Skip to content
SarvaKosh
राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

Page 225 of 307

Read in context
Page 225

२०८ राजयोग

जो कोई व्यक्ति उस साधु पुरुष के संस्पर्श में आता है, वही पवित्र हो जाता है।

अब देखें, 'लिंगमात्र' का अर्थ क्या है। लिंगमात्र कहने से बुद्धि (महत्तत्त्व) का बोध होता है, वह प्रकृति की पहली अभिव्यक्ति है, उसी से दूसरी सब वस्तुएँ अभिव्यक्त हुई हैं। गुणों की अन्तिम अवस्था का नाम है 'अलिंग' या चिह्नशून्य। यही पर आधुनिक विज्ञान और समस्त धर्मों में एक भारी झगडा देखा जाता है। प्रत्येक धर्म में यह एक साधारण सत्य देखने में आता है कि यह जगत् चैतन्यशक्ति से उत्पन्न हुआ है। ईश्वर हमारे समान कोई व्यक्तिविशेष है या नहीं, यह विचार छोडकर केवल मनोविज्ञान की दृष्टि से ईश्वरवाद का तात्पर्य यह है कि चैतन्य ही सृष्टि की आदिवस्तु है, उसी से स्थूल भूत का प्रकाश हुआ है। किन्तु आधुनिक दार्शनिकगण कहते हैं कि चैतन्य सृष्टि की आखिरी वस्तु है। अर्थात् उनका मत यह है कि अचेतन जड वस्तुएँ धीरे-धीरे प्राणी के रूप में परिणत हुई हैं, ये प्राणी क्रमश उन्नत होते-होते मनुष्य-रूप धारण करते हैं। वे कहते हैं, यह बात नहीं है कि जगत् की सब वस्तुएँ चैतन्य से प्रसूत हुईं हैं, वरन् चैतन्य ही सृष्टि की आखिरी वस्तु है। यद्यपि धर्मों एव विज्ञान के सिद्धान्त इस प्रकार आपस में ऊपर से विरुद्ध प्रतीत होते हैं, तथापि इन दोनों सिद्धान्तों को ही सत्य कहा जा सकता है। एक अनन्त श्रृंखला या श्रेणी लो, जैसे—क-ख-क-ख-क-ख आदि, अब प्रश्न यह है कि इसमें क पहले है या ख? यदि तुम इस श्रृंखला को क-ख क्रम से लो, तो 'क' को प्रथम कहना पडेगा, पर यदि तुम उसे ख-क से शुरू करो, तो 'ख' को आदि मानना होगा। अत. हम उसे जिस दृष्टि से देखेंगे, वह उसी प्रकार