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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

३७६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४

३७६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
हो गया है, उनको न तो कर्म करनेसे कोई प्रयोजन है और न उनके त्यागसे
ही (गीता ३। १७)। अतएव प्रारब्ध तथा ईश्वरके विधानानुसार उनका आचरण
दोनों प्रकारका ही होता है। इसके सिवा श्रुतिमें यह भी कहा है कि 'इसीलिये
पूर्वके विद्वानोंने अग्निहोत्रादि कर्मोंका अनुष्ठान नहीं किया' (कौ० उ० २। ५)
'इस आत्माको जानकर ही ब्राह्मणलोग पुत्रादिकी इच्छाका त्याग करके
विरक्त हो भिक्षासे निर्वाह करते हुए विचरते हैं' (बृह० उ० ३। ५। १) याज्ञवल्क्यने
भी दूसरोंमें वैराग्यकी भावना उत्पन्न करनेके लिये अन्तमें संन्यास ग्रहण
किया (बृह० उ० ४। ५। १५)। इस प्रकार श्रुतियोंके कर्म-त्यागके आचारका
भी जगह-जगह वर्णन पाया जाता है। इसलिये यही सिद्ध होता है कि परमपुरुषार्थका
हेतु केवल ब्रह्मज्ञान ही है और वह कर्मका अंग नहीं है।
सम्बन्ध — पूर्वपक्षकी ओरसे जो श्रुतिका प्रमाण दिया गया था, उसका
उत्तर देते हैं—
असार्वत्रिकी ॥ ३ । ४ । १० ॥
असार्वत्रिकी = (वह श्रुति) सर्वत्र सम्बन्ध रखनेवाली नहीं है—एक-
देशीय है।
व्याख्या — पूर्वपक्षीने जो 'यदेव विद्यया करोति' (छा० उ० १। १। १०)
इत्यादि श्रुतिका प्रमाण दिया है, वह सब विद्याओंसे सम्बन्धित नहीं है—
एकदेशीय है। अतः उस प्रकरणमें आयी हुई उद्गीथ-विद्यासे ही उसका
सम्बन्ध है, उसको ही वह कर्मका अंग बताती है, अन्य सब प्रकरणोंमें
वर्णित समस्त विद्याओंसे उसका कोई सम्बन्ध नहीं है। अतः उस एकदेशीय
श्रुतिसे यह सिद्ध नहीं हो सकता कि विद्यामात्र कर्मका अंग है।
सम्बन्ध — पाँचवें सूत्रमें पूर्वपक्षीने जिस श्रुतिका प्रमाण दिया है, उसके
विषयमें उत्तर देते हैं—
विभागः शतवत् ॥ ३ । ४ । ११ ॥
शतवत्=एक सौ मुद्राके विभागकी भाँति; विभागः=उस श्रुतिमें कहा
हुआ विद्या-कर्मका विभाग अधिकारिभेदसे समझना चाहिये।

व्याख्या - जिस प्रकार किसीको आज्ञा दी जाय कि 'एक सौ मुद्रा
उपस्थित लोगोंको दे दो।' तो सुननेवाला पुरुष पानेवाले लोगोंके
अधिकारके अनुसार विभाग करके उन मुद्राओंका वितरण करेगा। उसी
प्रकार इस श्रुतिके कथनका भाव भी अधिकारीके अनुसार विभागपूर्वक
समझना चाहिये। जो ब्रह्मज्ञानी है, उसके कर्म तो यहीं नष्ट हो जाते हैं।
अतः वह केवल विद्याके बलसे ही ब्रह्मलोकको जाता है। उसके साथ
कर्म नहीं जाते (मु० उ० १।२।११) और जो सांसारिक मनुष्य हैं या
साधनभ्रष्ट हैं, उनके साथ विद्या और कर्म दोनोंके ही संस्कार जाते हैं।
वहाँ विद्याका अर्थ परमात्माका अपरोक्षज्ञान नहीं, किंतु केवल श्रवण,
मनन आदिका अभ्यास समझना चाहिये। अतः इससे भी विद्या कर्मका
अंग है, यह सिद्ध नहीं होता।
सम्बन्ध - पूर्वपक्षकी ओरसे जो छठे सूत्रमें प्रजापतिके वचनोंका प्रमाण
दिया गया था, उसका उत्तर देते हैं—
अध्ययनमात्रवतः ॥ ३।४।१२॥
अध्ययनमात्रवतः = जिसने विद्याका केवल अध्ययनमात्र किया है,
अनुष्ठान नहीं, ऐसे विद्वान्‌के विषयमें यह कथन है।
व्याख्या - प्रजापतिके उपदेशमें जो विद्यासम्पन्न पुरुषके लिये कुटुम्बमें
जाने और कर्म करनेकी बात कही गयी है, वह कथन गुरुकुलसे अध्ययनमात्र
करके निकलनेवाले ब्रह्मचारीके लिये है। अतः जिसने ब्रह्मविद्याका केवल
अध्ययन किया है, मनन और निदिध्यासनपूर्वक उसका अनुष्ठान नहीं
किया, ऐसे अधिकारीके प्रति अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये कर्मोंका विधान
है, जो कि सर्वथा उचित है; किंतु इससे यह सिद्ध नहीं होता कि ब्रह्मविद्या
कर्मोंका अंग है।
सम्बन्ध - पूर्वपक्षकी ओरसे जो अन्तिम श्रुति-प्रमाण दिया गया है,
उसका उत्तर चार सूत्रोंमें अनेक प्रकारसे देते हैं—