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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

पंचम लम्बक ४१६

पंचम लम्बक ४१६
'सुनो मैं इस प्रसंग में तुम्हें शिव और माधव दो धूर्तों की कथा सुनाती हूँ। ऐसा
कहकर उसने यह कथा सुनानी प्रारम्भ की ॥८१॥
शिव और माधव नामक धूर्तों की कथा
सब नगरों में श्रेष्ठ रत्नपुर नाम का यथार्थ नामवाला एक नगर है। उसमें शिव
और माधव नाम के दो धूर्त रहते थे ॥८२॥
उन्होंने अनेक ठगों का एक दल बनाकर अपनी ठगी के हथकंडों से नगर के सभी धनी
व्यक्तियों को ठग लिया था ॥८३॥
एक बार उन दोनों ने आपस में यह विचार किया कि 'हमलोगों द्वारा यह सारा नगर
ठग लिया गया है। अब इसे छोड़ कर चलें और उज्जैन में डेरा डालें। सुनते हैं कि वहाँ के
राजा का पुरोहित बहुत बड़ा धनी है। उसका नाम शंकरस्वामी है। उससे धन लेकर मालवा
देश की रमणियों के विलास का आनन्द लेंगे। वह आधी दक्षिणा का हिस्सेदार अर्थात् आधी
फूस पर काम करनेवाला बढ़ी हुई भौंहोंवाला है। उसके पास सात घड़े स्वर्ण का खजाना है।
किन्तु वह स्वयं बड़ा ही कृपण या अर्थपिशाच है—ऐसा ब्राह्मण लोग कहा करते हैं।
उस ब्राह्मण की एक रूपलावण्या कन्या भी है। इसी प्रसंग में हमलोग उसे भी अवश्य प्राप्त
कर सकेंगे' ॥८४-८८॥
ऐसा सोचकर और उसे ठगने की योजना बनाकर शिव और माधव दोनों धूर्त उस
रत्नपुर नगर से उज्जैन को चले ॥८९॥
धीरे-धीरे उज्जैन पहुँचकर माधव तो नगर के बाहर किसी ग्राम में अपने को राजकुमार
घोषित कर अपने साथियों के साथ ठहर गया ॥९० ॥
और अत्यन्त मायावी शिव भली-भाँति ब्रह्मचारी का वेष बनाकर उस उज्जयिनी
नगरी में जा पहुँचा ॥ ९१॥
वह वहाँ जाकर क्षिप्रा नदी के तट के समीप किसी मठ में ठहर गया और अपने आसपास
पूर्ण आडम्बर के लिए मिट्टी कुश भिक्षापात्र मृगचर्म आदि रख लिये ॥९२॥