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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

प्रथम लम्बक २७

प्रथम लम्बक २७
वहाँ पर (राजगृह में) विद्योपार्जन करके वे तीनों अनाथ और दुःखी बालक स्वामी
कार्तिक के दर्शन करने के लिए वहाँ से दक्षिण-देश को गये॥८॥
वे दक्षिण-देश में समुद्र-तट पर स्थित विन्जिनी नामक नगरी में पहुँचे और वहाँ मोजिक
नामक ब्राह्मण के घर में निवास करने लगे ॥९॥
उस मोजिक ब्राह्मण के तीन कन्याओं के अतिरिक्त और कोई सन्तान न थी। अतः वह
अपनी तीनों कन्याओं को तीनों ब्राह्मणों को दान कर और साथ ही अपना धन भी उन्हें देकर गंगाद्वार
(हरद्वार) की ओर चला गया ॥१० ॥
कुछ काल के अनन्तर श्वशुर-गृह में रहते हुए उन तीनों ब्राह्मणों को वर्षाभाव के कारण
होनेवाले भीषण अकाल का अनुभव करना पड़ा ॥११॥
अकाल की भीषणता से व्याकुल होकर वे तीनों ब्राह्मण अपनी पतिव्रता पत्नियों को
छोड़कर भाग गये। क्रूर व्यक्तियों के हृदयों में बन्धुत्व की भावना स्पर्श भी नहीं करती ॥१२॥
उन तीनों में बिचली बहुत गर्भवती थी। अतः वे तीनों इस विपत्ति में अपने पिता के
मित्र यज्ञदत्त के घर में शरण लेने चली गईं और वहाँ जाकर अपने अपने पतियों का ध्यान करती
हुई कठिनाई से जीवन व्यतीत करने लगीं। कुलीन स्त्रियां विपत्ति में भी अपने सती-चरित्र का
परित्याग नहीं करतीं ॥१३-१४॥
उस बिचली बहन ने समयानुसार पुत्र उत्पन्न किया और तीनों बहनें उस शिशु के प्रति
एक दूसरी से अधिक स्नेह करने लगीं ॥१५॥
किसी समय आकाश में भ्रमण करते हुए शिवजी की गोद में बैठी हुई स्कन्दमाता (पार्वती)
उस बालक को देखकर दयापूर्वक कहने लगीं ॥१६॥
'देव देखिए ! इस बालक पर ये तीनों स्त्रियाँ समान रूप से स्नेह करती हैं और यह आशा
करती हैं कि यह बड़ा होने पर हमलोगों का पालन-पोषण करेगा ॥१७॥
इसलिए भगवन् ! आप ऐसी कृपा करें कि यह बालक इन तीनों का जीवन-निर्वाह कर
सके। पार्वती के इतना कहने पर करुणाली शिवजी ने कहा ॥१८॥
'मैं तो इसे पहले ही अनुगृहीत कर चुका हूँ क्योंकि इसने पूर्वजन्म में पत्नी के साथ मेरी
आराधना की थी। उसी का फल भोगने के लिए इसे संसार में यह जन्म दिया गया है ॥१९॥
पाटली नाम की इसकी पत्नी राजा महेन्द्रवर्मा की पुत्री के रूप में उत्पन्न हुई है। वही
इसकी पत्नी बनेगी' ॥२० ॥
पार्वती से ऐसा कहकर शिवजी ने उन तीनों पतिव्रताओं से स्वप्न में कहा कि 'यह
तुम्हारा शिशु नाम से भी पुत्रक ही रहेगा पुत्रक नाम से प्रसिद्ध होगा। यह जब सोकर उठेगा
तब प्रतिदिन इसके सिरहाने में एक लाख स्वर्ण-मुद्रा मिला करेगी और आगे चलकर यह राजा
होगा' ॥२१-२२॥