Skip to content
SarvaKosh
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 236 of 918

Read in context
Page 236

१५२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण

(१) तुलाविषममपसारणं विस्रावणं पेटकः पिङ्गश्चेति हरणोपायाः ।
(२) सन्नामिन्युत्कीर्णिका भिन्नमस्तकोपकण्ठी कुशिक्या सकटुकक्ष्या वारिवेल्ल्ययस्कान्ता वा दुष्टतुलाः ।
(३) रूप्यस्य द्वौ भागावेकः शुल्बस्य त्रिपुटकम् । तेनाकरोद्गतमपसार्यते तत्त्रिपुटकापसारितं, शुल्बेन शुल्बापसारितं, वेल्लकेन वेल्लकापसारितं, शुल्बार्धसारेण हेम्ना हेमापसारितम् ।
(४) मूकमूषा पूतिकिट्टः करटकमुखं नाली सन्दंशो जोङ्गनी सुवर्चि-


४. अवलेप्य ( ऊपर से पतला पत्ता चढ़ाये आभूषण ) ५. संघातय ( जुड़े आभूषण तगड़ी, जंजीर आदि ) और ६. वासितक ( रस आदि से वासित आभूषण ), ये छह प्रकार के कार्य होते हैं ।

( १ ) १. तुलाविषम, २. अपसारण, ३. विस्रावण, ४. पेटक और ५. पिङ्ग, ये पाँच तरीके सुनारों के चोरी करने के हैं ।

( २ ) काँटे या तराजू का बढ़ा-घटा होना, जिससे ठीक तरह न तौला जा सके, तुलाविषम कहलाता है । ऐसे कांटे आठ प्रकार के होते हैं : १. सन्नामिनी ( हलके लोहे से बने, जिसको उङ्गली लगाने में सहज ही इधर-उधर झुकाया जा सकता है ), २. उत्कीर्णिका ( जिसके भीतर छेदों में लोहे का चूर्ण भरा हो ), ३. भिन्नमस्तका ( जिसके आगे के हिस्से में छेद हो, जिससे हवा का रुख पाते ही वह झुक जाय ), ४. उपकंठी ( जिसमें बहुत-सी गांठें पड़ी हों ), ५. कुशिक्या ( जिसका पलड़ा दूषित हो ), ६. सकटुकक्ष्या ( जिसकी डोरी अच्छी न हो ), ७, पारिवेल्ल्य ( जो हिलती रहे ) और ८. अयस्कांता ( जिसकी डण्डी में अयस्कांत मणि लगी हो ) ।

( ३ ) नकली द्रव्य को मिलाकर असली द्रव्य को चुरा लेना अपसारण कहलाता है । वह चार प्रकार का होता है : १. दो हिस्सा चांदी और एक हिस्सा तांबा मिला कर जो घोल तैयार किया जाय उसको त्रिपुटक कहते हैं । शुद्ध सोने में यह त्रिपुटक मिला कर उतना सोना निकाल दिया जाय और किसी के खोटा बताने पर कहा जाय कि वह तो खान से ही ऐसा निकला है, इस चोरी नाम त्रिपुटकापसारित है । २. जिस सोने में ताँबा मिला कर चोरी की जाय उसको शुल्बापसारित कहते हैं । ३. लोहा-चाँदी के मिश्रित घोल को वेल्लक कहते हैं; उस वेल्लक को मिलाकर सोने की जो चोरी की जाती है उसको वेल्लकापसारित कहते हैं । ४. ताँबे के साथ आधा सोना मिलाकर उसके बदले में जो चोरी की जाती है उसे हेमापसारित कहते हैं ।

( ४ ) अपसारण के ढङ्ग इस प्रकार हैं : मूकमूषा ( बन्द घरिया ), पूतिकिट्ट ( लोहे का मैल ), करटकमुख ( सोना कतरने की कैंची ), नाली ( नाल ), संदंश