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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 233 of 918

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Page 233

प्र० २९ : अ० १३ ] सुवर्णाध्यक्ष के कार्य १४९

(१) कालायसस्यार्धभागाभ्यक्तं कृष्णं भवति। प्रतिलेपिना रसेन द्विगुणाभ्यक्तं तपनीयं शुकपत्रवर्णं भवति। तस्यारम्भे रागविशेषेषु प्रतिवर्णिकां गृह्णीयात्।

(२) तीक्ष्णताम्रसंस्कारं च बुध्येत। तस्माद्वज्रमणिमुक्ताप्रवालरूपाणामपनेयमानं च रूप्यसुवर्णभाण्डबन्धप्रमाणानि चेति।

(३)

समरागं समद्वन्द्वमशक्तं पृषतं स्थिरम्।
सुप्रमृष्टमसंपीतं विभक्तं धारणे सुखम्॥
अभिनीतं प्रभायुक्तं संस्थानमधुरं समम्।
मनोनेत्राभिरामं च तपनीयगुणाः स्मृताः॥

इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे अक्षशालायां सुवर्णाध्यक्षं नाम त्रयोदशोऽध्यायः, आदितस्त्रयस्त्रिंशः।

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(१) सोने का छठा हिस्सा लोहा मिला देने से उसका रंग काला हो जाता है। पिघले हुए लोहे तथा शुद्ध चाँदी से मिला हुआ दुगुना सोना सुवापंखी रंग का हो जाता है। इसी प्रकार पूर्वोक्त नील, आदि रङ्गों के भेद को जानने के लिए प्रत्येक वर्णक को ग्रहण करना चाहिए।

(२) सोने का रङ्ग बदलने के लिए उपयोग में आने वाले लोहे, ताँबे को शुद्ध करना आवश्यक है; इसलिए उनके शुद्ध करने की विधि भली भाँति जान लेनी चाहिए। जिससे वज्रमणि, मुक्ता, प्रवाल आदि उत्तम रत्नों में मिलावट न हो सके और सोने-चाँदी आदि के आभूषण में कोई न्यूनाधिक्य मेल करके गड़बड़ी न कर सके, इसके लिए उत्तम रत्नों और सोना-चाँदी आदि के आभूषणों के संबंध में अच्छी तरह जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए।

(३) १. एक सा रङ्ग होना, २. वजन तथा रूप में समान होना, ३. बीच में गांठ आदि का न होना, ४. टिकाऊ होना, ५. अच्छी तरह चमकाया हुआ होना, ६. ठीक तरह बना हुआ होना, ७. अलग-अलग हिस्सों वाला, ८. पहनने में सुखकर, साफ-सुथरा, १० कांतिमान, ११. अच्छा दिखाई देने वाला, १२. एक जैसी बनावट का, १३. अयुक्त छिद्रों से रहित और १४. मन तथा आँखों को अच्छा लगने वाला, ये चौदह गुण सोने के आभूषणों में होते हैं।

अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में अक्षशाला में सुवर्णाध्यक्ष नामक तेरहवां अध्याय समाप्त।

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