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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

४५४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४

४५४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
हो रहा था; (ब्र० सू० २।३।३०) परमधाममें जानेके बाद वैसा नहीं
रहता। यह सब बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है।
सम्बन्ध—यह कैसे निश्चय होता है कि उस समय उपासक सब
बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है? इसपर कहते हैं—
आत्मा प्रकरणात्॥ ४।४।३॥
प्रकरणात्=प्रकरणसे (यह सिद्ध होता है कि वह); आत्मा=शुद्ध
आत्मा ही हो जाता है।
व्याख्या—उस प्रकरणमें जो वर्णन है उसमें यह स्पष्ट कहा गया है कि
‘वह ब्रह्मलोकमें प्राप्त होनेवाला स्वरूप आत्मा है’ (छा० उ० ८।३।४)।
अतः उस प्रकरणसे ही यह सिद्ध होता है कि उस समय वह सब प्रकारके
बन्धनोंसे मुक्त होकर परमात्माके समान परम दिव्य शुद्ध स्वरूपसे युक्त हो
जाता है (गीता १४।२; मु० ३।१।३)।
सम्बन्ध—अब यह जिज्ञासा होती है कि ब्रह्मलोकमें जाकर उस उपासककी
परमात्मासे पृथक् स्थिति रहती है या वह उन्हींमें मिल जाता है। इसका
निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ करते हैं। पहले क्रमशः तीन
प्रकारके मत प्रस्तुत करते हैं—
अविभागेन दृष्टत्वात्॥४।४।४॥
अविभागेन=(उस मुक्तात्माकी स्थिति उस परब्रह्ममें) अविभक्त
रूपसे होती है; दृष्टत्वात्=क्योंकि यही बात श्रुतिमें देखी गयी है।
व्याख्या—श्रुतिमें कहा गया है कि—
'यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति।
एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम॥'
‘हे गौतम! जिस प्रकार शुद्ध जलमें गिरा हुआ शुद्ध जल वैसा ही
हो जाता है, उसी प्रकार परमात्माको जाननेवाले मुनिका आत्मा हो जाता
है’ (क० उ० २।१।१५)। ‘जिस प्रकार बहती हुई नदियाँ नाम-रूपोंको

सूत्र ५-६ ] अध्याय ४ ४५५
छोड़कर समुद्रमें विलीन हो जाती हैं, वैसे ही परमात्माको जाननेवाला विद्वान्
नाम-रूपसे मुक्त होकर परात्पर, दिव्य, परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाता
है'* (मु० उ० ३।२।८)। श्रुतिके इस वर्णनसे यह सिद्ध होता है कि
मुक्तात्मा उस परब्रह्म परमात्मामें अविभक्त रूपसे ही स्थित होता है।
सम्बन्ध - इस विषयमें जैमिनिका मत बतलाते हैं-
ब्राह्मेण जैमिनिरूपन्यासादिभ्यः ॥४।४।५॥
जैमिनिः = आचार्य जैमिनि कहते हैं कि; ब्राह्मेण = ब्रह्मके सदृश रूपसे
स्थित होता है; उपन्यासादिभ्यः = क्योंकि श्रुतिमें जो उसके स्वरूपका निरूपण
किया गया है, उसे देखनेसे और स्मृति-प्रमाणसे भी यही सिद्ध होता है।
व्याख्या - आचार्य जैमिनिका कहना है कि श्रुतिमें 'वह निर्मल होकर
परम समताको प्राप्त हो जाता है।' (मु० उ० ३।१।३) ऐसा वर्णन
मिलता है तथा उक्त प्रकरणमें भी उसका दिव्य स्वरूपसे सम्पन्न होना
कहा गया है (छा० उ० ८।३।४) एवं गीतामें भी भगवान्ने कहा है
कि 'इस ज्ञानका आश्रय लेकर मेरे दिव्य गुणोंकी समताको प्राप्त हुए
महापुरुष सृष्टिकालमें उत्पन्न और प्रलयकालमें व्यथित नहीं होते' (गीता
१४। २)। इन प्रमाणोंसे यह सिद्ध होता है कि वह उपासक उस
परमात्माके सदृश दिव्य स्वरूपसे सम्पन्न होता है।
सम्बन्ध - इसी विषयमें आचार्य औडुलोमिका मत उपस्थित करते हैं-
चितितन्मात्रेण तदात्मकत्वादित्यौडुलोमिः ॥४।४।६॥
चितितन्मात्रेण = केवल चेतनमात्र स्वरूपसे स्थित रहता है; तदात्म-
कत्वात्=क्योंकि उसका वास्तविक स्वरूप वैसा ही है; इति = ऐसा;
औडुलोमिः = आचार्य औडुलोमि कहते हैं।
व्याख्या - परमधाममें गया हुआ मुक्तात्मा अपने वास्तविक चैतन्यमात्र
स्वरूपसे स्थित रहता है; क्योंकि श्रुतिमें उसका वैसा ही स्वरूप बताया गया

  • यह मन्त्र सूत्र १। ४। २१ की व्याख्यामें अर्थसहित आया है।