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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages
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१४८कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ दूसरा अधिकरण

तीक्ष्णं चास्य मयूरग्रीवाभं श्वेतभङ्गं चिमिचिमायितं पीतचूर्णितं काकणिकः सुवर्णरागः।
(१) तारमुपशुद्धं वा। अस्थिन्तुत्थे चतुः, समसीसे चतुः, शुष्कतुत्थे चतुः, कपाले त्रिर्गोमये द्विः, एवं सप्तदशतुत्थातिक्रान्तं सैन्धविकयोज्ज्वलितम्। एतस्मात्काकण्युत्तरापसारिता। आ द्विभाषादिति सुवर्णे देयं, पश्चाद्रागयोगः। श्वेततारं भवति।
(२) त्रयोंऽशाः तपनीयस्य द्वात्रिंशद्भागश्वेततारमूर्च्छितं तत् श्वेतलोहितकं भवति। ताम्रं पीतकं करोति।
(३) तपनीयमुज्जवाल्य रागत्रिभागं दद्यात्। पीतरागं भवति।
(४) श्वेततारभागौ द्वावेकस्तपनीयस्य मुद्गवर्णं करोति।

या सिंधदेश की मिट्टी के साथ घिसकर उसे शुद्ध किया जाय। इस सुवर्ण के साथ इस्पाती लोहा भी नील, पीत आदि आभूषणों के योग्य होता है। इस्पाती लोहा मोर की गर्दन के समान आकृति का और काटने पर श्वेत, चमकता हुआ होना चाहिये। यदि गरम करके उसका चूर्ण बनाया जाय और उसको एक काकिणी सोने में मिला दिया जाय तो सोने का रङ्ग खिल उठता है।

(१) लोहे के स्थान पर शुद्ध चाँदी भी मिलाई जा सकती है। हड्डी के चूर्ण के साथ मिली हुई मिट्टी से बनी हुई घरिया में चार बार, मिट्टी और सीसे से बनी घरिया में चार बार, शुद्ध मिट्टी से बनी घरिया में तीन बार और गोबर में तीन बार—इस प्रकार सत्रह बार घरिया में बदलने के बाद सिंधदेश की खारी मिट्टी में रगड़ देने से श्वेतवर्ण की शुद्ध रूप्यधातु तैयार हो जाती है। उसमें से एक काकिणी चाँदी सोने में मिलाई जा सकती है। इस प्रकार दो माष तक चाँदी मिलाकर उतना सोना निकाला जा सकता है। इस प्रकार सोने में चाँदी मिला देने से और तदनन्तर उसको चमका देने वाली चीजों के सहयोग से सुवर्ण भी चाँदी की तरह चमकने लगता है।

(२) बत्तीस भागों में विभक्त साधारण सोने में तीन भाग निकालकर उनकी जगह तीन भाग शुद्ध सोना और शेष चाँदी को एक साथ मिलाकर घरिया में उलटने-पुलटने से उसका रङ्ग श्वेत-लाल मिश्रित रङ्ग का हो जाता है। यदि पूर्वोक्त रीति से चाँदी के साथ या तांबे को सोने में मिला दिया जाय तो वह उसके रङ्ग को पीला बना देता है।

(३) साधारण सोने को खारी मिट्टी से चमका कर उसमें शुद्ध सोने का तीसरा भाग मिला दिया जाय तो उसका रंग लाल-पीला हो जाता है।

(४) दो भाग शुद्ध चाँदी में एक भाग सोने को मिला कर भावना देने से उसका रङ्ग मूंग के समान हो जाता है।

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प्र० २९ : अ० १३ ] सुवर्णाध्यक्ष के कार्य १४९

(१) कालायसस्यार्धभागाभ्यक्तं कृष्णं भवति। प्रतिलेपिना रसेन द्विगुणाभ्यक्तं तपनीयं शुकपत्रवर्णं भवति। तस्यारम्भे रागविशेषेषु प्रतिवर्णिकां गृह्णीयात्।

(२) तीक्ष्णताम्रसंस्कारं च बुध्येत। तस्माद्वज्रमणिमुक्ताप्रवालरूपाणामपनेयमानं च रूप्यसुवर्णभाण्डबन्धप्रमाणानि चेति।

(३)

समरागं समद्वन्द्वमशक्तं पृषतं स्थिरम्।
सुप्रमृष्टमसंपीतं विभक्तं धारणे सुखम्॥
अभिनीतं प्रभायुक्तं संस्थानमधुरं समम्।
मनोनेत्राभिरामं च तपनीयगुणाः स्मृताः॥

इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे अक्षशालायां सुवर्णाध्यक्षं नाम त्रयोदशोऽध्यायः, आदितस्त्रयस्त्रिंशः।

—: ० :—


(१) सोने का छठा हिस्सा लोहा मिला देने से उसका रंग काला हो जाता है। पिघले हुए लोहे तथा शुद्ध चाँदी से मिला हुआ दुगुना सोना सुवापंखी रंग का हो जाता है। इसी प्रकार पूर्वोक्त नील, आदि रङ्गों के भेद को जानने के लिए प्रत्येक वर्णक को ग्रहण करना चाहिए।

(२) सोने का रङ्ग बदलने के लिए उपयोग में आने वाले लोहे, ताँबे को शुद्ध करना आवश्यक है; इसलिए उनके शुद्ध करने की विधि भली भाँति जान लेनी चाहिए। जिससे वज्रमणि, मुक्ता, प्रवाल आदि उत्तम रत्नों में मिलावट न हो सके और सोने-चाँदी आदि के आभूषण में कोई न्यूनाधिक्य मेल करके गड़बड़ी न कर सके, इसके लिए उत्तम रत्नों और सोना-चाँदी आदि के आभूषणों के संबंध में अच्छी तरह जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए।

(३) १. एक सा रङ्ग होना, २. वजन तथा रूप में समान होना, ३. बीच में गांठ आदि का न होना, ४. टिकाऊ होना, ५. अच्छी तरह चमकाया हुआ होना, ६. ठीक तरह बना हुआ होना, ७. अलग-अलग हिस्सों वाला, ८. पहनने में सुखकर, साफ-सुथरा, १० कांतिमान, ११. अच्छा दिखाई देने वाला, १२. एक जैसी बनावट का, १३. अयुक्त छिद्रों से रहित और १४. मन तथा आँखों को अच्छा लगने वाला, ये चौदह गुण सोने के आभूषणों में होते हैं।

अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में अक्षशाला में सुवर्णाध्यक्ष नामक तेरहवां अध्याय समाप्त।

—: ० :—

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प्रकरण ३०विशिखायां सौवर्णिक प्रचारः
अध्याय १४

(१) सौवर्णिकः पौरजानपदानां रूप्यसुवर्णमावेशनिभिः कारयेत् । निर्दिष्टकालकार्यं च कर्म कुर्युः, अनिर्दिष्टकालं कार्यापदेशम् ।

(२) कालातिपातने पादहीनं वेतनं तद्द्विगुणश्च दण्डः । कार्यस्यान्यथाकरणे वेतननाशः, तद्द्विगुणश्च दण्डः ।

(३) यथावर्णप्रमाणं निक्षेपं गृह्णीयुस्तथाविधमेवार्पयेयुः, कालान्तरादपि ब तथाविधमेव प्रतिगृह्णीयुरन्यत्र क्षीणपरिशीर्णाभ्याम् ।

(४) आवेशनिभिः सुवर्णपुद्गललक्षणप्रयोगेषु तत्तज्जानीयात् ।


राजकीय स्वर्णकारों के कर्तव्य

( १ ) सौवर्णिक ( राज्य का प्रधान आभूषण व्यापारी ) को चाहिए कि वह नगरवासियों और जनपदवासियों के सोने-चाँदी के आभूषणों का कार्य शिल्पशाला में बैठकर काम करने वाले सुनारों द्वारा कराये । सुनारों को चाहिए कि वे समय और वेतन को नियत करके ही कार्य करें; यदि कार्य की अधिकता हो या वायदे की अवधि बीत रही हो, तो उन्हें नियत समय से भी अधिक कार्य करना चाहिए ।

( २ ) यदि कोई सुनार वायदे के अनुसार कार्य पूरा न करे तो उसके वेतन का चौथाई भाग जब्त करके उसे वेतन का दुगुना दण्ड दिया जाय । यदि कोई सुनार अभीष्ट जेवर को न बनाकर दूसरा ही जेवर बनाकर दे, तो उसकी मजदूरी जब्त कर उसे नियत वेतन का दुगुना दण्ड दिया जाय ।

( ३ ) सुनारों को चाहिए कि वे जिस प्रकार और जितने वजन का सोना आदि आभूषण बनाने के लिए लें, उसी प्रकार और उतने ही वजन का आभूषण बना कर वापिस करें । सुनार के परदेश चले जाने अथवा उसकी मृत्यु हो जाने के कारण यदि सुनार के घर सोना बहुत दिनों तक पड़ा रह जाय तो उसके उत्तराधिकारियों से वह सोना वापिस ले लेना चाहिए । यदि सोना नष्ट हो गया हो या छीज गया हो तो सुनार से उसका मुआवजा भी लेना चाहिए ।

( ४ ) सौवर्णिक को चाहिए कि वह सुनारों के द्वारा किए जाने वाले पुद्गल तथा लक्षण आदि कपट प्रयोगों के संबंध में भी अच्छी जानकारी रखे ।

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प्र० ३० : अ० १४ ] राजकीय स्वर्णकारों के कर्तव्य १५१

(१) तप्तकलधौतकयोः काकणिकः सुवर्णे क्षयो देयः । तीक्ष्णकाकणी रूप्यद्विगुणो रागप्रक्षेपस्तस्य षड्भागः क्षयः ।
(२) वर्णहीने माषावरे पूर्वः साहसदण्डः, प्रमाणहीने मध्यमः, तुलाप्रतिमानोपधावुत्तमः, कृतभाण्डोपधौ च ।
(३) सौवर्णिकेनादृष्टमन्यत्र वा प्रयोगं कारयतो द्वादशपणो दण्डः, कर्तुर्द्विगुणः सापसारश्चेत् । अनपसारः कण्टकशोधनाय नीयेत । कर्तुश्च द्विशतो दण्ड पणच्छेदं वा ।
(४) तुलाप्रतिमानमाण्डं पौतवहस्तात्क्रीणीयुः । अन्यथा द्वादशपणो दण्डः ।
(५) घनं घनसुषिरं संयूह्यमवलेप्यं सङ्घात्यं वासितकं च कारुकर्म ।


( १ ) यदि खोटे सोने-चाँदी के आभूषण बनाने के लिए दिए जाँय तो सुनार को एक काकणी ( ¼ माष ) छीजन देनी चाहिए । सोने का रङ्ग बदलने के लिए एक काकणी लोहा और दो काकणी चाँदी उसमें मिलानी चाहिए । एक काकणी लोहा और दो काकणी चाँदी का छटा भाग छीजन के लिए निकाल लेना चाहिए ।

( २ ) यदि अपनी अज्ञानता के कारण सुनार एक माष सुवर्ण को कांतिहीन कर दे तो उसे प्रथम साहस दण्ड दिया जाना चाहिए; तौल में कम करे तो मध्यम साहस दण्ड; और तराजू-बाट में कपट करे तो उत्तम साहस दण्ड दिया जाना चाहिए; इसी प्रकार सोने-चाँदी के बने हुए पात्र में यदि कोई व्यक्ति हेर-फेर करे तो उसे भी उत्तम साहस दण्ड दिया जाना चाहिए ।

( ३ ) सौवर्णिक की अनुमति प्राप्त कर या न प्राप्त कर यदि कोई व्यक्ति शिल्प-शाला ( विशिखा ) से बाहर किसी सुनार से आभूषण बनवाये तो उसे बारह पण दण्ड देना चाहिए, और जेवर बनाने वाले सुनार को चौबीस पण । उनके लिए यह दण्ड-व्यवस्था उसी दशा में है यदि उन पर चोरी की आशंका न हो तो और यदि उन पर चोरी किए जाने की आशंका हो तो उन्हें कण्टकशोधक ( प्रदेष्टा ) के पास न्याय के लिए ले जाना चाहिए । यदि अपराध सिद्ध हो जाय तो सुनार पर दो-सौ पण दण्ड निर्धारित किया जाय और इतना धन देने से यदि वह इन्कार करे तो उसकी उंगलियाँ कटवा देनी चाहिए ।

( ४ ) सुनारों को चाहिए कि वे सोना-चाँदी तौलने के बाट-तराजू कहीं से न खरीद कर पौतवाध्यक्ष के यहाँ से ही खरीदें । यदि वे ऐसा नहीं करते तो उन पर बारह पण का दण्ड कर देना चाहिए ।

( ५ ) सुनारों के १. घन ( ठोस गहना ), २. घनसुषिर ( ऊपर से ठोस तथा भीतर से पोले कड़ा आदि गहने ), ३. संयूह्य (ऊपर से मोटा पत्ता चढ़ाये आभूषण),

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१५२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण

(१) तुलाविषममपसारणं विस्रावणं पेटकः पिङ्गश्चेति हरणोपायाः ।
(२) सन्नामिन्युत्कीर्णिका भिन्नमस्तकोपकण्ठी कुशिक्या सकटुकक्ष्या वारिवेल्ल्ययस्कान्ता वा दुष्टतुलाः ।
(३) रूप्यस्य द्वौ भागावेकः शुल्बस्य त्रिपुटकम् । तेनाकरोद्गतमपसार्यते तत्त्रिपुटकापसारितं, शुल्बेन शुल्बापसारितं, वेल्लकेन वेल्लकापसारितं, शुल्बार्धसारेण हेम्ना हेमापसारितम् ।
(४) मूकमूषा पूतिकिट्टः करटकमुखं नाली सन्दंशो जोङ्गनी सुवर्चि-


४. अवलेप्य ( ऊपर से पतला पत्ता चढ़ाये आभूषण ) ५. संघातय ( जुड़े आभूषण तगड़ी, जंजीर आदि ) और ६. वासितक ( रस आदि से वासित आभूषण ), ये छह प्रकार के कार्य होते हैं ।

( १ ) १. तुलाविषम, २. अपसारण, ३. विस्रावण, ४. पेटक और ५. पिङ्ग, ये पाँच तरीके सुनारों के चोरी करने के हैं ।

( २ ) काँटे या तराजू का बढ़ा-घटा होना, जिससे ठीक तरह न तौला जा सके, तुलाविषम कहलाता है । ऐसे कांटे आठ प्रकार के होते हैं : १. सन्नामिनी ( हलके लोहे से बने, जिसको उङ्गली लगाने में सहज ही इधर-उधर झुकाया जा सकता है ), २. उत्कीर्णिका ( जिसके भीतर छेदों में लोहे का चूर्ण भरा हो ), ३. भिन्नमस्तका ( जिसके आगे के हिस्से में छेद हो, जिससे हवा का रुख पाते ही वह झुक जाय ), ४. उपकंठी ( जिसमें बहुत-सी गांठें पड़ी हों ), ५. कुशिक्या ( जिसका पलड़ा दूषित हो ), ६. सकटुकक्ष्या ( जिसकी डोरी अच्छी न हो ), ७, पारिवेल्ल्य ( जो हिलती रहे ) और ८. अयस्कांता ( जिसकी डण्डी में अयस्कांत मणि लगी हो ) ।

( ३ ) नकली द्रव्य को मिलाकर असली द्रव्य को चुरा लेना अपसारण कहलाता है । वह चार प्रकार का होता है : १. दो हिस्सा चांदी और एक हिस्सा तांबा मिला कर जो घोल तैयार किया जाय उसको त्रिपुटक कहते हैं । शुद्ध सोने में यह त्रिपुटक मिला कर उतना सोना निकाल दिया जाय और किसी के खोटा बताने पर कहा जाय कि वह तो खान से ही ऐसा निकला है, इस चोरी नाम त्रिपुटकापसारित है । २. जिस सोने में ताँबा मिला कर चोरी की जाय उसको शुल्बापसारित कहते हैं । ३. लोहा-चाँदी के मिश्रित घोल को वेल्लक कहते हैं; उस वेल्लक को मिलाकर सोने की जो चोरी की जाती है उसको वेल्लकापसारित कहते हैं । ४. ताँबे के साथ आधा सोना मिलाकर उसके बदले में जो चोरी की जाती है उसे हेमापसारित कहते हैं ।

( ४ ) अपसारण के ढङ्ग इस प्रकार हैं : मूकमूषा ( बन्द घरिया ), पूतिकिट्ट ( लोहे का मैल ), करटकमुख ( सोना कतरने की कैंची ), नाली ( नाल ), संदंश

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प्र० ३० : अ० १४ ] राजकीय स्वर्णकारों के कर्तव्य १५३

कालवणम्। तदेव सुवर्णमित्यपसारणमार्गाः। पूर्वप्रणिहिता वा पिण्ड-वालुका मूषाभेदादग्निष्ठा उद्ध्रियन्ते।
(१) पश्चाद्बन्धने आचितकपत्रपरीक्षायां वा रूप्यरूपेण परिवर्तनं विस्रावणम्, पिण्डबालुकानां लोहपिण्डबालुकाभिर्वा।
(२) गाढश्चाभ्युद्धार्यश्च पेटकः संयूह्यावलेप्यसङ्घात्येषु क्रियते। सीसरूपं सुवर्णपत्रेणावलिप्तमभ्यन्तरमष्टकेन बद्धं गाढपेटकः। स एव पटलसम्पुटेष्वभ्युद्धार्यः। पत्रमाश्लिष्टं यमकपत्रं वावलेप्येषु क्रियते। शुल्बं तारं वा गर्भः पत्राणाम्। संधात्येषु क्रियते शुल्बरूपं सुवर्णपत्रसंहतं प्रमृष्टं सुपार्श्वम्। तदेव यमकपत्रसंहतं प्रमृष्टम्। ताम्रताररूपं चोत्तर-वर्णकः।

( सन्सी ), जोंगनी ( लोहे की छड़ ) सुर्वचिका ( शोरा ) और नमक । उनसे जब कहा जाय कि उन्होंने सोना खोटा कर दिया है, तो झट ये कह देते हैं कि यह आप का दिया हुआ सोना है, यह खान से ही ऐसा निकला है । ये अपसारण के तरीके हैं । या पहिले ही से आग में बारीक बालुका-सी डाल दी जाती है और फिर मूषा को अग्नि में रख कर मूषा को टूट जाने का बहाना करता है और तब मालिक के सामने उस बालुका को सोने में मिला दिया जाता है और उतना ही सोना वह होशियारी से मार लेता है ।

( १ ) किसी बनी हुई वस्तु को पीछे से जोड़ते समय या पात्रों की परीक्षा करते समय खरे सोने की जगह खोटा सोना जोड़ देना विस्रावण कहलाता है । सोने की खान में उत्पन्न बालुका को लोहे की खान में उत्पन्न बालुका से बदल देना भी विस्रावण कहलाता है ।

( २ ) पेटक दो प्रकार का होता है : १. गाठ और १. अभ्युद्धार्य; इसका प्रयोग संयूह्य, अवलेप्य तथा संघात्य कर्मों में किया जाता है । सीसे के पत्ते को सोने के पत्ते से मढ़ कर वीच में लाख से जोड़ देना ही गाठपेटक कहलाता है । वही बन्धन यदि सरलता से खुलने योग्य हो तो उसे अभ्युद्धार्यपेटक कहते हैं । अवलेप्य क्रियाओं में एक ओर या दोनों ओर सोने का पतला सा पत्रा जोड़ कर सोने को चुराया जा सकता है । अथवा बाहर पत्ता लगाने की बजाय सुवर्ण पत्रों के बीच में तांबे या चांदी का पत्ता लगा कर भी सोना चुराया जाता है । संघात्य क्रियाओं में तांबे की वस्तु को एक ओर से सोने के पत्ते से मढ़कर उस हिस्से को खूब चमकदार एवं सुन्दर बना दिया जाता है । उसी तांबे की वस्तु को दोनों ओर से इसी प्रकार चमकदार एवं सुन्दर सोने के पत्तों से मढ़कर उतना ही असली सोना हड़प लिया जाता है ।

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१५४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण

(१) तदुभयं तापनिकषाभ्यां निश्शब्दोल्लेखनाभ्यां वा विद्यात् । अभ्युद्धार्यं बदराम्ले लवणोदके वा सादयन्ति इति पेटकः ।
(२) घनसुषिरे वा रूपे सुवर्णमृन्मालुकाहिङ्गुलुककल्को वा तप्तोऽवतिष्ठते । दृढवास्तुके वा रूपे बालुकामिश्रजतुगान्धारपङ्को वा तप्तोऽवतिष्ठते । तयोस्तपनमवध्वंसनं वा शुद्धिः । सपरिभाण्डे वा रूपे लवणमुलकया कटुशर्करया तप्तमवतिष्ठते । तस्य क्वाथनं शुद्धिः । अभ्रपटलमष्टकेन द्विगुणवास्तुके वा रूपे बध्यते । तस्यापिहितकाचकस्योदके निमज्जत एकदेशः सीदति । पटलान्तरेषु वा सूच्या भिद्यते । मणयो रूप्यं सुवर्णं वा घनसुषिराणां पिङ्गः । तस्य तापनमवध्वंसनं वा शुद्धिः । इति पिङ्गः ।
(३) तस्माद्वज्रमणिमुक्ताप्रवालरूपाणां जातिरूपवर्णप्रमाणपुद्गललक्षणान्युपलभेत ।


( १ ) इन दोनों प्रकार के पेटकों की शुद्धता जाँचने के लिये उन्हें अग्नि में तपाये, कसौटी पर घिसवाये या हल्की चोट देकर या रेखा खींचकर या किसी तीक्ष्ण वस्तु से निशान देकर उनकी परीक्षा करे । अभ्युद्धार्य पेटक बेरी के कसैले रस में अथवा नमक के पानी में डालकर जाना जाय । ऐसा करने से उसका रङ्ग कुछ लाल-सा हो जाता है ।

( २ ) ठोस या पोले गहनों में सुवर्णभृत्, सुवर्णमालुका ( दोनों विशेष धातुएँ ) और शिंगरफ का चूर्ण अग्नि में तपाकर लगा दिया जाता है और उतना ही शुद्ध सोना निकाल दिया जाता है । जिस आभूषण का आधार मजबूत हो उसमें साधारण धातुओं की बालुका की लाख और सिन्दूर का घोल आग में तपाकर लगा दिया जाता है और उसके बराबर का सोना निकाल दिया जाता है । इस प्रकार के ठोस तथा पोले गहनों को आग में तपाकर उन पर चोट देने से उनकी परीक्षा करनी चाहिए । बुंदेदार मणिबन्ध जैसे गहनों को, नमक की छोटी डलियों के साथ, लपट देने वाली आग में तपाने से उनकी शुद्धि हो जाती है । बेरी के अम्ल रस में उबालकर भी उनकी शुद्धता को जाँचा जा सकता है । अभ्रक को उसके दुगुने सुवर्ण में लाख आदि से जोड़कर भी असली सोना रख लिया जाता है । उसकी परीक्षा के लिए अभ्रक लगे गहनों को बेरी के अम्ल जल में छोड़ देना चाहिये; अभ्रक लगा हिस्सा पानी में तैरता रहेगा । यदि अभ्रक की जगह ताँबा मिलाया गया हो तो सुई से छेदकर उसकी परीक्षा कर लेनी चाहिए । ठोस या पोले गहनों में काँचमणि, चाँदी और खोटा सोना मिलाकर पिंग नामक उपाय द्वारा शुद्ध सोना चुराया जा सकता है । उसको आग में तपाना तथा उसपर हथौड़े की चोट करना ही उसकी शुद्धता का उपाय है ।

( ३ ) इसलिये सौवर्णिक को चाहिए कि वह, वज्र, मणि, मुक्ता और प्रवाल की

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प्र० ३० : अ० १४ ] राजकीय स्वर्णकारों के कर्तव्य १५५

(१) कृतभाण्डपरीक्षायां पुराणभाण्डप्रतिसंस्कारे वा चत्वारो हर-
णोपायाः—परिकुट्टनमवच्छेदनमुल्लेखनं परिमर्दनं वा । पेटकापदेशेन
पृषतं गुणं पिटका वा यत् परिशातयन्ति तत् परिकुट्टनम् । यद् द्विगुण-
वास्तुकानां वा रूपे सीसरूपं प्रक्षिप्याभ्यन्तरमवच्छिन्दन्ति तदवच्छेदनम् ।
यद्घनानां तीक्ष्णेनोल्लिखन्ति तदुल्लेखनम् । हरितालमनःशिलाहिङ्गुलक-
चूर्णानामन्यतमेन कुरुविन्दचूर्णेन वा वस्त्रं संयूह्य यत् परिमृद्नन्ति तत्
परिमर्दनम् । तेन सौवर्णराजतानि भाण्डानि क्षीयन्ते । न चैषां किञ्चिद-
वरुग्णं भवति ।
(२) भग्नखण्डघृष्टानां संयूह्यानां सदृशेनानुमानं कुर्यात् । अवले-
प्यानां यावदुत्पाटितं तावदुत्पाट्यानुमानं कुर्यात् । विरूपाणां वा । तापन-
मुदकपेषणं च बहुशः कुर्यात् ।
(३) अवक्षेपः प्रतिमानमग्निर्गण्डिका भण्डिकाधिकरणी पिच्छः सूत्रं


जाति, उनके रूप, गुण, प्रमाण, पुद्गल और लक्षण आदि को भली-भांति जाने, जिससे कोई व्यक्ति उनका अपहरण न कर सके ।

( १ ) पात्र और आभरण आदि के तैयार हो जाने पर, उनकी परीक्षा करते समय भी सोने आदि का चार प्रकार से अपहरण किया जा सकता है : १. परिकुट्टन से, २. अवच्छेदन से, ३. उल्लेखन से और ४. परिमर्दन से । पूर्वोक्त पेटक ढंग से परीक्षा करने के बहाने जो छोटे टुकड़े या छोटी गोली सुनार काट लिया करते हैं उसे ही परिकुट्टन कहते हैं। पत्रों से जुड़े आभूषणों में सोने मढ़े हुये कुछ सीसा के पत्ते मिलाकर और भीतर से काटकर सोना निकाल लेना ही अवच्छेदन कहलाता है । ठोस गहनों को तेज औजार से खोद देना ही उल्लेखन है । हरताल, सिंगरफ, मैनसिल और कुरुविन्द पत्थर के चूर्ण को कपड़े के साथ सानकर, उससे आभूषणों को रगड़ा जाना हो परिमर्दन कहलाता है । ऐसा करने से आभरण घिस जाते हैं; किन्तु उनपर किसी प्रकार की खरोंच या चोट नहीं दिखाई देती है ।

( २ ) परिकुट्टन अवच्छेदन आदि कपट उपायों से जितने सुवर्ण का अपहरण किया गया हो, उसका ब्योरा, उसके समानजातीय शेष अवयवों से प्राप्त करना चाहिए । जिन आभूषणों पर अवलेप्य का प्रयोग किया गया हो, उस पर से कटे सोने के टुकड़े को देखकर उसकी क्षति का अनुमान किया जाय । जिन आभूषणों में अधिक खोटा माल मिला दिया गया हो उनकी हानि का परिमाण, उनके सदृश दूसरे आभूषणों को तौलकर जाना जाय । उनको आग में तपाकर पानी में छोड़ दिया जाय और तब हथौड़े से चोट करके उनकी शुद्धता को जाँचा जाय ।

( ३ ) अपहरण के और भी तरीके हैं : १. अवक्षेप ( हाथ की सफाई से खरे

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१५६कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ दूसरा अधिकरण

चेल्लं बोल्लनं शिर उत्सङ्गो मक्षिका स्वकायप्रेक्षा दृतिरुदकशेरावमग्निष्ठ-
मिति काचं विद्यात् ।
(१) राजतानां विस्रं मलग्राहि परुषं प्रस्तीतं विवर्णं वा दुष्टमिति विद्यात् ।
(२) एवं नवं च जीर्णं च विरूपं चापि भाण्डकम् ।
परीक्षेतार्त्ययं चैषां यथोद्दिष्टं प्रकल्पयेत् ॥

इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे विशिखायां सौवर्णिकप्रचारो नाम चतुर्दशोऽध्यायः, आदितश्चतुस्त्रिंशः ।

—: ० :—


माल को लेकर खोटा माल भिड़ा देना, ) २. प्रतिमान ( बदली करके चुरा लेना ), ३. अग्नि के बीच से चुरा लेना, ४. गाण्डिका ( पीटने के बहाने ), ५. भण्डिका ( घरिया में रखने के बहाने ), ६. अधिकरणी ( लोहे के पात्र में रखने के बहाने ), ७. पिच्छ ( मोर-पेंच से चुराना ), ८. सूत्र ( कांटे की डोरी के बहाने ), ९. चेल्ल ( वस्त्र में छिपा लेना ), १०. बोल्लन ( कोई किस्सा छेड़कर ) ११. उत्संग ( गोद या गुप्त अंग में छिपाकर ), १२. मक्षिका ( मक्खी उड़ाने के बहाने पिघली हुई धातु को अपने अङ्ग में लगा देना ) तथा १३. पसीना, १४. धौकनी, १५. जल का शकोरा और १६. आग में डाले हुये खोटे माल आदि के बहाने से सोना-चाँदी चुराया जा सकता है ।

( २ ) मिलावटी चाँदी के आभूषणों में पाँच प्रकार के दोष होते हैं : १. विस्र होना ( दुर्गन्ध ), २. मलिन हो जाना, ३. कठोर हो जाना, ४. खुरदुरा हो जाना और ५. रङ्ग बदल जाना ।

( १ ) इस प्रकार नये और पुराने विरूप हुए पात्रों या आभूषणों की भली-भांति परीक्षा कर लेनी चाहिए; और फिर मिलावट के अनुसार ही अपराधियों पर दण्ड की व्यवस्था करनी चाहिए।

अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में विशिखा में सौवर्णिक-प्रचार नामक चौदहवाँ अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण ३१कोष्ठागाराध्यक्षः
अध्याय १५

(१) कोष्ठागाराध्यक्षः सीताराष्ट्रक्रयिमपरिवर्तकप्रामित्यकापमित्यक-सिंहनिकान्यजातव्ययप्रत्यायोपस्थानान्युपलभेत ।
(२) सीध्यक्षोपनीतः सस्यवर्णकः सीता ।
(३) पिण्डकरः, षड्भागः सेनाभक्तं, बलिः, करः, उत्सङ्गः, पार्श्वं, पारिहीणिकम्, औपायनिकं, कौष्ठेयकं च राष्ट्रम् ।
(४) धान्यमूल्यं कोशनिर्हारः प्रयोगप्रत्यादानं च क्रयिमम् ।
(५) सस्यवर्णानामर्घान्तरेण विनिमयः परिवर्तकः ।


कोष्ठागार का अध्यक्ष

( १ ) कोष्ठागार ( कोठार ) के अध्यक्ष ( कोठारी ) को चाहिए कि वह १. सीता, २. राष्ट्र, ३. क्रयिम, ४. परिवर्तक, ५. प्रामित्यक, ६. आपमित्यक, ७. सिंहनिका, ८. अन्यजात, ९. व्ययप्रत्याय और १०. उपस्थान, इन दस बातों के संबंध में अच्छी जानकारी प्राप्त करे ।

( २ ) राजकीय कर के रूप में एकत्र धान्य को सीता कहा जाता है; उसको एकत्र करने वाले अधिकारी को सीताध्यक्ष कहते हैं । कोष्ठागार के अध्यक्ष को चाहिए कि वह शुद्ध एवं पूरा सीता लेकर उसको व्यवस्था से रखे ।

( ३ ) राष्ट्र के दस भेद होते हैं : १. पिण्डकर ( गाँवों से वसूल किया जाने वाला नियत राजकीय कर ) २. षड्भाग ( राजा को दिया जाने वाला अन्न का छठा भाग ), ३. सेनाभक्त ( युद्धकाल में विशेष रूप से निर्धारित कर ), ४. बलि ( छठे भाग के अतिरिक्त कर ), ५. कर ( जलाशयों और जंगलों का कर ), ६. उत्संग ( राजकुमार के जन्मोत्सव पर दी जाने वाली भेंट ), ७. पार्श्व ( नियत कर के अतिरिक्त कर ) ८. पारिहीणिक ( गाय बच्छियों के नुकसान पर दंड रूप में प्राप्त धन ), ९. औपायनिक ( भेंट स्वरूप प्राप्त धन ) और १०. कौष्ठेयक ( राजधन से बने हुए तालाबों तथा बगीचों का कर ) ।

( ४ ) क्रयिक तीन प्रकार का होता है : १. धान्यमूलक ( धान्य को बेच कर प्राप्त हुआ धन ), २, कोशनिर्हार ( धन देकर खरीदा हुआ अन्न ) और ३. प्रयोग-प्रत्यादान ( ब्याज आदि से प्राप्त धन ) ।

( ५ ) एक अनाज देकर उसके बदले दूसरा अनाज लेना परिवर्त्तक कहलाता है ।

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१५८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण

(१) सस्ययाचनमन्यतः प्रामित्यकम् ।
(२) तदेव प्रतिदानार्थमापमित्यकम् ।
(३) कुट्टकरोचकसक्तुशुक्तपिष्टकर्म तज्जीवनेषु तैलपीडनमौरभ्र-चाक्रिकेष्विक्षूणां च क्षारकर्म सिंहनिका ।
(४) नष्टप्रस्मृतादिरन्यजातः ।
(५) विक्षेपव्याधितान्तरारम्भशेषं च व्ययप्रत्यायः ।
(६) तुलामानान्तरं हस्तपूरणमुत्करो व्याजी पर्यूषितं प्रार्जितं चोपस्थानमिति ।
(७) धान्यस्नेहक्षारलवणानाम् ।
(८) धान्यकल्पं सीताध्यक्षे वक्ष्यामः । सर्पिस्तैलवसामज्जानः स्नेहाः ।
(९) फाणितगुडमत्स्यण्डिकाखण्डशर्कराः क्षारवर्गः ।


( १ ) किसी मित्र आदि से सहायता रूप में ऐसा अन्न लेना, जो फिर लौटाया न जाय, प्रामित्यक कहलाता है ।

( २ ) ब्याज सहित पुनः लौटा देने के वायदे पर लिया हुआ अन्न आदि कर्ज । आपमित्यक कहलाता है ।

( ३ ) कूट-पीस कर, छान-बीन कर, सत्तू पीस कर, गन्ना आदि को पेर कर, आटा पीस कर, तिलों का तेल निकाल कर, भेड़ों के बाल काट कर और गुड़, राव, शक्कर आदि पर आजीविका निर्भर करने वाले लोगों से जो कर लिया जाता है उसे सिंहनिका कहते हैं ।

( ४ ) नष्ट हुए तथा भूले हुए धन का नाम अन्यजात है ।

( ५ ) व्ययप्रत्याय तीन प्रकार का होता है : १, विक्षेपशेष (सेना के व्यय से बचा हुआ धन), २, व्यधितशेष (औषधालय के व्यय से बचा धन) और ३, अन्तरारम्भशेष (दुर्ग आदि की मरम्मत से बचा हुआ धन) सब व्ययप्रत्याय धन है ।

( ६ ) बाट-तराजू की पसंघा से, तौलने के बाद मुट्ठी-दो-मुट्ठी दिया हुआ अधिक अन्न, तौली या गिनी हुई वस्तु में कोई दूसरी ही वस्तु मिला देना, छीजन के रूप में ली हुई वस्तु, पिछले वर्ष का बकाया और चतुराई से उपार्जित धन उपस्थान कहलाता है ।

( ७ ) अब इसके उपरान्त धान्य, स्नेह, क्षार और लवण का निरूपण किया जाता है ।

( ८ ) इनमें धान्यवर्ग के पदार्थों का विस्तृत विवरण आगे 'सीताध्यक्ष' नामक प्रकरण में किया जायेगा । घी, तेल, वसा और मज्जा, ये चार प्रकार के स्नेह पदार्थ हैं ।

( ९ ) गन्ने से बने : राभ, गुड़, गुड़खांड़, खांड और शक्कर में क्षारवर्ग के पदार्थ हैं ।

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प्र० ३१ : अ० १५ ] कोष्ठागार का अध्यक्ष १५९

(१) सैन्धवसामुद्रविडयवक्षारसौवर्चलोद्भेद्जा लवणवर्गः ।
(२) क्षौद्रं मार्द्वीकं च मधु ।
(३) इक्षुरसगुल्मधुफाणितजाम्बवपनसानामन्यतमो मेषशृङ्गीपिप्प-
लीक्वाथाभिषुतो मासिकः षाण्मासिकः सांवत्सरीको वा चिद्भिटोर्वारुके-
क्षुकाण्डाम्रफलामलकावसुतः शुद्धो वा शुक्तवर्गः ।
(४) वृक्षाम्लकरमर्दाम्रविदलामलकमातुलुङ्गकोलबदरसौवीरकपरूष-
कादिः फलाम्लवर्गः ।
(५) दधिधान्याम्लादिर्द्रवाम्लवर्गः ।
(६) पिप्पलीमरिचशृङ्गिवेरराजाजीकिराततिक्तगौरसर्षपकुस्तुम्बुरुचो-
रकदमनकमरुवकशिग्रुकाण्डादिः कटुकवर्गः ।
(७) शुष्कमत्स्यमांसकन्दमूलफलशाकादि च शाकवर्गः ।
(८) ततोऽर्धमापदर्थं जानपदानां स्थापयेत् । अर्धमुपयुञ्जीत । नवेव
चानवं शोधयेम् ।


( १ ) लवण छह प्रकार का होता है : १. सेंधा, २. समुद्री, ३. विड, ४. जवाक्षार, ५. सज्जीखार और ६. लोना मिट्टी से बना ।

( २ ) शहद दो प्रकार का होता है : क्षौद्र ( मक्खियों द्वारा एकत्र ) और २. मार्द्वीक ( मुनक्का तथा दाख के रस से बनाया हुआ ) ।

( ३ ) सिरका शुक्तिवर्ग का पदार्थ है । ईख का रस, गुड़, शहद, राव, जामुन का रस, कटहल का रस, इनमें से किसी एक को मेढ़ासिंगी और पीपल के क्वाथ के साथ मिलाकर एक मास, छह मास तथा वर्ष भर बन्द करके रखा जाय, और उसके बाद मीठी ककड़ी, कड़ी ककड़ी, ईख, आम का फल एवं आँवला, ये पाँचों चीजें उसमें डाल दी जाँय या न भी डाली जाँय; इस विधि से जो रस तैयार होगा उसे सिरका कहते हैं । एक मास का सिरका निकृष्ट, छह मास का मध्यम और साल भर का उत्तम कहा जाता है ।

( ४ ) इमली, करौंदा आम, अनार, आंवला; खट्टा नीबू, झरबेर बेर, प्योंदी बेर, उन्नाव और फालसा आदि खट्टे रस के फल अम्लवर्गीय हैं ।

( ५ ) दही, काँजी, मट्ठा आदि पनीली खट्टी चीजें द्रववर्गीय हैं ।

( ६ ) पीपल, मिर्च, अदरख, जीरा, चिरायता, सफेद सरसों, धनियां, चोरक, दमनक, मैनफल और सैंजन आदि कडुवे पदार्थ कटुवर्गीय हैं ।

( ७ ) सूखी मछली, सूखा मांस, कन्द, मूल, फल आदि शाकवर्गीय पदार्थ हैं ।

( ८ ) स्नेहवर्ग से लेकर शाकवर्ग तक जितने पदार्थ गिनाये गये हैं, राजा को चाहिए कि, उन सब की उपज का आधा भाग आपत्तिकाल में जनपद की सुरक्ष

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१६० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण

(१) क्षुण्णघृष्टपिष्टभृष्टानामार्द्रशुष्कसिद्धानां च धान्यानां वृद्धिक्षय-प्रमाणानि प्रत्यक्षीकुर्वीत ।
(२) कोद्रवव्रीहीणामर्ध सारः, शालीनामष्टभागोनः, त्रिभागोनो वरककाणाम् प्रियङ्गूणामर्ध सारो नवभागवृद्धिश्च । उदारकस्तुल्यः । यवा गोधूमाश्च क्षुण्णाः ।
(३) तिला यवा मुद्गमाषाश्च घृष्टाः । पञ्चभागवृद्धिर्रोधूमः सक्तवश्च । पादोना कलायचमसी । मुद्गमाषाणामर्धपादोना । शैम्बानामर्ध सारः । त्रिभागोने मसूराणाम् ।
(४) पिष्टमामं कुल्माषश्चाध्यर्धगुणः । द्विगुणो यावकः । पुलाकः पिष्टं च सिद्धम् ।
(५) कोद्रववरकोदारकप्रियङ्गूणां, त्रिगुणमन्नं, चतुर्गुणं व्रीहीणाम्, पञ्चगुणं शालीनाम्, तिमितमपरान्नं द्विगुणमर्धाधिकं विरूढानाम् ।


के लिए सुरक्षित रखे । आधी उपज का उपयोग स्वयं कर ले । इसी प्रकार नई फसल या नया सामान आ जाने पर पुराने स्टाक को उपयोग में ले लिया जाय और उसकी जगह नया स्टाक भर दिया जाय ।

(१) कोष्ठागार के अध्यक्ष को चाहिए कि वह कूटा हुआ, साफ किया हुआ, पीसा हुआ, भूना हुआ, भीगा हुआ, सुखाया हुआ और पकाया हुआ; जितना भी धान्य है; अपने सामने तुलवाकर उसकी घट-बढ़ की जाँच करें ।

(२) उनकी घट-बढ़ का नियम इस प्रकार है : कोदों और धान में आधी भूसी निकल जाती है; बढ़िया धान का भी आधा भाग भूसी में निकल जाता है, लोभिया आदि अनाजों में तीसरा हिस्सा चोकर का निकल जाता है । काकुन में प्रायः आधा हिस्सा भूसी निकल जाती है, किन्तु कभी-कभी उसका नवाँ हिस्सा भी बढ़ जाता है । मोटे चावल में आधा ही भाग बन पाता है, जौ और गेहूं में कूटने पर छीजन नहीं होती है ।

(३) तिल, जौ, मूंग और उड़द भी दलने पर बराबर बने रहते हैं गेहूं और भुने हुए जौ पीसने पर पञ्चमांश बढ़ जाते हैं । मटर पीसने पर चौथाई हिस्सा कम हो जाती है । पीसने पर मूंग और उड़द का आठवाँ हिस्सा कम हो जाता है । ज्वार की फलियों में आधा चोकर निकल जाता है । दलने पर मसूर का तीसरा हिस्सा कम हो जाता है ।

(४) पिसे हुए कच्चे गेहूँ तथा मूंग और उड़द आदि पकाये जाने पर ड्योढ़े हो जाते हैं । पकाये जाने पर चावल और सूजी भी दुगुने हो जाते हैं ।

(५) कोदों, लोभिया, उदारक और कांगनी पकाये जाने पर तिगुने हो जाते

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प्र० ३१ : अ० ३५ ] कोष्ठगाराध्यक्ष के कर्तव्य १६१

(१) पञ्चभागवृद्धिर्भृष्टानाम् । कलायो द्विगुणः लाजा भरुजाश्च । षट्कं तैलमतसीनाम् । निम्बकुशाम्रकपित्थादीनां पञ्चभागः । चतुर्भागिकास्तिलकुसुम्भमधूकेङ्गुदीस्नेहाः ।

(२) कार्पासक्षौमाणां पञ्चपले पलसूत्रम् ।

(३) पञ्चद्रोणे शालीनां द्वादशाढकं तण्डुलानां कलभभोजनम्, एकादशकं व्यालानां, दशकमौपवाह्यानाम्, नवकं सान्नाह्यानाम्, अष्टकं पत्तीनां, सप्तकं मुख्यानां, षट्कं देवीकुमाराणाम्, पञ्चकं राज्ञाम् । अखण्डपरिशुद्धानां वा तण्डुलानां प्रस्थः ।

(४) चतुर्भागः सूपः, सूपषोडशो लवणस्यांशः, चतुर्भागः सर्पिषः तैलस्य वा, एकमार्यभक्तम् । प्रस्थषड्भागः सूपः अर्धस्नेहमवराणाम् । पादोनं स्त्रीणाम् । अर्धं बालानाम् ।


हैं । पकाये जाने पर विरञ्जफूल चावल और बासमती पंचगुने हो जाते हैं । खेत से अधकच्ची हालत में काटा गया अन्न और व्रीहि धान पकाने पर दुगुने ही बढ़ पाते हैं । उन्हें कुछ अच्छी अवस्था में खेत से काटा जाय तो वे ढाई गुना भी बढ़ सकते हैं ।

( १ ) यदि वे भूने जांय तो उनका पंचमांश बढ़ जाता है । भुने हुए मटर, धान और जौ दुगुने हो जाते हैं । पेरने पर अलसी में छटा भाग ही तेल निकलता है । निंबौरी, कुशा; आम की गुठली और कैथे में पाँचवां हिस्सा ही तेल निकलता है । तिल, कुसुम्भ, महुआ और इंगुदी में चौथा हिस्सा ही तेल निकलता है ।

( २ ) पाँच पल कपास और रेशम में एक पल सूत तैयार होता है ।

( ३ ) पाँच द्रोण ( २० आढक ) धान में से कूट-छाटकर जब बारह आढक चावल शेष रह जाता है तब वह हाथी के बच्चों के खाने योग्य होता है । वही बीस आढक धान अधिक साफ कर देने पर जब ग्यारह आढक बचा रह जाय तो उन्मत्त हाथियों के खाने योग्य; जब दसवाँ हिस्सा रह जाय तो राज-सवारी के हाथियों के खाने योग्य; जब नवाँ हिस्सा रह जाय तो युद्धोपयोगी हाथियों के खाने योग्य; आठवाँ हिस्सा रह जाय तो पैदल सेना के भोजन योग्य; जब सातवाँ हिस्सा रह जाय तो प्रधान सेनापति के योग्य; जब छठा हिस्सा रह जाय तो रानियों एवं राजकुमारों के भोजन योग्य और जब साफ करते-करते बीस आढक में से पाँच आढक ही बचा रह जाय तो वह राजाओं के भोजन योग्य होता है । अथवा उस बीस आढक में से साफ और साबूत एक प्रस्थ दाना निकालकर राजा के उपयोग के लिए लेना चाहिए ।

( ४ ) प्रस्थ का चौथा हिस्सा दाल, दाल का सोलहवां हिस्सा नमक, दाल का चौथा हिस्सा घी या तेल; इतना एक आर्य की भोजन-सामग्री है । छोटी स्थिति

११ कौ०

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१६२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण

(१) मांसपलविंशत्या स्नेहार्धकुडुवः, पलिको लवणस्यांशः, क्षार-पलयोः, द्विधरणिकः कटुकयोगः, दध्नश्चार्धप्रस्थः ।
(२) तेनोत्तरं व्याख्यातम् । शाकानामध्यर्धगुणः, शुष्काणां द्विगुणः, स चैव योगः ।
(३) हस्त्यश्वयोस्तदध्यक्षे विधाप्रमाणं वक्ष्यामः । बलीवर्दानां माषद्रोणं यवानां वा पुलाकः । शेषमश्वविधानम् । विशेषो—घाणपिण्याकतुला कणकुण्डकं दशाढकं वा ।
(४) द्विगुणं महिषोष्ट्राणाम् । अर्धद्रोणं खरपृषतरोहितानाम् । आढकमेणकुरङ्गाणाम् । अर्धाधिकमजैलकवराहाणां द्विगुणं वा कणकुण्डकम् । प्रस्थौदनः शुनाम् । हंसक्रौञ्चमयूराणामर्धप्रस्थः । शेषाणामतो मृगपशुपक्षिव्यालानामेकभक्तादनुमानं ग्राहयेत् ।

के नौकरों के लिए प्रस्थ का षष्ठांश दाल, प्रस्थ का अष्टमांश घी या तेल और बाकी सामग्री पहिले जैसी होनी चाहिए । उसमें चौथाई भाग कम स्त्रियों के लिए और उसका आधा हिस्सा सामान बालकों के लिए होना चाहिए ।

(१) मांस पकाने के लिए बीस पल मांस में आधी कुडुव घी या तेल, एक पल नमक या नमक की जगह एक पल सज्जीखार या जवाखार, दो धरण मसाला, और आधा प्रस्थ (दो कुडुव) दही डालना चाहिए ।

(२) इससे कम-ज्यादा मांस पकाना हो तो उक्त अनुपात से ही उसमें सामान डालना चाहिए । हरे शाक में, मांस के लिए ऊपर जो अनुपात बताया गया है, उसकी ड्योढ़ी मात्रा उपयोग में लानी चाहिए । सूखे शाक अथवा सूखे मांस में वही सामग्री दुगुनी करके डालनी चाहिए ।

(३) हाथी और घोड़े की खुराक का वर्णन आगे चलकर 'अश्वाध्यक्ष' तथा 'हस्त्यध्यक्ष' प्रकरण में किया जायेगा । बैलों के लिए एक द्रोण उड़द तथा उतने ही अध उबले जौ देने चाहिए । बाकी खुराक उनकी घोड़ों की खुराक जैसी है । घोड़ों की अपेक्षा बैलों को सूखे तिलों के कल्क के सौ पल और दस आढक चावलों की बनी भूसी अधिक देनी चाहिये ।

(४) भैंसों और ऊँटों के लिए बैलों से दुगुनी खुराक होनी चाहिए । गधा और हिरणों को वही सामग्री आधा द्रोण (दो आढक) देनी चाहिए । एण और कुरंग जाति के हिरणों को वही भोजन एक आढक देना चाहिए । वही खुराक बकरी भेड़ ताथा सूअरों को आधा आढक; अथवा चावल की कनकी और भूसी मिलाकर एक आढक खुराक देनी चाहिए । कुत्तों को एक प्रस्थ भात देना चाहिए । हंस, क्रोंच और मोरों की आधा प्रस्थ खुराक है । इनके अतिरिक्त जंगली या पालतू जितने भी पशु

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प्र० ३१ : अ० १५ ] कोष्ठागाराध्यक्ष के कर्तव्य १६३

(१) अङ्गारांस्तुषान् लोहकर्मान्तभित्तिलेप्यानां हारयेत् । कणिकाः दासकर्मकरसूपकाराणाम् । अतोऽन्यदौदनिकापूपिकेभ्यः प्रयच्छेत् ।

(२) तुलामानभाण्डं रोचनीदृषन्मुसलोलूखलकुट्टकरोचकयन्त्रपत्रकशूर्पचालनिकाकण्डोलीपिटकसम्मार्जन्यश्चोपकरणानि ।

(३) मार्जकारक्षकधारकमापकमापकदायकदापकशलाकाप्रतिग्राहकदासकर्मकरवर्गश्च विष्टिः ।

(४) उच्चैर्धान्यस्य निक्षेपो मूताः क्षारस्य संहताः ।
मृत्काष्ठकोष्ठाः स्नेहस्य पृथिवी लवणस्य च ॥

इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे कोष्ठागाराध्यक्षो नाम पञ्चदशोऽध्यायः,
आदितः पञ्चत्रिंशः ।

—: ० :—


पक्षी हैं, उनको एक दिन खिलाकर, उसी अनुपात से उनकी खुराक निर्धारित कर लेनी चाहिए ।

( १ ) कोयला, चोकर और भूसी आदि सामग्री लुहारों तथा मकान पोतने वालों को दे देनी चाहिए । चावलों की कनकी क्रीतदासों, दूसरे कर्मकरों तथा रसोइयों को दे देनी चाहिए । इसके अतिरिक्त जो कुछ बचे, वह साधारण अन्न पकाने वालों तथा पकवान बनाने वाले नौकरों में वितरित कर देना चाहिए ।

( २ ) भोजनालय में नियमित रूप से उपयोग में आनेवाली सामग्री की तालिका इस प्रकार है : तराजू, बाट, चक्की, सिल-लोढ़ा, मूसल, ओखली, धान कूटने का मूसल, आटा पीसने की चक्की, सूप, छलनी, कडी, पिटारी और झाडू ।

( ३ ) झाडू लगाने वाला, कोष्ठागार का रक्षक, तौलने वाला, तुलवाने वाला अधिकारी, समान देने वाला, देने वाला अधिकारी, बोझ उठाने वाला, क्रीतदास और चाकर, ये सब विष्टि कहलाते हैं ।

( ४ ) अनाज को जमीन के स्पर्श से ऊपर रखना चाहिए; गुड़ और राख आदि चीजें ऐसी जगह रखनी चाहिए, जहाँ सील न पहुँच सके; घी और तेल के रखने के लिए मृतदान या लकड़ी के पात्र होने चाहिये; और नमक को जमीन पर किसी बर्तन पर रख लेना चाहिए ।

अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में कोष्ठागाराध्यक्ष नामक
पन्द्रहवाँ अध्याय समाप्त ।

—: ० :—

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प्रकरण ३२
अध्याय १६

पण्याध्यक्षः

(१) पण्याध्यक्षः स्थलजलजानां नानाविधानां पण्यानां स्थलपथवारिपथोपयातानां सारफल्ग्वर्घान्तरं प्रियाप्रियता च विद्यात् । तथा विक्षेपसंक्षेपक्रयविक्रयप्रयोगकालान् ।
(२) यच्च पण्यं प्रचुरं स्यात्तदेकीकृत्यार्घमारोपयेत् । प्राप्तेऽर्घे वार्घान्तरं कारयेत् ।
(३) स्वभूमिजानां राजपण्यानामेकमुखं व्यवहारं स्थापयेत्, परभूमिजानामनेकमुखम् । उभयं च प्रजानामनुग्रहेण विक्रापयेत् । स्थूलमपि च लाभं प्रजानामौपघातिकं वारयेत् । अजस्रपण्यानां कालोपरोधं संकुलदोषं वा नोत्पादयेत् ।


पण्य का अध्यक्ष

(१) पण्य के अध्यक्ष को चाहिए कि वह स्थल-जल में उत्पन्न तथा स्थल-जलमार्ग से बिक्री के लिए आई हुई अनेक प्रकार की बहुमूल्य एवं अल्पमूल्य वस्तुओं के तारतम्य और उनकी लोकप्रियता ( माँग ) तथा अप्रियता ( अरुचि ) आदि के संबंध में अच्छी तरह जानकारी प्राप्त करे । उसको इस बात का भी पता होना चाहिए कि कम चीज को बढ़ाने, बढ़ी हुई को घटाने, बेची जाने योग्य वस्तु को खरीदने एवं खरीदी हुई वस्तु को बेच देने का उपयुक्त समय कौन है ।

(२) जो विक्रेय वस्तु अधिक तादात में उपलब्ध हो, पण्याध्यक्ष को चाहिए कि, उसे एकत्र कर व्यापार-कौशल से पहिले तो उसका दाम बढ़ा दे और जब समझ ले कि उसमें उचित लाभ हो गया है, तो फिर उसका भाव कम करके उसको बेचे ।

(३) अपने राज्य में उत्पन्न सरकारी वस्तुओं की बिक्री का प्रबंध एक ही जगह किसी नियत स्थान पर करना चाहिए । दूसरे देश में उत्पन्न वस्तुओं का विक्रय अनेक स्थानों में करना चाहिए । स्वदेश और परदेश की वस्तुओं की बिक्री का ऐसा प्रबंध करना चाहिए, जिससे प्रजा को किसी प्रकार का कष्ट न हो । यदि किसी वस्तु में अधिक लाभ की संभावना हो, किन्तु उससे प्रजा को कष्ट पहुँचता हो, तो राजा को वह कार्य तत्काल रुकवा देना चाहिए । जल्दी ही बिक जाने योग्य वस्तुओं को रोके रखना अथवा उनको बेचने का ठेका किसी एक व्यक्ति को देकर पुनः लोभ-वश वह ठेका दूसरे को देना, सर्वथा अनुचित है ।

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प्र० ३२ : अ० १७ ] पण्य का अध्यक्ष १६५

(१) बहुमुखं वा राजपण्यं वैदेहकाः कृतार्थं विक्रीणीरन् । छेदानुरूपं च वैधरणं दद्युः ।
(२) षोडशभागो मानव्याजी । विंशतिभागस्तुलामानम् । गण्यपण्यानामेकादशभागः ।
(३) परभूमिजं पण्यमनुग्रहेणावाहयेत् । नाविकसार्थवाहेभ्यश्च परिहारमायतिकमं दद्यात् । अनभियोगश्चार्थिष्वागन्तूनामन्यत्रसभ्योपकारिभ्यः ।
(४) पण्याधिष्ठातारः पण्यमूल्यमेकमुखं काष्ठद्रोण्यामेकच्छिद्रापिधानायां निदध्युः । अह्नश्चाष्टमे भागे पण्याध्यक्षस्यार्पयेयुः इदं विक्रीतमिदं शेषमिति । तुलामानभाण्डकं चार्पयेयुः । इति स्वविषये व्याख्यातम् ।
(५) परविषये तु—पण्यप्रतिपण्ययोरर्घं मूल्यं च आगमय्य शुल्कवर्त्तन्यातिवाहिकगुल्मतरदेयभक्तभाटकव्ययशुद्धमुदयं पश्येत् । असत्युदये भाण्डनिर्वहणेन पण्यप्रतिपण्यार्घेण वा लाभं पश्येत् । ततः सारपादेन स्थलव्यवहारमध्वना क्षेमेण प्रयोजयेत् । अटव्यन्तपालपुरराष्ट्रमुख्यैश्च प्रतिसंसर्गं गच्छेदनुग्रहार्थम् ।


( १ ) अनेक स्थानों पर बिकने वाली राजकीय वस्तुओं को सभी व्यापारी एक ही भाव से बेचें । यदि बेचते-बेचते मूल्य में कुछ कमी हो जाये तो उस कमी को व्यापारी ही पूरा करें ।

( २ ) गोदाम में सुरक्षित माल का सोलहवाँ भाग कर रूप में राजा को देना चाहिए; उसे व्याजी या मानव्याजी कहा जाता है । तौले जाने वाले माल का बीसवाँ भाग और गिने जाने वाले माल का ग्यारहवाँ भाग राजा के लिए कर में देना चाहिए ।

( ३ ) विदेशी माल को मँगाने में कर आदि की कुछ रियायत होनी चाहिए । नाव तथा जहाज आदि से माल मँगाने वाले व्यापारियों पर राजकर की छूट होनी चाहिए । विदेश से आये व्यापारियों को भी राजा बिना ही अभियोग ( प्रतिषेध ) के ऋण देने की व्यवस्था करे; किन्तु विदेशी व्यापारियों के सहयोगियों पर अभियोग होना चाहिए ।

( ४ ) राजकीय वस्तुओं को बेचने वाले व्यापारी, सायंकाल आठवें पहर में पण्याध्यक्ष के पास बिक्री का सब रुपया, लकड़ी की एक बंद संदूकची में रख कर उपस्थित हों, और बतायें कि इतना माल बिक गया है यथा इतना बाकी है । माप तौल के बाँटों को भी पण्याध्यक्ष के सुपुर्द कर दें । यहाँ तक अपने राज्य की विक्रेय वस्तुओं के संबंध में कहा गया है ।

( ५ ) परदेश में किस रीति से व्यापार किया जाता है, उसका विधान इस प्रकार है : निर्यात-व्यापार के संबंध में पण्याध्यक्ष को पहिली बात तो यह समझनी चाहिए कि स्वदेश तथा विदेश में बेची जाने वाली किन चीजों के मूल्य में परस्पर न्यूनाधिक्य है; इसके अतिरिक्त बिक्रीकर, सीमांत अधिकारी का टैक्स, सुरक्षा के

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१६६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण

(१) आपदि सारमात्मानं वा मोक्षयेत् । आत्मनो वा भूमिमप्राप्तः सर्वदेयविशुद्धं व्यवहरेत् ।
(२) वारिपथे च यानभाटकपथ्यदनपण्यप्रतिपण्यार्घप्रमाणयात्राकाल-भयप्रतीकारपण्यपत्तनचारित्राण्युपलभेत ।
(३) नदीपथे च विज्ञाय व्यवहारं चरित्रतः ।
यतो लाभस्ततो गच्छेदलाभं परिवर्जयेत् ॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे पण्याध्यक्षो नाम षोडशोऽध्यायः,
आदितः षट्त्रिंशः ।
— : ० : —

लिए पुलिस को मार्गकर, जंगल के रक्षक का कर, नदी पार करने का कर, अपने भोजनादि का व्यय और भाड़ा आदि निकाल कर कितना बच सकेगा; इस पर भी विचार करे । इस प्रकार हिसाब लगाने पर कुछ बचत न दीख पड़े तो अपने माल को विदेश में ले जाकर, भविष्य में लाभ की प्रतीक्षा करते हुए, उसके विक्रय की व्यवस्था करे; अथवा अपने माल से वहाँ के लोकप्रिय माल को बदल कर उस रूप में अपने लाभ की बात सोचे । यदि विचारित योजना सफल होती दिखाई दे तो लाभ का चौथा भाग व्यय करके सुरक्षित स्थल मार्ग के द्वारा व्यापार करना आरंभ कर दे । जंगल तथा सीमा के रक्षकों से, नगर-प्रधान और राष्ट्र के प्रतिष्ठित पुरुषों से घनिष्ठता बढ़ानी चाहिए, जिससे कि व्यापार में कोई बाधा न आने पावे ।

( १ ) विदेश मे व्यापार करते हुए यदि आपत्ति आ पड़े तो सर्वप्रथम रत्नों की और अपनी रक्षा करनी चाहिए । यदि दोनों की रक्षा संभव न हो तो रत्नों का लोभ छोड़ कर वह अपने को बचाये । जब तक वह अपने देश में न लौट आवे तब तक वहाँ के जो सरकारी टैक्स हो उनको नियमपूर्वक अदा करते हुए अपने व्यापार को संभाले रखे ।

( २ ) जल-मार्ग से व्यापार करने वाले व्यापारी को यानभाटक ( नाव तथा जहाज का किराया ); पथ्यदन ( मार्ग में खाने-पीने का खर्च ), पण्य तथा प्रतिपण्य के मूल का प्रमाण ( अपनी तथा पराई विक्रेय वस्तु के मूल्य का तारतम्य ), यात्रा-काल ( किस ऋतु में यात्रा करनी चाहिए, उसकी अवधि ), भयप्रतीकार ( चोर आदि से सुरक्षा के उपाय ), और गंतव्य देश के आचार-व्यवहारों की जानकारी आदि के संबंध में बारीकी से विचार करने के अनंतर ही यात्रा करनी चाहिए ।

( ३ ) इसी प्रकार नदी मार्ग के संबंध मे भी उक्त बातों को ध्यान में रखकर, गंतव्य देश के आचार-विचार, चरित्र आदि का ज्ञान प्राप्त कर, जिस मार्ग से अधिक लाभ की संभावना हो उसी का अनुसरण करे; जहां लाभ की आशा न हो, और कष्ट भी अधिक मिले, उस मार्ग को छोड़ देना चाहिए ।

अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में पण्याध्यक्ष नामक सोलहवां अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण ३३कुप्याध्यक्षः
अध्याय १७

(१) कुप्याध्यक्षो द्रव्यवनपालैः कुप्यमानाययेत् । द्रव्यवनकर्मान्तांश्च प्रयोजयेत् द्रव्यवनच्छिदां च देयमत्ययं च स्थापयेदन्यत्रापद्भ्यः ।
(२) कुप्यवर्गः—शाकतिनिशधन्वनार्जुनमधूकतल कसा लशिश पारिमे-दराजादनशिरीषखदिरसरलतालसर्जश्वकर्णसोमवल्ककश। म्नप्रियकधवादिः सारदारुवर्गः ।
(३) उटजचिमियचापवेणुवंश सातीनकण्टकभाल्लूकादिर्वेणुवर्गः ।
(४) वेत्रशीकवल्लीवाशीश्यामलतानागलतादिर्वल्लीवर्गः ।


कुप्य का अध्यक्ष

( १ ) कुप्य के अध्यक्ष को चाहिए कि वह जंगल की रक्षा में नियुक्त पुरुषों द्वारा बढ़िया-बढ़िया लकड़ी मंगवाये । लकड़ी से बनने योग्य दूसरे कार्यों को भी वही करवाये । लकड़ी काटकर जीविकोपार्जन करने वाले लोगों को वह वेतन पर नियुक्त कर ले और आज्ञा का उल्लंघन करने पर उनके लिए दण्ड भी निर्धारित कर ले; किन्तु किसी आपत्ति के कारण कार्य में विघ्न उपस्थित हो जाय तो उन्हें दण्ड न दिया जाय ।

( २ ) कुप्यवर्ग में सर्वप्रथम सारदारु वर्ग ( सर्वोत्तम लकड़ी ) का निरूपण किया जाता है : शाक ( सागून ), तिनिश ( तैहुँआ ), धन्वस ( पीपल ), अर्जुन, मधुक ( महुआ ), तिलक ( फरास ), साल, शिंशपा ( शीशम ), अरिमेद ( दुर्गन्धित खैर ), राजादन ( खिरनी ), शिरीष ( सिरसा ), खदिर ( खैर ), सरल ( देवदारु) ताल ( ताड़ ), सर्ज ( साल ), अश्वकर्ण ( बड़ा साल ), सोमवल्क ( सफेद खैर ), कश ( बबूल ), आम्र, प्रियक ( कदंब ), धव ( गूलर ) आदि सर्वोत्तम लकड़ी सारदारुवर्ग के अन्तर्गत हैं ।

( ३ ) उटज ( खोखला ), चिमिय ( ठोस ), चाप ( कुछ पोला और ऊपर से खुरदरा ), वेणु ( चिकना, पोला ), वंश ( लंबी पोरियों वाला ), सातीन, कंटक ( दोनों काँटेदार ) और भाल्लूक ( मोटा, लंबा, कंटकरहित ), ये सब बाँसों के भेद हैं ।

( ४ ) वेत्र ( बेंत ), शीकबल्ली ( हंसबल्ली ), वाशी ( सफेद फूलों की लता), श्यामलता ( काली लता ), नागलता, ( नागबल्ली ) आदि सब लताओं के भेद हैं ।