सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

५४८ कथासरित्सागर

५४८ कथासरित्सागर
सच्छङ्खा साप्यवादीत् कुतोऽन्यत् पङ्कजं मम।
एतत्कपालस्फोटस्य विद्यतेऽस्मत्प्रभो सरः॥२४३॥
यत्रेतादृशानि जायन्ते हेमाम्बुजानि समन्ततः।
तस्मात्तदेकं मद्भर्त्रे प्रीत्या पश्च स दत्तवान्॥२४४॥
एव तयोक्ते सोऽवादीत्तर्हि तन्मां सरोवरम्।
नय यावत्स्वयं तस्मान्दादास्ये कनकम्बुजम्॥२४५॥
न शक्यमेतद्रक्षोभिर्भीषणैस्तद्धि रक्ष्यते।
एवं निषिद्धोऽपि तया निर्बन्धं न स तं जहौ॥२४६॥
ततः कथमपिच्छीतश्च तया गत्वा ददर्श तम्।
दूरात् सरोवरं दिव्यं शृङ्गाग्रिकटकाश्रितम्॥२४७॥
छन्नं निरन्तरोद्दण्डदीप्तहेमसरोरुहैः।
सततोन्मुखतापीतसर्वन्ताकर्प्रभैरिव ॥२४८॥
गत्वैव तत्र यावन्न पद्मान्यवचिनोति सः।
तावद्रक्षिणो घोरा रुधुस्तं निशाचराः॥२४९॥
सशस्त्रः सोऽवधीत्पञ्च मानान् याम ये पलाय्य च।
गत्वा कपालस्फोटाय स्वामिने तन्न्यवेदयन्॥२५०॥
स तच्छ्रुत्वैव कुपितस्तत्र रक्षःपतिः स्वयम्।
आजगामाथोवदत्त तमपश्यत्लुच्छिताम्बुजम्॥२५१॥
कथं भ्राता ममाधोकदत् सोऽयमिहागतः।
इति प्रत्यभ्यजानाच्च तत्क्षणं स सविस्मयः॥२५२॥
ततः शस्त्रं समुत्सृज्य हर्षबाष्पाप्लुतेक्षणः।
धावित्वा पादयोः सद्यः पतित्वा च जगाद तम्॥२५३॥
अहम् विजयदत्ताख्यः सोदर्यः स तवानुजः।
जातो द्विजवरस्योभौ गोविन्दस्वामिनः सुतौ॥२५४॥
इयच्चिरं च जातोऽहं दैवादीदृङ्निशाचरः।
चिताकपालदस्र्मात् कपालस्फोटनामकः॥२५५॥
त्वद्दर्शनादिदानीं न ब्राह्मण्यं संस्मृतं मया।
गतं च राक्षस्यं मे माहात्म्याद्विजपुत्रनम्॥२५६॥

यह सुनकर बहू कहने लगी कि 'मेरे पास दूसरा स्वर्ण-कमल कहाँ है। यह हमारे राजा
कपालस्फोट का सरोवर वीज रहा है, उसमें इस प्रकार के स्वर्ण-कमल होते हैं। उन्हीं में से एक
कमल राजा ने मेरे पति को प्रेम से दिया था॥२४३-२४४॥
सास के ऐसा कहने पर अशोकदत्त ने कहा—'तब तुम मुझे उस सरोवर पर ले चलो।
मैं स्वयं स्वर्णकमल ले लूँगा'॥२४५॥
उसकी सास ने उससे कहा—'यह सम्भव नहीं है। बड़े-बड़े भीषण राक्षस उस सरोवर
की रक्षा करते हैं।' इस प्रकार सास द्वारा निषेध करने पर भी उसने अपना हठ नहीं छोड़ा॥२४६॥
तब किसी प्रकार उस सास द्वारा वहाँ न जाय जान पर उसने दिव्य स्वर्ण-कमलों से
युक्त और हिमालय की ऊँची चोटी पर स्थित उस सरोवर को देखा॥२४७॥
वह सरोवर, सूर्य की किरणों का निरन्तर पान करने के कारण सूर्य की प्रभा के समान
चमकते हुए ऊँचे-ऊँचे एवं विकसित स्वर्ण-कमलों से ढका हुआ था॥२४८॥
वहाँ जाकर जब वह कमलों को चुनने लगा तब भयानक रक्षक राक्षसों ने उसे
रोका॥२४९॥
तब अशोकदत्त ने भी शस्त्र निकालकर उन्हें मारना प्रारम्भ किया। फलतः कुछ राक्षस
भय से भागकर अपने स्वामी कपालस्फोट के पास पहुँचे और उन्होंने उससे निवेदन किया॥२५०॥
यह सुनकर क्रोध से भरे हुए राक्षसराज ने स्वयं आकर टूटे हुए स्वर्ण-कमलों के साथ
अशोकदत्त को देखा॥२५१॥
उसने आश्चर्य के साथ अपने भाई को पहचानकर सोचा कि 'यह मेरा भाई अशोक-
दत्त यहाँ कैसे आ गया'॥२५२॥
तब हर्ष के आँसुओं से भरी हुई आँखोंवाला वह राक्षसराज शस्त्र को फेंककर दौड़कर
उसके पैरों पर पड़कर कहने लगा— मैं विजयदत्त नाम का तुम्हारा छोटा सहोदर भाई हूँ। हम
दोनों ब्राह्मणश्रेष्ठ गोविन्दस्वामी के पुत्र हैं। दैववश मैं इतने दिनों तक राक्षस बन गया था।
चिता में पड़े हुए कपाल (सिर) को फोड़ने के कारण मेरा नाम कपालस्फोट पड़
गया। इस समय तुम्हारे दर्शन से मुझे ब्राह्मणत्व का स्मरण हो आया और अज्ञान से बुद्धि को
ढक देनेवाला मेरा राक्षसपन अब मुझसे निकल गया॥२५३-२५६॥