कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
५६ कथासरित्सागर
५६ कथासरित्सागर
ऋक्ष मानुषमद्य मे क्षिप यावद् व्रजाम्यहम्।
ऋक्षस्ततोऽब्रवीत्पाप ! न मित्रं घातयाम्यहम् ॥८४॥
क्रमादृक्षे प्रसुप्ते च राजपुत्रे च जाग्रति।
पुनं सिंहोऽब्रवीत्तन्मृक्षं मे क्षिप मानुष! ॥८५॥
तच्छ्रुत्वात्मभयात्तन सिंहस्याराधनाय सः।
क्षिप्तोऽपि नापतन्निम्नमृक्षो दैवप्रचोदितः ॥८६॥
मित्रद्रोहिन्मभोन्मत्त इति शापमवाप्य सः।
तस्य राजसुतस्तत्त्वं वृत्तान्तावगमावधिम् ॥८७॥
प्राप्यैव स्वगृहं प्रातर्हन्मत्तोऽभून्नृपात्मजः।
योगनन्दश्च तद् दृष्ट्वा विषादं सहसागमत् ॥८८॥
अब्रवीच्च स कालऽस्मिञ्जीवेद् वररुचिर्यदि।
ज्ञायेत तत्सर्वं धिक् च तद्वधपाटवम् ॥८९॥
तच्छ्रुत्वा वचनं राज्ञः शकटालो व्यचिन्तयत्।
हन्त कात्यायनस्यायं समयः काल प्रकाशने ॥९०॥
न सोऽत्र मानी तिष्ठेच्च राजा मयि च विश्वसेत्।
इत्यालोच्य स राजानमब्रवीद्याचिताऽभयः ॥९१॥
राजन्ख विषादेन जीवन्वररुचिः स्थितः।
योगनन्दस्ततोऽवादीद्द्रुतमानीयतामिति ॥९२॥
अथाहं शकटारेन योगनन्तान्तिकं हठात्।
आनीतस्तं तथाभूतं राजपुत्रं व्यलोकयम् ॥९३॥
मित्रद्रोहः कृतोऽनेन देवेत्युक्त्वा तथैव सः।
सरस्वतीप्रसादेन वृत्तान्तः कथितो मया ॥९४॥
सतस्तच्छापमुक्तेन स्तुतोऽहं राजसूनुना।
त्वया कथमिवं ज्ञातमित्यपृच्छत्स भूपतिः ॥९५॥
अथाहमवदं राजँल्लक्षणैरनुमानतः।
प्रतिभातञ्च पश्यन्ति सर्वं प्रज्ञावतां धियः ॥९६॥
तद्यथा तिष्ठतां मातस्तथा सर्वमिदं मया।
इति मद्वचनात्साक्षाद्भूद्राजा सञ्जानुतापवान् ॥९७॥
अपानादृतमर्थाश्च परिगृह्यैव मामवान्।
स्वगृहं गतवानस्मि धीर हि विदुषां धनम् ॥९८॥
हे भ्रात तुम इस मनुष्य को पेड़ से नीचे फेंक दो। मैं इसे लेकर चला जाऊँ। भालू बोला—
'रे पापी ! यह मेरा मित्र है। मैं मित्र को मरवाना नहीं चाहता' ॥८४॥
क्रमशः भालू के सोने और राजपुत्र के जागते रहने पर सिंह ने राजपुत्र से कहा—
'हे मनुष्य तुम इस भालू को मेरे लिए पेड़ से नीचे फेंक दो' ॥८५॥
यह सुनकर भय के कारण सिंह को प्रसन्न करने के लिए राजपुत्र ने भालू को नीचे फेंकने
का यत्न किया। आश्चर्य है कि दैवयोग से तत्काल जागा हुआ भालू उसके यत्न करने पर भी नीचे
न गिर सका ॥८६॥
भालू ने राजपुत्र को शाप दिया कि 'हे मित्रद्रोहिन् ! जबतक यह वृत्तान्त प्रकट न होगा
तबतक तू पागल बना रहेगा' ॥८७॥
प्रातःकाल राजकुमार राजभवन पहुँचते ही पागल हो गया। योगनन्द, उसकी यह दशा
देखकर अकस्मात् अत्यन्त दुःखी हुआ ॥८८॥
राजा ने कहा—'यदि इस समय वररुचि जीवित होता तो इस पागलपन
का कारण मालूम होता। उसके मारने में जो मैंने चातुर्य किया इसके लिए मुझे धिक्कार
है' ॥८९॥
राजा की बातें सुनकर मन्त्री शकटाल ने सोचा कि यह अवसर वररुचि को प्रकट करने
का है ॥९०॥
उसने सोचा कि वररुचि मानी है। अब वह यहाँ मन्त्री बनकर न रह सकेगा
और मैं ही एकमात्र सर्वसर्वा रहूँगा। राजा मुझ पर विश्वास करेगा। (तब मैं अपना
बदला निर्द्वन्द्व होकर ले सकूँगा) ऐसा सोचकर उसने राजा से अभय की प्रार्थना करके
बोला ॥९१॥
इसके अनन्तर शकटाल ने हर्षपूर्वक मुझे योगनन्द के पास पहुँचाया और मैंने उन्मत्त
राजपुत्र को देखा ॥९२॥
उसे देखकर मैंने राजा से कहा—'इसने मित्रद्रोह किया है' और गन्धवती की कृपा से
उस को रात का सारा वृत्तान्त कह दिया ॥९३॥
मेरे वृत्तान्त कहने पर राजपुत्र शाप से मुक्त होकर मेरी स्तुति करने लगा और राजा ने
पूछा कि तुमने इस वृत्तान्त को कैसे जान लिया ? ॥९४-९५॥
तब मैंने कहा—'राजन् ! बुद्धिमान् की बुद्धि अथवा या अनुमान से तथा प्रतिभा से
सब कुछ जान लेती है। जैसे मैंने रात्री की कमर में सिंह का ज्ञान किया था। यह सुनकर राजा
पश्चात्ताप करने लगा ॥९६-९७॥
तदनन्तर राजा के द्वारा दिये गये सम्मान दान आदि की उपेक्षा करके विरक्तता को
बहुत बड़ा लाभ समझकर मैं अपने घर चला गया। कारण यह कि चरित्र की पवित्रता ही
विद्वानों का धन है ॥९८॥
प्राप्तस्यैव च तत्रस्थो जनोऽरोदीत्पुरो मम।
अभ्येत्य मां समुद्भ्रान्तमुपवर्षोऽब्रवीत्ततः ॥९९॥
राजा हत निशम्य त्वामुपकोशाग्निसाम्बुषु।
अकरोदथ मातुस्ते शुचा हृदयमस्फुटत् ॥१ ०॥
तच्छ्रुत्वाभिनवोद्भूतशोकवेगविव्हलः ।
सद्योऽहमपतं भूमौ वातरुग्ण इव द्रुमः ॥१०१॥
क्षणाच्च गतवानस्मि प्रलापार्ता रसज्ञताम्।
प्रियबन्धुविनाशोत्थः शोकाग्निः कं न तापयेत् ॥१०२॥
जातःसारं जगत्त्यस्मिन्का नित्या ह्यनित्यता।
तदेतामैश्वरीं मायां किं जानन्नपि मुह्यसि ॥१०३॥
इत्याविभिस्पागत्य वर्षेण वचनैरहम्।
बोधितोऽथ यथातत्त्वं कथम्चिद्धृतिमप्तवान् ॥१०४॥
ततो विरक्तहृदयस्त्यक्त्वा सर्व निबन्धनम्।
प्रस्थमैकसहायोऽहं तपोवनमक्षियिम् ॥१ ५॥
दिवसष्वप गच्छत्सु तत्तपोवनमकतः।
अयोध्यात उपागच्छद् विप्र एको मयि स्थितः ॥१ ६॥
स मया योगनन्दस्य राज्यवार्तामपृच्छ्यत।
प्रत्यभिज्ञाय मां सोऽथ सशोकमिदमब्रवीत् ॥१ ७॥
शृणु नन्दस्य यद्वृत्तं तत्सकाक्षाद् गते त्वयि।
[L20: लब्धावकाशस्तत्राभूच्छकटालश्चिरेण सः ॥१०८॥
स चिन्तयन्बधोपायं योगनन्दस्य युक्तितः।
क्षितिं खनन्तमद्राक्षीच्चाणक्याख्यं द्विजं पथि ॥१ ९॥
किं भुवः खनसीत्युक्ते तेन विप्रोऽथ सोऽब्रवीत्।
दर्भमुन्मूलयाम्यत्र पाने येतेन मे क्षतः ॥११ ०॥
तच्छ्रुत्वा सहसा मन्त्री कोपनं क्रूरनिश्चयम्।
तं विप्रं योगनन्दस्य बधोपायममन्यत ॥१११॥
नाम पृष्ट्वाऽब्रवीच्च व हे ब्रह्मन् दापयामि ते।
अह त्रयोदशीनाद्य गृहे नन्दस्य भूपतेः ॥११२॥
दक्षिणातः सुवर्णस्य लक्षं तव भविष्यति।
भोक्ष्यस धुरि चास्येपामर्हि तावद् गृहं मम ॥११३॥