सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

पंचम लम्बक ५११

पंचम लम्बक ५११
इस समय आपने स्वयं कह दिया तो ऋतु की लता जैसे वृक्ष का समागम करती है, उसी
प्रकार इन दोनों का भी समागम हो जाय ॥१६९॥
पत्नी द्वारा इस प्रकार कहे गये प्रसन्न राजा ने विवाहोत्सव का आयोजन करके वह कन्या
अशोकदत्त को दे दी ॥१७०॥
उन दोनों राजेन्द्र की कन्या और विप्रेन्द्र के पुत्र का समागम परस्पर शोभा बढ़ाने के
लिए लक्ष्मी और विजय के संगम के समान हुआ ॥१७१॥
एक बार रानी ने राजा से उस दिव्य मणि के पायजेब के सम्बन्ध में कहा— 'आर्यपुत्र
यह अकेला पायजेब अच्छा नहीं लगता इसलिए इसी के समान दूसरा भी बनवाओ' ॥१७२-१७३॥
यह सुनकर राजा ने सोनार, जड़िये आदि को आज्ञा दी कि 'इसी के समान दूसरी पायजेब
बनाओ ॥१७४॥
वे उसे भली भाँति जाँचकर बोले—'महाराज इस प्रकार का दूसरा पायजेब नहीं
बनाया जा सकता। यह तो देवताओं की कारीगरी है मनुष्यों की नहीं ॥१७५॥
इसमें के बहुत-से रत्न तो भूतल में मिलते ही नहीं इसलिए जहाँ से यह एक मिला है
वहीं इसका जोड़ा भी ढूँढ़ो' ॥१७६॥
यह सुनकर राजा और रानी के निराश और खिन्न हो जाने पर वहाँ बैठा हुआ अशोकदत्त
बोला—'मैं तुम्हारे पायजेब का जोड़ा लाता हूँ' ॥१७७॥
उसकी इस प्रकार की प्रतिज्ञा को राजा ने केवल साहस समझा। अतः स्नेह से बार-बार
मना करने पर भी अशोकदत्त अपने निश्चय से विचलित न हुआ और उस पायजेब को लेकर
फिर श्मशान में गया ॥१७८-१७९॥
कृष्णपक्ष की चतुर्दशी की रात में जहाँ उसने वह आभूषण पाया था वहीं पहुँचा।
वहाँ जाकर धधकती हुई चिता के धुएँ से मलिन (काले) पाश में लपेटे हुए मनुष्यों के शवों को
अपने कन्धों में लटकाये हुए, वृक्षों के समान दीर्घकाय राक्षसों से संकीर्ण उस श्मशान में उसने
पहले देखी हुई उस स्त्री को देखा। उसका पायजेब लेने के लिए उसने नर मांस बेचने का उपाय
सोचा ॥१८०-१८२॥
उसने एक वृक्ष में बँधी हुई मनुष्य की लाश को चीरकर और कन्धे पर लादकर घूमना
आरम्भ दिया और चिल्लाने लगा कि 'मैं मानव-मांस बेच रहा हूँ जिसे लेना हो ले' ॥१८३॥

महासत्त्व ! गृहीत्वैतद्देहि तावन्मया सह ।
इति क्षणाच्च जगदे स दूरादेकया स्त्रिया ॥१८४॥
तच्छ्रुत्वा स तथैवैतामुपेत्यानुसरन् स्त्रियम् ।
आरात्तस्तल दिव्यरूपां वापिसमैक्षत ॥१८५॥
स्त्रीभिर्वृतामासनस्थां रत्नाभरणभासुराम् ।
असम्भाव्यम्पित स्म मरावम्भोजिनीमिव ॥१८६॥
स्त्रिया तयोपनीतश्च तामुपैत्य सभा स्थिताम् ।
नृमांसमस्मि विक्रीण गृह्यतामित्युवाच च ॥१८७॥
भो महासत्त्व ! मूल्येन केनैतद्दीयते त्वया ।
इति सापि तदाह स्म दिव्यरूपा विलासिनी ॥१८८॥
तत स वीरो हस्तस्थ तमेव मणिनूपुरम् ।
सन्धर्त्य मन्व्यपृच्छत्स्वन्नतकायो जगाद ताम् ॥१८९॥
यो वदास्यस्य सदृश द्वितीय नूपुरस्य मे ।
मांस तस्य ददाम्येतन्नस्यसो यदि गृह्यताम् ॥१९०॥
तच्छ्रुत्वा साप्यवादीत्तमस्त्यन्यो नूपुरो मम ।
असौ मदीय एवैको नूपुरो हि हृतस्त्वया ॥१९१॥
सर्वाहं या त्वया दृष्टा शूलविद्धस्य पार्श्वतः ।
वृत्तान्त्यस्या भवता परिज्ञातास्मि नाधुना ॥१९२॥
तर्हि मांसेम यदहं वच्मि ते तत्करोषि चेत् ।
एतद्द्वितीयं दास्याम्यस्य तुभ्यं स्वनूपुरम् ॥१९३॥
इत्युक्त स तदा वीर प्रतिपद्य तदब्रवीत् ।
यत्त्वं वदसि तत्सर्वं करोम्येव क्षणादिति ॥१९४॥
अशोकदत्तविद्युत्प्रभयोः परिचयकथा
ततस्तस्मै जगादबभामूमात्सा भमीप्सितम् ।
अस्ति भद्र ! त्रिषष्टारय हिमवच्छिखरे पुरम् ॥१९५॥
तत्रासील्लम्बजिह्वास्य प्रवीरो राक्षसाधिपः ।
तस्य विद्युन्निभा नाम भार्याहं कामरूपिणी ॥१९६॥
स चकस्यां सुतायां मे जातार्या ददत पति ।
प्रभो कपालस्फोटस्य पुरतो निहतो रण ॥१९७॥