कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
उससे पहले की बृहत्कथा में विवाहों की कहानियों का ऐसा ही विस्तार था।
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कहा जा सकता। किन्तु अनुमान के आधार पर वसुदेव के पहले विवाह के ढंग पर ही जितनी और
कथाएं मिल सकीं या गढ़ी जा सकीं उन्हें जोड़-बटोरकर धर्मदास ने परिशिष्ट-रूप में एक नए
ग्रंथ का ठाट खड़ा किया। इससे यह अनुमान करना उचित नहीं कि मूल वसुदेव हिण्डी में या
उससे पहले की बृहत्कथा में विवाहों की कहानियों का ऐसा ही विस्तार था।
धर्मदासगणि की वसुदेव हिण्डी को मध्यम खण्ड कहा जाता है। इसका कारण यह है
कि संघदास के ग्रन्थ का २९वां लम्भक जहां समाप्त होता था उससे आगे धर्मदास ने अपना कथा-
सूत्र नहीं चलाया बल्कि उसने पहली वसुदेव हिण्डी की १८वीं कथा पियंगुमंजरी लम्भक के
साथ अपने ७१ लम्भकों का सन्दर्भ जोड़ा है और इस तरह संघदास की वसुदेव हिण्डी के पेटे में
अपने ग्रन्थ को भरा है। इसी से इसे वसुदेव हिण्डी का मध्य भाग या मध्यम खण्ड कहते हैं। वस्तु
स्थिति यह है कि संघदासगणि का २९ लम्भकोंवाला ग्रन्थ अलग और अपने-आप में सम्पूर्ण था।
उसके बाद धर्मदासगणि ने अपना ग्रन्थ अलग बनाया और चतुराई से उसे अपने पूर्ववर्ती ग्रंथ
की एक खूंटी पर टाँग दिया।
संघदास की वसुदेव हिण्डी की रचना में इस समय छ प्रकरण पाए जाते हैं—(१)
कथोत्पत्ति (२) धम्मिल्ल हिण्डी (३) पीठिका (प्राकृत पेढिया) (४) मुख (५) प्रतिमुख
(६) शरीर। इसमें शरीर के अन्तर्गत २९ लम्भकों की कहानियां हैं जिनमें से अन्तिम इस समय
त्रुटित है और बीच के १९वें २० वें दो लम्भकों की कथाएं भी नहीं हैं। १८वें पियंगुमंजरी
लम्भक के बाद २१ वें केतुमती लम्भक की कथा शुरू होती है। यही १८ वें लम्भक की समाप्ति
पर धर्मदासगणि ने अपने मध्यम खण्ड का पेबन्द जोड़ा है।
यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि कथोत्पत्ति नामक पहले प्रकरण के बाद ५ पृष्ठों में
धम्मिल्ल हिण्डी नाम का एक महत्त्वपूर्ण प्रकरण उपलब्ध होता है। किन्तु स्पष्ट है कि वह अपने
किसी अज्ञात मूल स्थान से छटक कर यहाँ वसुदेव हिण्डी में कटफन्त रूप में ही रक्खा गया है।
इस धम्मिल्ल हिण्डी प्रकरण में धम्मिल्ल नामक किसी सार्थवाह पुत्र की कथा है जिसने देश-देशान्तरों
में जाकर ३२ विवाह किए। मूल ग्रन्थ में इसे धम्मिल्ल चरित कहा गया है और धम्मिल्ल शब्द की
व्युत्पत्ति बताते हुए लिखा है कि गर्भ के समय उसकी माता को धर्माचरण के विषय में दोहृद
उत्पन्न हुआ था। अतएव पुत्र का नाम धम्मिल्ल रक्खा गया। बृहत्कथा के दूसरे रूपान्तरों में जैसे
बृहत्कथामंजरी या कथासरित्सागर में धम्मिल्ल चरित की गन्ध भी नहीं है। धम्मिल्ल हिण्डी का
वातावरण सार्थवाहों के संसार से लिया गया है। इसे अपने-आप में एक स्वतंत्र रचना माना जा
सकता है जिसने मूल ठाट को कुंबी नरवाहनदत्त या वसुदेव हिण्डी की तरह ही कई विवाहों की
कहानियों पर आश्रित है। धम्मिल्ल शब्द का प्रयोग पहले-पहल गुप्तकालीन संस्कृत-नाट्य में पाया
जाता है। एक प्रकार के केशबन्ध को धम्मिल्ल केश कहते थे जिसमें बालों का एक जूड़ा बनाकर
सिर के अग्रभाग या मध्य भाग में बाँधा जाता था। इस शब्द की व्युत्पत्ति द्रभिल या डमिल से
संभाव्य है। हो सकता है कि दक्षिण भारत के किसी प्रसिद्ध सार्थवाह का नाम इसके मूल में रहा
हो और शिलप्प्याधिकार नामक तमिल-काव्य में व्यापार का जो वातावरण है उसकी पृष्ठभूमि में