मीमांसा दर्शन / पूर्वमीमांसा (शाबर भाष्य सहित)
Purva Mimamsa Darshan with Shabara Bhashya
महर्षि जैमिनि / शाबर स्वामी द्वारा
स्रोत: तारा प्रिंटिंग वाराणसी · तारा प्रिंटिंग वाराणसी · 1950 (उद्गम)
सूत्रव्याख्यानेनाह – स्त्र्यपराधेनेति । दुर्ज्ञानमिति सम्बन्धः । स्त्रीणां
१३ ] प्रथमाध्याये द्वितीयपादः ११५
अग्नि के दर्शन को लक्ष्य कर गुणवाद के अनुसार यह कहा गया है । अतः यह अर्थवाद
उक्त दोनों विधियों के प्राशस्त्य का बोधक होने से स्वरूप में तात्पर्य नहीं है ।
"दूरभूयत्वात्" अधिक दूरी होने से, अर्थात् दूरी का भूयस्त्व आधिक्य होने से दिन
में अग्नि की शिखा दृश्य नहीं होती है एवं रात में धूम दृश्य नहीं होता है। अतः इस
प्रकार गौण कथन है ॥ १२ ॥
स्त्र्यपराधात्कर्तुश्च पुत्रदर्शनम् ॥ १.२.१३ ॥
शा० भा०—दृष्टविरोध एवोदाहरणं 'न चैतद्विद्म' इति । तत् प्रवरे प्रक्रिय-
माणे देवाः पितर इति ब्रूयादित्याकाङ्क्षितत्वादस्य विधेः शेषः । अब्राह्मणोऽपि
ब्राह्मणः प्रवरानुमन्त्रणेन स्यादिति स्तुतिः । दुर्ज्ञानत्वादज्ञानवचनं गौणम् ।
स्त्र्यपराधेन कर्तुश्च पुत्रदर्शनेन । अप्रमत्ता रक्षत तन्तुमेनमित्यादिना
दुर्ज्ञानम् ॥ १३ ॥
भा० वि०—अस्याप्युदाहरणान्तरेऽव्याप्तिमाशङ्क्य निमित्तान्तरोपन्यासेन
परिहरति—स्त्र्यपराधादिति । प्रक्रियमाणे यजमानो ब्रूयात् देवाः पितर
इत्यादीति पूरणीयम् । प्रवरानुमन्त्रणविधिशेषत्वेऽपि कथं स्तुतिरित्याशङ्क्य
गुणवादादित्याह—अब्राह्मणोऽपीति । तत्र च प्रसिद्धब्राह्मण्यानां ब्राह्मणत्वलाभो
निष्प्रयोजन इति ब्राह्मण्याप्रसिद्धिप्रतिपादनेन स्तुत्युपपादकमेतद्वाक्यमित्यर्थः ।
तथापि ज्ञायमाने कथमज्ञानवचनमित्याशङ्क्य गुणवादादित्याह—दुर्ज्ञानत्वादिति ।
विदिना तद्गतं सौकर्यं लक्षयित्वा नञा निषिध्यत इत्यर्थः । दुर्ज्ञानत्वे कारणं
सूत्रव्याख्यानेनाह – स्त्र्यपराधेनेति । दुर्ज्ञानमिति सम्बन्धः । स्त्रीणां
स्वभर्तृव्यतिक्रमलक्षणापराधसम्भवेनेत्यर्थः ॥ १३ ॥
त० वा० —प्रवरे प्रक्रियमाणे यजमानो वदेद्देवाः पितर इत्यादि । तत्प्रशं-
सार्थमुक्तमब्राह्मणोऽपि ब्राह्मणो भवति प्रवरानुमन्त्रणेनेति । तत्र प्रसिद्धब्राह्मण-
त्वानामेव ब्राह्मण्यलाभो निष्प्रयोजन इति तदुपपत्त्यर्थमुक्तं न चैतद्विद्म इति ।
ज्ञायमाने त्वज्ञानवचनं दुर्ज्ञानत्वात् । यत्सुखेनाज्ञानम्, तदज्ञानमेव । तच्च स्त्र्य-
पराधनिमित्तम् । सत्यपि च स्त्र्यपराधे यदि मातुरेव क्षेत्रिणो वा पुत्रः स्यात्त-
तस्तयोः प्रसिद्धजातित्वान्नैव दुर्ज्ञानता भवेत् । तयोरप्येवमेवं तत्पूर्वजयोरित्य-
नादिन्यायेन जातिरवधार्येतैव । यतस्तु माता भस्त्रा पितुः पुत्र इति स्मर्तॄणां
दर्शनं जनयितुश्च नानाजातित्वोपपत्तिः, तेन वर्णसंकरः । वेदेऽपि चा प्रमत्ता
रक्षत तन्तुमेनमिति जातिविच्छेददर्शनं स्त्र्यपराधकर्तृपुत्रनिमित्तमेवोपपद्यते ।
अन्यथा ह्यपरिरक्ष्यमाणेऽपि नैव स्वजातितन्तुविच्छेदो भवेत् । तेनास्ति प्रशंसा-
वकाश इति । निरूढब्राह्मण्यप्रवरसंकीर्तनात्तत्प्रभवोऽयमिति ज्ञानाद् ब्राह्मणः
कृतो भवतीति स्तुतिः ॥ १३ ॥
११६ मीमांसादर्शनम् [ सू०
न्या० सू०—'न चैतद्विद्म' इत्यस्य प्रवर प्रव्रियमाणे ब्रूयादित्येतद्विधिशेषत्वं भाष्य-
कृतोक्तम् । तत्र विध्यंशपूरणपूर्वकं स्तुत्युपयोगित्वमुपपादयति—प्रवर इति । अज्ञानवचना-
लम्बनमभिधानार्थं दुर्ज्ञानत्वादिति भाष्यं व्याचष्टे—ज्ञायमाने स्विति । दुर्ज्ञाने कथमज्ञान-
शब्दप्रवृत्तिरित्यपेक्षायामाह—यत्सुखेनेति । पूर्ववदत्रापि ज्ञानगतसौकर्यलक्षणो गुणो
विदितो विदितलक्षितो नञा निषिध्यत इत्यर्थः । स्त्र्यपराधेनेति दुर्ज्ञानत्वोपपादनार्थत्वेन
व्याचष्टे—तच्चेति ।
ननु स्त्र्यपराधेऽपि बीजाद्योनिर्बलीयसीत्यनेन न्यायेन मातृब्राह्मण्यमात्रेण क्षेत्रि-
ब्राह्मण्येन वा पुत्रे ब्राह्मण्यसिद्धेः कथं दुर्ज्ञानतेत्याशङ्कानिराकरणार्थतया कर्तुश्च पुत्रदर्शने-
नेति भाष्यं व्याचष्टे—सत्यपि चेति । किं तत्कर्तुः पुत्रदर्शनमित्यपेक्षायां येन जातः स
एव स माता भस्त्रा पितुः पुत्रो इत्याद्युदाहृतम् । जनकब्राह्मण्यनिमित्तेऽपि पुत्रब्राह्मण्ये
कथं दुर्ज्ञानत्वमत आह—जनयितुश्चेति । साक्षात्कर्तृपुत्रदर्शनं स्वयमुदाहृत्य भाष्यकारीय-
मुदाहरणं द्योतकत्वेन योजयेति—वेदेऽपि चेति । उपपादितं स्तुत्युपयोगमुपसंहरति—
तेनेति । दुर्ज्ञानत्वेनाब्राह्मण्यशङ्कासम्भवादब्राह्मणस्यापि प्रवरानुमन्त्रणाद् ब्राह्मण्यं भवती-
त्येवंरूपा प्रशंसा युक्तेत्यर्थः ।
ननु ब्राह्मण्यस्य मातापितृसंबन्धनिमित्तत्वात्प्रवरानुमन्त्रणजन्यत्वाभिधानं किमाल-
म्बनमत आह—निरूढेति । निरूढं=प्रसिद्धं ब्राह्मण्यं येषां प्रवराणां प्रव्रियमाणानां
सङ्कीर्त्त्यमानानां तेषां सङ्कीर्त्तनादित्यर्थः ॥ १३ ॥
मा० प्र०—"नचैतद्विद्मो वयं ब्राह्मणा वा स्मोऽब्राह्मणा वा" इस अर्थवाद में भी
दृष्टविरोध प्रदर्शित किया है, किन्तु यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि "प्रव्रियमाणे ब्रूयात्
देवाः पितरः" (मै० सं० १।४।११) प्रवर के कथन के समय देवाः पितरः इत्यादि कहना
चाहिए यह इस विधि का शेष या अङ्ग होता है। आशय यह है कि यजमान यदि
देवाः पितरः पितरो देवा योऽस्मि सन् यजे योऽस्मि सन् करोमि" इस मन्त्र में प्रवर
अनुमन्त्रित करे, ऐसी स्थिति में अब्राह्मण भी ब्राह्मण हो जाता है। इस प्रकार इसके
द्वारा प्रवरअनुमन्त्रण की प्रशंसा की गई है। किन्तु ब्राह्मणत्वादि की अज्ञेयता विवक्षित
नहीं है, कारण ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि प्रत्यक्ष सिद्ध है, ब्राह्मणत्वादि जाति जन्म के
अनुसार है, गुण के अनुसार नहीं है, यह प्रत्यक्ष सिद्ध है। शास्त्रकारों के अनुसार
गोत्व आदि जाति के समान ब्राह्मणत्वादि जाति भी प्रत्यक्षगम्य एवं जन्मगत है। यदि
ब्राह्मणत्वादि जाति को जन्मगत नहीं माना जाय तब दृष्टविरोध, शास्त्रविरोध, अन्यो-
न्याश्रय, अव्यवस्था एवं एक साथ वृत्तिद्वय-विरोध आदि अनेक दोषों की सम्भावना है।
ब्राह्मणत्वादि जाति जन्मगत है, यह प्रत्यक्षगम्य होने से उसका अपलाप करने पर दृष्ट-
विरोध होगा । "अष्टवर्षं ब्राह्मणमुपनयीत" आठ वर्ष के ब्राह्मणपुत्र को ब्राह्मण कह
कर उल्लेख किया गया है। यदि जन्मगत जाति न मानी जाय तो इसकी असङ्गति होगी
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कारण, आठ वर्ष के बालकों में साधारणतया ब्राह्मणोचित किसी भी गुण की अभिव्यक्ति
नहीं होती है । क्षत्रिय एवं वैश्य के प्रसङ्ग में भी इसी प्रकार उपनयन की अवस्था का
निर्णय किया गया है । यदि जाति को जन्मगत नहीं माना जाय तो इन शास्त्रवचनों के
साथ विरोध होगा । ब्राह्मणत्वादि जाति का आचार से जन्म मानने पर अन्योऽन्याश्रय
दोष होगा, क्योंकि, जहाँ चारों वर्णों के आचारके विषय में उपदेश दिया गया है, वहाँ
ब्राह्मणत्वादि जाति का परिचय देना शास्त्र का उद्देश्य नहीं था, किन्तु, आचार के
विधान में ही शास्त्र का तात्पर्य्य है । अतः, जो व्यक्ति ऐसे आचार से सम्पन्न है, वह
ब्राह्मण है, इसमें शास्त्र का तात्पर्य्य नहीं है । क्योंकि धर्म के प्रतिपादन करने में ही
शास्त्र का उद्देश्य है । ऐसी स्थिति में वैसा आचार करने पर ब्राह्मण होगा, और
ब्राह्मणत्व पूर्व से सिद्ध रहने पर ही वे आचार अनुष्ठेय होंगे, इस प्रकार ब्राह्मणत्व एवं
आचार दोनों की उत्पत्ति परस्पर सापेक्ष होने से अन्योऽन्याश्रय दोष है, क्योंकि,
ब्राह्मणत्व आदि पूर्व से सिद्ध न रहे तो उसको उद्देश्य कर किसी आचार का विधान
सम्भव ही नहीं है। जाति को जन्मगत न कहकर आचार जन्य मानने पर अव्यवस्था भी
होगी, क्योंकि, एक ही व्यक्ति कभी सदाचार करता है एवं कभी दुराचार या कदाचार
करता है, अतः, सदाचार के समय वह ब्राह्मण और दूसरे ही क्षण कदाचार करने के
समय शूद्र होगा । इस प्रकार एकही व्यक्ति में ब्राह्मणत्वादि कभी भी व्यवस्थित नहीं
रहेगा, पुनः पुनः जाति का परिवर्तन होगा । ऐसी स्थिति में वह ब्राह्मण है या ब्राह्मणेतर
इसका प्रमाण देना संसार में दुर्लभ हो जायगा । फलतः, शास्त्रीय विधि के अनुष्ठान का
लोप हो जायेगा । इस प्रकार युगपत् वृत्तिद्वयका विरोध भी होगा, कारण, एकही व्यक्ति
एकही प्रयत्न से ऐसा कर्म कर सकता है कि जिसके फल स्वरूप किसी का अनिष्ट और
किसी का इष्ट होगा ! इससे युगपत् परपीडा और परानुग्रह करने से उनमें शूद्रत्व एवं
ब्राह्मणत्व दो विरुद्ध जातियों का एक साथ समावेश होगा । इत्यादि ।
पूर्वप्रसङ्ग में जाति की दुर्ज्ञेयता को लक्ष्य कर "नचैतद् विद्मः" इत्यादि वाक्य में
उस विषय का अज्ञान कहा गया है । जाति दुर्ज्ञेय है, कारण, गोत्वादि जाति के प्रत्यक्ष
में जैसे अनेक इतिकर्तव्यता या सहकारी रहते है, वैसे ही ब्राह्मणत्वादि जाति के प्रत्यक्ष
में भी उत्पादन कर्ता की जाति का स्मरण करना इतिकर्त्तव्यता या सहकारी है ।
उत्पादक कौन है, इसको जननी को छोड़कर कोई भी नहीं कह सकता हैं । स्त्रियों में
दुश्चरित्रा भी रहती हैं । इसलिए, पति ही सभी पुत्रों का जनक है, यह भी नहीं कहा जा
सकता है । क्योंकि, जारज रमणी जार से पुत्र की उत्पत्ति कर सकती है । पिता एवं
माता की समान जातीयता ही जाति की विशुद्धि का कारण है, अन्यथा माता अन्य जाति
का और पिता दूसरा जाति का होने पर पुत्र की जाति अश्वतर के समान शङ्कर हो
जायेगी । इस प्रकार वर्णशङ्करता जिससे न हो इसी लिए श्रुति कह रही है कि
"अप्रमत्ता रक्षत तन्तुमेनम्" हे रमणियो ? तुम सब असावधान न होकर अर्थात् यत्न-
११८ मीमांसादर्शनम् [ सू०
पूर्वक इस जाति रूप तन्तु की रक्षा करो । क्योंकि, जाति का आश्रय स्वरूप व्यक्ति का
असाङ्कर्य या शुद्ध वर्णता तुम्हारे ही अधीन है । इस प्रकार श्रुतियां स्त्रियों को व्यभि-
चारिता रूप अपराध को जाति की उच्छेद का कारण कह रही है । अन्यथा जाति-तन्तु
पितृपरम्परा क्रम में सनातन होने से निश्चित ही है । अतः, किसी किसी स्त्री की ऐसी
दुश्चरित्रता का कारण एवं उत्पादक क्या है, यह जननी को ही प्रत्यक्षगम्य होने से
विशुद्ध जन्मा व्यक्ति को की उत्पत्ति के सम्बन्ध में संशय होना स्वाभाविक है । उत्पादक
का संशय होने पर जाति-प्रत्यक्ष में भी संशय होगा, क्योंकि, उत्पादक के जाति का
स्मरण भी जाति प्रत्यक्ष का सहकारी कारण है । इस प्रकार जाति प्रत्यक्षगम्य होने पर
भी जाति के विषय में संशय होना अस्वाभाविक नहीं है। इसी संशय को लक्ष्य कर इस
स्थल में मैं ब्राह्मण या अब्राह्मण, यह नहीं जानता हूँ, इस प्रकार कहा गया है, किन्तु,
यह प्रवरानुमन्त्रण विधि का शेष या अङ्ग होने से इसके द्वारा प्रवरानुमन्त्रण की इस
प्रकार प्रशंसा की गई है कि प्रवरानुमन्त्रण का ऐसा ही सामर्थ्य है कि ब्राह्मण या
अब्राह्मण यह अनिश्चित रहने पर भी इसके द्वारा वरणीय व्यक्ति ब्राह्मण के रूप में अव-
धारित होगा । अतः, इसमें प्रत्यक्ष विरोध दोष नहीं है ।
स्त्र्यपराधात्, स्त्रियों के अपराध से अर्थात् दोष से, 'कर्तुः' कर्ता = उत्पादक कर्ता
जार का 'च' - भी “पुत्रदर्शनम्” पुत्र होता है, ऐसा देखा जाता है। दुष्ट स्त्रियों के
दोष से उत्पादन कर्ता अर्थात् उपपति से भी पुत्र की उत्पत्ति होती है, अतः,
“नचैतद्विद्म” इत्यादि कथन में दृष्टविरोध नहीं है ।
भाष्यभूमिका में भी इस सूत्र के विश्लेषण में कोई नवीनता नहीं है । पति और
उपपति दोनों के पुत्र देखे जाते है, अतः, अपना जन्म कैसा है—यह दुर्विज्ञेय है । इसी
अभिप्राय से यह प्रयोग है, अतः, दृष्टविरोध नहीं है । अपने ब्राह्मण्य के सन्देह के
लिए यह प्रयोग नहीं है ॥१३॥
आकालिकेप्सा ॥ १.२.१४ ॥
शा० भा० - शास्त्रदृष्टविरोघे उदाहरणं को हि तद्वेदेति, दिक्ष्वतीकाशान्करो-
तीति साकाङ्क्षत्वादस्य विधेः शेषः । प्रत्यक्षफलत्वेन स्तुतिः । अनवक्लृप्तिवचनं
विप्रकृष्टफलत्वाद् गौणम् ॥ १४ ॥
भा० वि० - ननु सत्यपि स्त्र्यपराधे मातुः क्षेत्रिणो वा पुत्रः स्यात्, तयोश्च
निश्चितत्वात् ब्राह्मण्यस्य कथं दुर्ज्ञानं पुत्रस्य ब्राह्मण्यमत आह- कर्तुश्चेति ।
कर्तुर्नषेक्तुरेव पुत्रो, न मातुः क्षेत्रिणो वेत्यस्यार्थस्य "अप्रमत्ता रक्षत तन्तुमेतम्"
इत्यनेन वैदिकेन प्रजातन्तुरक्षणे प्रमादपरिहारविधानरूपेण लिङ्गेन “माता भस्त्रा
पितुः पुत्रो येन जातः स एव स" इति स्मृत्या च प्रदर्शनात् भर्तृव्यतिक्रमशङ्कायां