कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
९४ कथासरित्सागर
यहाँ पृष्ठ का देवनागरी पाठ प्रस्तुत है:
९४ कथासरित्सागर
श्रुत्वैवैतदसम्माष्य तमवोचमहं रुषा।
षण्भिर्मासैस्त्वया देवः शिक्षितश्चेत्ततो मया॥१४७॥
संस्कृतं प्राकृतं तद्देशभाषा च सर्वदा।
भाषात्रयमिदं त्यक्तं यन्मनुष्येषु सम्भवेत् ॥१४८॥
शर्ववर्मा ततोऽवादीन्न चैवं करोम्यहम्।
द्वादशाब्दान्वहाम्येष शिरसा तव पादुके॥१४९॥
इत्युक्त्वा निर्गते तस्मिन्नहमप्यगमं गृहम्।
राजाप्युभयतः सिद्धिं मत्वाश्वस्तो बभूव सः॥१५०॥
विहस्तः शर्ववर्मा च प्रतिज्ञां तां सुदुस्तराम्।
पश्यन्सानुशयः सर्वं स्वभार्यायै शशंस तत्॥१५१॥
सापि तं दुःखितावोचत्सङ्कटेऽस्मिंस्तव प्रभो! ।
विना स्वामिकुमारं गतिरन्या न दृश्यते॥१५२॥
तथेति निश्चयं कृत्वा पश्चिमे प्रहरे निशि।
शर्ववर्मा निराहारस्तत्रैव प्रस्थितोऽभवत् ॥१५३॥
तच्च चारमुखाद् बुद्ध्वा मया प्रातर्निवेदितम्।
राज्ञे सोऽपि तदाकर्ण्य किं भवेदित्यचिन्तयत्॥१५४॥
ततस्तं सिंहगुप्ताख्यो राजपुत्रो हितोऽब्रवीत्।
त्वयि खिन्ने तदा देव निर्वेदो मे महानभूत् ॥१५५॥
ततः श्रेयो निमित्तं ते चण्डिकाग्रे निजं शिरः।
छेत्तुं प्रारब्धवानस्मि गत्वास्मान्नगराद् बहिः ॥१५६॥
मम कृपा मुपस्येच्छा सोत्स्यत्येवेत्यवारयत्।
वागन्तरिक्षादथ मां तन्मध्य सिद्धिरस्ति ते॥१५७॥
इत्युक्त्वा नृपमामन्त्र्य सत्वरं शर्ववर्मणः।
पदव्याञ्चारयन् सोऽथ सिंहगुप्तो व्यसर्जंयत् ॥१५८॥
सोऽपि भ्रातृमदा मन्मूलमौनं सुनिश्चित्य।
प्राप स्वामिकुमारस्य शर्ववर्माम्तिकं क्रमात् ॥१५९॥
शरीरनिग्रहेण तपसा तत्र तापितः।
प्रशान्तक्लेशस्य शान्तिभयो यदीप्सितम् ॥१६०॥
आगत्याग्रे तथा राज्ञे पादाभ्यां ग निवेन्ति ।
सिंहगुप्तविशिष्टाभ्यामुदय शर्ववर्मणः ॥१६१॥
इस अनहोनी बात को सुनकर मैंने क्रोध से शर्ववर्मा से कहा कि 'यदि तुम छह महीने में
राजा को व्याकरण पढ़ा दोगे तो मैं संस्कृत प्राकृत और देशभाषा इन तीनों को सदा के लिए
छोड़ दूंगा जो मनुष्यों की बोलचाल में आती हैं॥१४७-१४८॥
तब शर्ववर्मा ने कहा कि यदि मैं ऐसा न कर सकूँगा तो तुम्हारी पादुका को बारह वर्षों
तक सिर पर उठाऊँगा ॥१४९॥
ऐसा कहकर शर्ववर्मा के चले जाने पर मैं भी अपने घर चला गया। राजा ने दोनों ओर
से कार्य-सिद्धि समझकर धैर्य धारण किया॥१५०॥
प्रतिज्ञा से व्याकुल शर्ववर्मा ने अत्यन्त कठिन प्रतिज्ञा कर ली और उसने यह सारी बात
अपनी स्त्री से कही॥१५१॥
शर्ववर्मा की स्त्री अत्यन्त दुःखित होकर बोली—'हे स्वामिन्! इस कठिन संकट के
समय स्वामिकुमार के बिना दूसरी गति नहीं दीखती'॥१५२॥
शर्ववर्मा ने भी ऐसा ही निश्चय किया और रात के चौथे पहर में उठकर बिना भोजन
किये कुमार कार्तिकेय के मन्दिर को चला॥१५३॥
मैंने भी गुप्तचर के द्वारा शर्ववर्मा का जाना जानकर प्रातःकाल राजा से कहा। राजा
भी 'जाने क्या होगा' ऐसा सोचने लगा ॥१५४॥
तब सिंहगुप्त नामक राजपुत्र राजा से बोला कि 'हे महाराज! आपका अस्वास्थ्य
देखकर उस समय मुझे महान् खेद हुआ॥१५५॥
और तब मैं नगर के बाहर चंडिका के मन्दिर में अपना सिर काटने के लिए उद्यत हुआ
॥१५६॥
इतने में ही आकाशवाणी ने कहा-ऐसा मत करो। राजा की इच्छा अवश्य ही पूरी
होगी। इस प्रकार उसने मुझे रोक दिया। सो मेरी समझ से आपको सिद्धि प्राप्त
होगी' ॥१५७॥
ऐसा कहकर और राजा से विचार करके सिंहगुप्त ने शर्ववर्मा के पीछे दो गुप्तचर छोड़
दिये ॥१५८॥
शर्ववर्मा भी केवल वायु-भक्षण करता हुआ मौनी और दृढ़निश्चयी होकर क्रमशः
स्वामिकुमार के स्थान पर पहुँचा ॥१५९॥
शरीर की परवाह न करके किये गये कठोर तप से प्रसन्न होकर स्वामिकार्तिक ने शर्ववर्मा
पर कृपा की और उसे अभीष्ट वर प्रदान किया ॥१६०॥
तब सिंहगुप्त के भेजे हुए अनुचरों ने राजा के सामने आकर शर्ववर्मा की सफलता
बताई ॥१६१॥