कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
षष्ठ लम्बक ७९१
षष्ठ लम्बक ७९१
परस्पर दर्शन के अनन्तर वे दोनों बालक होने पर भी स्थिर न रह सके। यद्यपि वे दोनों
अलग-अलग थे किन्तु दृष्टिपाश से बँधे हुए, अतएव एक थे ॥१ ३॥
यह देखकर वत्सराज ने उन दोनों के सम्बन्ध को देवताओं द्वारा निश्चित किया हुआ
समझकर विवाह करने की इच्छा की ॥१ ४॥
कलिङ्गसेना यह जानकर प्रसन्न हुई और नरवाहनदत्त को जामाता के प्रेम से देखने
लगी ॥१ ५॥
तब वत्सराज ने मन्त्रियों से सम्मति करके अपने पुत्र के लिए अपने ही राजभवन के
समान भवन का निर्माण कराया ॥१ ६॥
नरवाहनदत्त का यौवराज्याभिषेक
समयज्ञ राजा ने सब सामान एकत्र करके प्रशंसनीय गुणोंवाले कुमार नरवाहनदत्त का
यौवराज्य (युवराज) पद पर अभिषेक कर दिया ॥१ ७॥
अभिषेक के समय उस युवराज के शिर पर पहले माता-पिता के आनन्दाश्रु गिरे
तदनन्तर वेद-मन्त्रों से पवित्र तीर्थों का जल गिरा ॥१ ८॥
अभिषेक के जल से उसके मुख-कमल के घुल जाने पर, दिशाओं के मुंह भी घुल गये यह
आश्चर्य है ! ॥१ ९॥
माताओं द्वारा उसके गले में मङ्गल-मालाएँ पहनाने पर, आकाश ने भी उसी क्षण दिव्य
पुष्पों और मालाओं की वर्षा की ॥११ ॥
हर्ष से बजनेवाले देवताओं के वाद्यों की स्पर्धा में मानों आनन्द-वाद्यों के शब्द आकाश
में गूँजने लगे ॥१११॥
अभिषेक किए हुए उस युवराज को किसने प्रणाम नहीं किया ? केवल अपने प्रभाव
के अतिरिक्त इसी कारण वह ऊँचा उठा ॥११२॥
तब वत्सराज उदयन ने युवराज के बालमित्र अपने मन्त्रियों के पुत्रों को बुलाकर उन्हें
युवराज के मन्त्रियों का पद दे दिया ॥११३॥
यौगन्धरायण के पुत्र मरुभूति को मुख्य मंत्री रुमण्वान् के पुत्र हरिशिख को प्रधान सेनापति
वसन्तक के पुत्र तपन्तक को विनोद-मन्त्री और इत्यक के पुत्र गोमुख को प्रधान द्वारपाल बना
दिया ॥११४ ११५॥
वीर-पिङ्गलिका के पुत्र तथा पुरोहित के भतीजे वैश्वानर तथा शान्तिसोम को युवराज
पुरोहित नियुक्त किया ॥११६॥
इत्याज्ञाप्तेषु पुत्रस्य साचिव्ये तेषु भूभृता।
गगनादुदभूद् वाणी पुष्पवृष्टिपुरःसरा ॥११७॥
सर्वार्थसाधका एते भविष्यन्त्यस्य मन्त्रिणः।
शरीरावयवनिर्भिन्नोऽस्य गोमुखस्तु भविष्यति ॥११८॥
इत्युक्तो दिव्यया वाचा हृष्टो वत्सेश्वरश्च सः।
सर्वान्सम्मानयामास वस्त्रैराभरणैश्च तान् ॥११९॥
अनुजीविषु यत्किञ्चन वसु वर्षति राजनि।
दरिद्रशब्दस्यैकस्य नासीत्तत्रार्थसङ्गतिः ॥१२०॥
पवनोल्लासिताक्षिप्तपताकापटपङ्क्तिभिः ।
आहूतेरिव सापूरि नर्तकीचारणैः पुरी ॥१२१॥
आगाद् वैद्याधरी साक्षाल्लक्ष्मीस्तस्यैव भाविनी।
कलिङ्गसेना जामातुरुत्सवेऽत्र भविष्यति ॥१२२॥
ततो वासवदत्ता च सा च पद्मावती तथा।
हर्षेण ननृतुस्तिस्रो मिलिता इव शक्तयः ॥१२३॥
मारुतान्दोलितलताः प्रनृत्यन्निव सर्वतः।
उद्यानतरवोऽप्यत्र चेतनेषु कथैव का ॥१२४॥
ततः कृताभिषेकः सन्नारुह्य जयकुञ्जरम्।
नरवाहनदत्तः स युवराजो विनिर्ययौ ॥१२५॥
अवाकीर्यत धोत्क्षिप्तैर्नेत्रैर्ह्रसितारुणैः।
पौरस्त्रीभिः स नीलाम्बुजाजपद्माब्जसिप्रमैः ॥१२६॥
दृष्ट्वा च तत्पुरीपूज्यदेवता बन्दिमागधैः।
स्तूयमानः ससचिवः स विवेश स्वमन्दिरम् ॥१२७॥
तत्र दिव्यानि भोग्यानि तथा पानान्युपाहरत्।
कलिङ्गसेना तस्यादौ स्वविभूत्यधिकानि सा ॥१२८॥
ददौ तस्मै सुवस्त्राणि दिव्यान्याभरणानि च।
समन्त्रिसचिभृत्याय जामातृस्नेहकातरा ॥१२९॥
एवं महोत्सवेनासावमृतास्वादसुन्दरः।
एषां वत्सेश्वरादीनां सर्वेषां वासरो ययौ ॥१३०॥
ततो निशायां प्राप्तायां सुतोद्वाहविधायिनी।
कलिङ्गसेना सम्मन्त्र्य तां सा सोमप्रभां सखीम् ॥१३१॥