वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
८० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
८० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
व्याख्या—मुण्डकोपनिषद् (३।१।१)-में तथा श्वेताश्वतरोपनिषद्
(४।६)-में कहा है—
'द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति॥'
'एक साथ रहते हुए परस्पर सख्यभाव रखनेवाले दो पक्षी (जीवात्मा
और परमात्मा) एक ही शरीररूप वृक्षका आश्रय लेकर रहते हैं। उन दोनोंमेंसे
एक (जीवात्मा) तो उस वृक्षके कर्मफलस्वरूप सुख-दुःखोंका स्वाद ले-
लेकर (आसक्तिपूर्वक) उपभोग करता है, किंतु दूसरा (परमात्मा) न खाता हुआ
केवल देखता रहता है।' इस वर्णनमें जीवात्माको कर्मफलका भोक्ता तथा
परमात्माको केवल साक्षीरूपसे स्थित रहनेवाला बताया गया है। इससे दोनोंका
भेद स्पष्ट है। अतः इस प्रकरणमें द्युलोक, पृथिवी आदि समस्त जड-
चेतनात्मक जगत्का आधार परब्रह्म परमेश्वर ही सिद्ध होता है, जीवात्मा नहीं।
सम्बन्ध—पूर्व प्रकरणमें यह बात कही गयी कि जिसे द्युलोक और पृथिवी
आदिका आधार बताया गया है, उसीको 'आत्मा' कहा गया है; अतः वह परब्रह्म
परमात्मा ही है; जीवात्मा नहीं। इसपर यह जिज्ञासा होती है कि छान्दोग्योपनिषद्के
सातवें अध्यायमें नारदजीके द्वारा आत्माका स्वरूप पूछे जानेपर सनत्कुमारजीने
क्रमशः नाम, वाणी, मन, संकल्प, चित्त, ध्यान, विज्ञान, बल, अन्न, जल, तेज,
आकाश, स्मरण और आशाको उत्तरोत्तर बड़ा बताया है, फिर अन्तमें प्राणको इन
सबकी अपेक्षा बड़ा बताकर उसीकी उपासना करनेके लिये कहा है। उसे सुनकर
नारदजीने फिर कोई प्रश्न नहीं किया है। इस वर्णनके अनुसार यदि इस प्रकरणमें
सबसे बड़ा प्राण है और उसीको 'भूमा' एवं 'आत्मा' भी कहते हैं, तब तो
पूर्व प्रकरणमें भी सबका आधार प्राणशब्दवाच्य जीवात्माको ही मानना चाहिये;
इसका समाधान करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ किया जाता है—
भूमा सम्प्रसादादध्युपदेशात् ॥ १।३।८॥
भूमा = (उक्त प्रकरणमें कहा हुआ) 'भूमा' (सबसे बड़ा) ब्रह्म ही है;
सूत्र ८ ] अध्याय १ ८१
सम्प्रसादात्=क्योंकि उसे प्राणशब्दवाच्य जीवात्मासे भी; अधि=ऊपर
(बड़ा); उपदेशात्=बताया गया है।
व्याख्या—उक्त प्रकरणमें नाम आदिके क्रमसे एककी अपेक्षा दूसरेको
बड़ा बताते हुए पंद्रहवें खण्डमें प्राणको सबसे बड़ा बताकर कहा है—'यथा
वा अरा नाभौ समर्पिता एवमस्मिन् प्राणे सर्वँ समर्पितम्। प्राणः प्राणेन
याति प्राणः प्राणं ददाति प्राणाय ददाति। प्राणो ह पिता प्राणो माता प्राणो
भ्राता प्राणः स्वसा प्राण आचार्यः प्राणो ब्राह्मणः ॥' (छा० उ० ७।१५।१)
अर्थात् 'जैसे अरे रथचक्रकी नाभिके आश्रित रहते हैं, उसी प्रकार समस्त
जगत् प्राणके आश्रित है, प्राण ही प्राणके द्वारा गमन करता है, प्राण ही प्राण
देता है, प्राणके लिये देता है, प्राण पिता है, प्राण माता है, प्राण भ्राता है, प्राण
बहिन है, प्राण आचार्य है और प्राण ही ब्राह्मण है।' इससे यह मालूम होता है
कि यहाँ प्राणके नामसे जीवात्माका वर्णन है; क्योंकि सूत्रकारने यहाँ उस
प्राणका ही दूसरा नाम 'सम्प्रसाद' रखा है और सम्प्रसाद नाम जीवात्माका है,
यह बात इसी उपनिषद् (छा० उ० ८।३।४)-में स्पष्ट कही गयी है। इस
प्राणशब्दवाच्य जीवात्माके विषयमें आगे चलकर यह भी कहा है कि 'यह
सब कुछ प्राण ही है; इस प्रकार जो चिन्तन करनेवाला, देखनेवाला और
जाननेवाला है, वह अतिवादी होता है।' इसलिये यहाँ यह धारणा होनी
स्वाभाविक है कि इस प्रकरणमें प्राणशब्दवाच्य जीवात्माको ही सबसे बड़ा
बताया गया है; क्योंकि इस उपदेशको सुनकर नारदजीने पुनः अपनी ओरसे
कोई प्रश्न नहीं उठाया। मानो उन्हें अपने प्रश्नका पूरा उत्तर मिल गया हो।
परंतु भगवान् सनत्कुमार तो जानते थे कि इससे आगेकी बात समझाये बिना
इसका ज्ञान अधूरा ही रह जायगा, अतः उन्होंने नारदजीके बिना पूछे ही सत्य
शब्दसे ब्रह्मका प्रकरण उठाया अर्थात् 'तू' शब्दका प्रयोग करके यह स्पष्ट
कर दिया कि 'वास्तविक अतिवादी तो वह है, जो सत्यको जानकर उसके
बलपर प्रतिवाद करता है।' इस कथनसे नारदके मनमें सत्यतत्त्वकी जिज्ञासा उत्पन्न
करके उसे जाननेके साधनरूप विज्ञान, मनन, श्रद्धा, निष्ठा और क्रियाको
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बताया। फिर सुखरूपसे भूमाको अर्थात् सबसे महान् परब्रह्म परमात्माको
बतलाकर प्रकरणका उपसंहार किया। इस प्रकार प्राणशब्दवाच्य जीवात्मासे
अधिक (बड़ा) भूमाको बताये जानेके कारण इस प्रकरणमें 'भूमा' शब्द
सत्य ज्ञानानन्दस्वरूप सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्माका ही वाचक है।
प्राण, जीवात्मा अथवा प्रकृतिका वाचक नहीं।
सम्बन्ध—इतना ही नहीं, अपितु—
धर्मोपपत्तेश्च ॥ १। ३ । ९ ॥
धर्मोपपत्तेः = (उक्त प्रकरणमें) जो भूमाके धर्म बतलाये गये हैं, वे भी
ब्रह्ममें ही सुसंगत हो सकते हैं, इसलिये; च = भी; (यहाँ 'भूमा' ब्रह्म ही है।)
व्याख्या—पूर्वोक्त प्रकरणमें उस भूमाके धर्मोंका इस प्रकार वर्णन
किया गया है—'यत्र नान्यत् पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद् विजानाति
स भूमाथ यत्रान्यत् पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद् विजानाति तदल्पं यो वै
भूमा तदमृतमथ यदल्पं तन्मर्त्यम्। स भगवः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति स्वे
महिम्नि।' (छा० उ० ७।२४।१) अर्थात् 'जहाँ पहुँचकर न अन्य किसीको
देखता है, न अन्यको सुनता है, न अन्यको जानता है, वह भूमा है। जहाँ
अन्यको देखता, सुनता और जानता है, वह अल्प है। जो भूमा है, वही अमृत
है और जो अल्प है, वह नाशवान् है।' इसपर नारदने पूछा—'भगवन् !
वह भूमा किसमें प्रतिष्ठित है?' उत्तरमें सनत्कुमारने कहा—'अपनी
महिमामें।' आगे चलकर फिर कहा है कि 'धन, सम्पत्ति, मकान आदि जो
महिमाके नामसे प्रसिद्ध हैं, ऐसी महिमामें वह भूमा प्रतिष्ठित नहीं है,
किंतु वह नीचे, ऊपर, आगे, पीछे, दायें और बायें है तथा वही यह सब
कुछ है।' इसके बाद उस भूमाको ही आत्माके नामसे कहा है और यह
भी बताया है कि 'आत्मा ही नीचे, ऊपर, आगे, पीछे, दायें और बायें है
तथा वही सब कुछ है। जो इस प्रकार देखने, मानने तथा विशेषरूपसे
जाननेवाला है, वह आत्मामें ही क्रीडा करनेवाला, आत्मामें ही रतिवाला,
आत्मामें ही जुड़ा हुआ तथा आत्मामें ही आनन्दवाला है।' इत्यादि।