कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in context| प्रकरण ३२ |
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| अध्याय १६ |
पण्याध्यक्षः
(१) पण्याध्यक्षः स्थलजलजानां नानाविधानां पण्यानां स्थलपथवारिपथोपयातानां सारफल्ग्वर्घान्तरं प्रियाप्रियता च विद्यात् । तथा विक्षेपसंक्षेपक्रयविक्रयप्रयोगकालान् ।
(२) यच्च पण्यं प्रचुरं स्यात्तदेकीकृत्यार्घमारोपयेत् । प्राप्तेऽर्घे वार्घान्तरं कारयेत् ।
(३) स्वभूमिजानां राजपण्यानामेकमुखं व्यवहारं स्थापयेत्, परभूमिजानामनेकमुखम् । उभयं च प्रजानामनुग्रहेण विक्रापयेत् । स्थूलमपि च लाभं प्रजानामौपघातिकं वारयेत् । अजस्रपण्यानां कालोपरोधं संकुलदोषं वा नोत्पादयेत् ।
पण्य का अध्यक्ष
(१) पण्य के अध्यक्ष को चाहिए कि वह स्थल-जल में उत्पन्न तथा स्थल-जलमार्ग से बिक्री के लिए आई हुई अनेक प्रकार की बहुमूल्य एवं अल्पमूल्य वस्तुओं के तारतम्य और उनकी लोकप्रियता ( माँग ) तथा अप्रियता ( अरुचि ) आदि के संबंध में अच्छी तरह जानकारी प्राप्त करे । उसको इस बात का भी पता होना चाहिए कि कम चीज को बढ़ाने, बढ़ी हुई को घटाने, बेची जाने योग्य वस्तु को खरीदने एवं खरीदी हुई वस्तु को बेच देने का उपयुक्त समय कौन है ।
(२) जो विक्रेय वस्तु अधिक तादात में उपलब्ध हो, पण्याध्यक्ष को चाहिए कि, उसे एकत्र कर व्यापार-कौशल से पहिले तो उसका दाम बढ़ा दे और जब समझ ले कि उसमें उचित लाभ हो गया है, तो फिर उसका भाव कम करके उसको बेचे ।
(३) अपने राज्य में उत्पन्न सरकारी वस्तुओं की बिक्री का प्रबंध एक ही जगह किसी नियत स्थान पर करना चाहिए । दूसरे देश में उत्पन्न वस्तुओं का विक्रय अनेक स्थानों में करना चाहिए । स्वदेश और परदेश की वस्तुओं की बिक्री का ऐसा प्रबंध करना चाहिए, जिससे प्रजा को किसी प्रकार का कष्ट न हो । यदि किसी वस्तु में अधिक लाभ की संभावना हो, किन्तु उससे प्रजा को कष्ट पहुँचता हो, तो राजा को वह कार्य तत्काल रुकवा देना चाहिए । जल्दी ही बिक जाने योग्य वस्तुओं को रोके रखना अथवा उनको बेचने का ठेका किसी एक व्यक्ति को देकर पुनः लोभ-वश वह ठेका दूसरे को देना, सर्वथा अनुचित है ।