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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

३५२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३

३५२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३
भेद उपाधिकृत नहीं है तथा उस परब्रह्म परमेश्वरमें जो सर्वज्ञत्व, सर्वशक्तिमत्ता,
सर्वाधारता तथा सर्वसुहृद् होना आदि दिव्य गुण शास्त्रोंमें बताये गये हैं, वे भी
उपाधिकृत नहीं हैं; किंतु स्वभावसिद्ध और नित्य हैं। जहाँ ब्रह्मके स्वरूपका
प्रतिपादन करते समय उनका वर्णन न हो, वहाँ भी उन सबका अध्याहार
कर लेना चाहिये। अब फलविषयक श्रुतियोंका विरोधाभास दूर करके
सिद्धान्त-निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है। दहरविद्यामें
तथा प्रजापति-इन्द्रके संवादमें जो ब्रह्मविद्याका वर्णन है, उसके फलमें
इच्छानुसार नाना प्रकारके भोगोंको भोगनेकी बात कही गयी है (छा० उ०
८।२।१ से १० तक); किंतु दूसरी जगह वैसी बात नहीं कही गयी है। अतः
यह जिज्ञासा होती है कि ब्रह्मलोकको प्राप्त होनेवाले सभी साधकोंके लिये
यह नियम है या इसमें विकल्प है ? इसपर कहते हैं—
तन्निर्धारणानियमस्तद्दृष्टेः पृथग्घ्यप्रतिबन्धः
फलम्॥ ३।३।४२॥
तन्निर्धारणानियमः = भोगोंके भोगनेका निश्चित नियम नहीं है;
तद्दृष्टेः = क्योंकि यह बात उस प्रकरणमें बार-बार 'यदि' शब्दके
प्रयोगसे देखी गयी है; हि = इसके सिवा, दूसरा कारण यह भी है कि;
पृथक् = कामोपभोगसे भिन्न संकल्पवालेके लिये; अप्रतिबन्धः = जन्म-
मरणके बन्धनसे छूट जाना ही; फलम् = फल बताया गया है।
व्याख्या—ब्रह्मलोकमें जानेवाले सभी साधकोंको उस लोकके दिव्य
भोगोंका उपभोग करना पड़े, यह नियम नहीं है; क्योंकि जहाँ-जहाँ ब्रह्मलोककी
प्राप्तिका वर्णन किया गया है, वहाँ सब जगह भोगोंके उपभोगकी बात नहीं
कही है तथा जहाँ कही है, वहाँ भी 'यदि' शब्दका प्रयोग करके साधकके
इच्छानुसार उसका विकल्प दिखा दिया है। (छा० उ० ८।२।१ से १०
तक) इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि जो साधक ब्रह्मलोकके या अन्य
किसी भी देवलोकके भोगोंको भोगनेकी इच्छा रखता है उसीको वे भोग
मिलते हैं, ब्रह्मविद्याकी स्तुतिके लिये यह आनुषंगिक वर्णन है, उस विद्याका

सूत्र ४३-४४ ] अध्याय ३ ३५३
मुख्य फल नहीं है। परमात्माके साक्षात्कारमें तो ये भोग विलम्ब करनेवाले
विघ्न हैं, अतः साधकको इन भोगोंकी भी उपेक्षा ही करनी चाहिये। इसलिये
जिनके मनमें भोग भोगनेका संकल्प नहीं है, उनके लिये जन्म-मरणके
बन्धनसे छूटकर तत्काल परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाना ही उसका मुख्य
फल बताया गया है। (बृह० उ० ४।४।६^१ तथा क० उ० २।३।१४^२)।
सम्बन्ध—'यदि ब्रह्मलोकके भोगकी भी उस परब्रह्म परमेश्वरके
साक्षात्कारमें विलम्ब करनेवाले हैं, तब श्रुतिने ऐसे फलोंका वर्णन किसलिये
किया?' इस जिज्ञासापर कहते हैं—
प्रदानवदेव तदुक्तम्॥ ३।३।४३॥
तदुक्तम् = वह कथन; प्रदानवत् = वरदानकी भाँति; एव = ही हैं।
व्याख्या—जिस प्रकार भगवान् या कोई शक्तिशाली महापुरुष किसी
श्रद्धालु व्यक्तिको उसकी श्रद्धा और रुचि बढ़ानेके लिये वरदान दे दिया
करते हैं, उसी प्रकार स्वर्गके भोगोंसे आसक्ति रखनेवाले सकामकर्मी
श्रद्धालु मनुष्योंकी ब्रह्मविद्यामें श्रद्धा बढ़ाकर उसमें उन्हें प्रवृत्त करनेके
लिये एवं कर्मोंके फलरूप स्वर्गीय भोगोंकी तुच्छता दिखलानेके लिये भी
श्रुतिका वह कथन है।
सम्बन्ध—उक्त सिद्धान्तको पुष्ट करनेके लिये दूसरी युक्ति देते हैं—
लिंगभूयस्त्वात्तद्धि बलीयस्तदपि॥ ३।३।४४॥
लिंगभूयस्त्वात् = जन्म-मरणरूप संसारसे सदाके लिये मुक्त होकर उस
परब्रह्मको प्राप्त हो जानारूप फल बतानेवाले लक्षणोंकी अधिकता होनेके
कारण; तद्बलीयः = वही फल बलवान् (मुख्य) है; हि = क्योंकि; तदपि = वह
दूसरे फलोंका वर्णन भी मुख्य फलका महत्त्व प्रकट करनेके लिये ही है।
१-यह मन्त्र सूत्र ३।३।३० की व्याख्यामें आया है।
२-यह मन्त्र सूत्र ३।४।५२ की टिप्पणीमें आया है।