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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

३७८ वेदान्त-दर्शन [पाद ४

३७८ वेदान्त-दर्शन [पाद ४
नाविशेषात् ॥ ३ । ४ । १३ ॥
अविशेषात् = वह श्रुति विशेषरूपसे विद्वान्के लिये नहीं कही गयी है,
इसलिये; न = ज्ञानके साथ उसका समुच्चय नहीं है।
व्याख्या—वहाँ जो त्यागपूर्वक आजीवन कर्म करनेके लिये कहा है,
वह कथन सभी साधकोंके लिये समानभावसे है, ज्ञानीके लिये विशेषरूपसे
नहीं है। अतः उससे न तो यह सिद्ध होता है कि ब्रह्मविद्या कर्मका अंग है और
न यही सिद्ध होता है कि केवल ब्रह्मविद्यासे परम पुरुषार्थ प्राप्त नहीं होता।
सम्बन्ध—यदि उस श्रुतिको समानभावसे सबके लिये मान लिया जाय
तो फिर उसके द्वारा ज्ञानीके लिये भी तो कर्मका विधान हो ही जाता है,
इसपर कहते हैं—
स्तुतयेऽनुमतिर्वा ॥ ३ । ४ । १४ ॥
वा=अथवा यों समझो कि; स्तुतये=विद्याकी स्तुतिके लिये;
अनुमतिः=सम्मतिमात्र है।
व्याख्या—यदि इस श्रुतिको समानभावसे ज्ञानीके लिये भी माना जाय
तो उसका यह भाव समझना चाहिये कि ज्ञानी लोकसंग्रहार्थ आजीवन कर्म
करता रहे तो भी ब्रह्मविद्याके प्रभावसे उसमें कर्म लिप्त नहीं होते। वह उनसे
सर्वथा सम्बन्धरहित रहता है। इस प्रकार ब्रह्मविद्याकी प्रशंसा करनेके लिये
यह श्रुति कर्म करनेकी सम्मतिमात्र देती है, उसे कर्म करनेके लिये बाध्य
नहीं करती, अतः यह श्रुति विद्याको कर्मोंका अंग बतलानेके लिये नहीं है।
सम्बन्ध—इसी बातको सिद्ध करनेके लिये दूसरी युक्ति देते हैं—
कामकारेण चैके ॥ ३ । ४ । १५ ॥
च=इसके सिवा; एके=कई एक विद्वान्; कामकारेण=स्वेच्छापूर्वक
(कर्मोंका त्याग कर देते हैं, इसलिये भी विद्या कर्मोंका अंग नहीं है)।
व्याख्या—श्रुति कहती है कि 'किं प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्मायं
लोकः।'—'हम प्रजासे क्या प्रयोजन सिद्ध करेंगे जिनका यह परब्रह्म