कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
४६ कथासरित्सागर
४६ कथासरित्सागर
तेन तच्च परिक्षातुं तत्रैवानायितो वणिक् ।
मदस्त किञ्चिदप्यस्या देयं नास्तीत्यभाषत ॥७३॥
उपकोशा ततोऽवादीत्सन्ति मे देव ! साक्षिणः ।
मञ्जूषायां गताः क्षिप्त्वा भर्त्ता मे गृहदेवताः ॥७४॥
स्ववाचा पुरतस्तासामनेनाङ्गीकृतं धनम् ।
तामानाय्यह मञ्जूषां पृच्छ्यन्तां देवतास्त्वया ॥७५॥
तच्छ्रुत्वा विस्मयाद्राजा तदानयनमादिशत् ।
ततः क्षणरसा मञ्जूषा प्रापिता बहुभिर्जनैः ॥७६॥
अत्रोपकोशा वक्ति स्म सत्यं वदत देवताः !
यद्युक्तं वणिजानेन ततो यात निजं गृहम् ॥७७॥
नो चेद्दहाम्यहं युष्मान्सदस्युद्घाटयामि वा ।
तच्छ्रुत्वा भीतभीतास्ते मञ्जूषास्था बभाषिरे ॥७८॥
सत्यं समक्ष मस्माकमनेनाङ्गीकृतं धनम् ।
ततो निरुत्तरः सर्वं वणिक्तत्प्रत्यपद्यत ॥७९॥
उपकोशामथाम्प्रच्छ्य राजा त्वतिकुतूहलात् ।
सदस्युद्घाटिता साभून्मञ्जूषा स्फोटितार्गला ॥८०॥
निष्कृष्टास्तत्प्रवि पुरुषास्तमःपिण्डा इव त्रयः ।
दृष्ट्वाञ्च प्रत्यभिज्ञाता मन्त्रिभिर्भ्रमुता तथा ॥८१॥
प्रहसत्स्वथ सर्वेषु किमेतदिति कौतुकात् ।
राज्ञा पृष्टा सती सर्वमुपकोशा शशंस तत् ॥८२॥
अचिन्त्यं धीसगुप्तानां चरितं कुलयोषिताम् ।
इति चाभिननन्दुस्तामुपकोशां सभासदः ॥८३॥
सवस्त्रं हृतसर्वस्वा परदारपिणोऽर्मिलाः ।
राज्ञा निर्वासिता बणादणील यस्य भूशय ॥८४॥
भगिनी मे त्वमित्युक्त्वा दत्वा प्रीत्या धनं बहु ।
उपकोशाऽपि भूपेन प्रेषिता गृहमगमत् ॥८५॥
वर्षोपवर्षौ तद्बुद्ध्वा साध्वीं तामभ्यनन्दताम् ।
सशब्दं विस्मयस्मेरं पुरं तत्राभवज्जनः ॥८६॥
अत्रान्तरे तुगायान्ते गत्वा तीव्रतरं तपः ।
आराधितो मया दत्तो वरदः पार्वतीपतिः ॥८७॥
राजा ने इस बात को जानने के लिए, बनिये को वहीं बुलवाया तो बनिये ने राजा से
कहा—'महाराज ! मेरे पास इसका कुछ भी नहीं है' ॥७३॥
तब उपकोशा ने कहा—'महाराज ! इसके साक्षी मेरे गृह के देवता हैं, जिन्हें मेरे पति
सन्दूक में बन्द कर गये हैं ॥७४॥
इस बनिये ने उन देवताओं के आगे अपने मुंह से धन स्वीकार किया है। आप उस सन्दूक
को मंगाकर उन देवताओं से पूछिए' ॥७५॥
ऐसा सुनकर राजा को आश्चर्य हुआ और उसने सन्दूक लाने की आज्ञा दी और कुछ
ही समय में बहुत व्यक्ति मिलकर उस सन्दूक को राजा के सामने ले आये ॥७६॥
सन्दूक आ जाने पर उपकोशा ने कहा—हे देवताओ ! सच बोलो। जो इस बनिये ने
कहा है—बताओ और फिर घर को जाओ ॥७७॥
'यदि तुम न बोलोगे तो तुम्हें सन्दूक के साथ ही जला दूँगी या राजसभा में सन्दूक खोल-
कर तुम्हारा प्रदर्शन करूंगी। यह सुनकर सन्दूक के अन्दर से वे लोग भयभीत होकर
बोले ॥७८॥
'सच है, इसने हम लोगों के सामने धन स्वीकार किया है। तब बनिये ने निरुत्तर होकर
उसका धन स्वीकार किया ॥७९॥
इसके अनन्तर अत्यन्त कुतूहलवश राजा के साग्रह प्रार्थना करने पर उपकोशा ने अर्गला
तोड़कर उस सभा में सन्दूक खोल दिया ॥८०॥
सन्दूक खोलने पर अन्धकार के पिण्ड के समान वे तीनों पुरुष उसमें से निकले तो बड़ी
कठिनता के साथ उन्हें राजा और मन्त्रियों ने पहचाना ॥८१॥
उन्हें देख सभी सभासदों के हँसने पर राजा ने आश्चर्य के साथ उपकोशा से पूछा कि 'यह
क्या है ? तब उपकोशा ने सारा वृत्तान्त सभा में सुना दिया ॥८२॥
'चरित्र की रक्षा करनेवाली कुलीन स्त्रियों के चरित्र अचिन्तनीय होते हैं। इस प्रकार
सभी सभासद, उपकोशा के चरित्र की प्रशंसा करने लगे ॥८३॥
राजा ने समस्त वृत्तान्त सुनकर परदाराभिलाषी उन तीनों की सम्पत्ति का
हरण करके उन्हें देश से निकाल दिया। सच है दुश्चरित्र किसके लिए कल्याणकारक
होता है ॥८४॥
'तू मेरी बहिन है—ऐसा कहकर तथा प्रसन्नता के साथ बहुत-सा धन देकर राजा ने
उपकोशा को वापस भेज दिया। वह अपने घर आ गई ॥८५॥
वर्ष और उपवर्ष भी इस समाचार को जानकर उस पतिव्रता स्त्री का अभिनन्दन करने लगे
और सभी नगर-निवासी इस समाचार से आश्चर्यचकित हो मुस्कराने लगे ॥८६॥
इसी बीच मैंने हिमालय में कठोर तपस्या करके वरदानी महादेव की आराधना
की ॥८७॥