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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

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Page 234
प्रकरण ३०विशिखायां सौवर्णिक प्रचारः
अध्याय १४

(१) सौवर्णिकः पौरजानपदानां रूप्यसुवर्णमावेशनिभिः कारयेत् । निर्दिष्टकालकार्यं च कर्म कुर्युः, अनिर्दिष्टकालं कार्यापदेशम् ।

(२) कालातिपातने पादहीनं वेतनं तद्द्विगुणश्च दण्डः । कार्यस्यान्यथाकरणे वेतननाशः, तद्द्विगुणश्च दण्डः ।

(३) यथावर्णप्रमाणं निक्षेपं गृह्णीयुस्तथाविधमेवार्पयेयुः, कालान्तरादपि ब तथाविधमेव प्रतिगृह्णीयुरन्यत्र क्षीणपरिशीर्णाभ्याम् ।

(४) आवेशनिभिः सुवर्णपुद्गललक्षणप्रयोगेषु तत्तज्जानीयात् ।


राजकीय स्वर्णकारों के कर्तव्य

( १ ) सौवर्णिक ( राज्य का प्रधान आभूषण व्यापारी ) को चाहिए कि वह नगरवासियों और जनपदवासियों के सोने-चाँदी के आभूषणों का कार्य शिल्पशाला में बैठकर काम करने वाले सुनारों द्वारा कराये । सुनारों को चाहिए कि वे समय और वेतन को नियत करके ही कार्य करें; यदि कार्य की अधिकता हो या वायदे की अवधि बीत रही हो, तो उन्हें नियत समय से भी अधिक कार्य करना चाहिए ।

( २ ) यदि कोई सुनार वायदे के अनुसार कार्य पूरा न करे तो उसके वेतन का चौथाई भाग जब्त करके उसे वेतन का दुगुना दण्ड दिया जाय । यदि कोई सुनार अभीष्ट जेवर को न बनाकर दूसरा ही जेवर बनाकर दे, तो उसकी मजदूरी जब्त कर उसे नियत वेतन का दुगुना दण्ड दिया जाय ।

( ३ ) सुनारों को चाहिए कि वे जिस प्रकार और जितने वजन का सोना आदि आभूषण बनाने के लिए लें, उसी प्रकार और उतने ही वजन का आभूषण बना कर वापिस करें । सुनार के परदेश चले जाने अथवा उसकी मृत्यु हो जाने के कारण यदि सुनार के घर सोना बहुत दिनों तक पड़ा रह जाय तो उसके उत्तराधिकारियों से वह सोना वापिस ले लेना चाहिए । यदि सोना नष्ट हो गया हो या छीज गया हो तो सुनार से उसका मुआवजा भी लेना चाहिए ।

( ४ ) सौवर्णिक को चाहिए कि वह सुनारों के द्वारा किए जाने वाले पुद्गल तथा लक्षण आदि कपट प्रयोगों के संबंध में भी अच्छी जानकारी रखे ।