शरीर के परमाणुओ को.