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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

२०२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २

२०२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
ही वे प्रधान (प्रकृति) और जीवोंको भी अनन्त मानते हैं। अतः यह प्रश्न
उठता है कि उनका माना हुआ ईश्वर यह बात जानता है या नहीं कि ‘जीव
कितने और कैसे हैं? प्रधानका स्वरूप क्या और कैसा है? तथा मैं (ईश्वर)
कौन और कैसा हूँ?’ इसके उत्तरमें यदि पाशुपतमतवाले यह कहें कि ईश्वर
यह सब कुछ जानता है, तब तो जाननेमें आ जानेवाले पदार्थोंको अनन्त
(असीम) मानना या कहना अयुक्त सिद्ध होता है और यदि कहें, वह नहीं
जानता तो ईश्वरको सर्वज्ञ मानना नहीं बन सकता। अतः या तो ईश्वर,
जीवात्मा और प्रकृतिको सान्त मानना पड़ेगा या ईश्वरको अल्पज्ञ स्वीकार
करना पड़ेगा। इस प्रकार पूर्वोक्त सिद्धान्त दोषयुक्त एवं वेदविरुद्ध होनेके
कारण माननेयोग्य नहीं है।
सम्बन्ध— यहाँतक वेदविरुद्ध मतोंका खण्डन किया गया। अब वेदप्रमाण
माननेवाले पांचरात्र आगममें जो आंशिक अनुपपत्तिकी शंका उठायी जाती
है, उसका समाधान करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ करते हैं। भागवत-
शास्त्र, पांचरात्र आदिकी प्रक्रिया इस प्रकार है—‘परम कारण परब्रह्मस्वरूप
‘वासुदेव’ से ‘संकर्षण’ नामक जीवकी उत्पत्ति होती है; संकर्षणसे ‘प्रद्युम्न’
संज्ञक मन उत्पन्न होता है और उस प्रद्युम्नसे ‘अनिरुद्ध’ नामधारी अहंकारकी
उत्पत्ति होती है। इसमें दोषकी उद्भावना करते हुए पूर्वपक्षी कहता है—
उत्पत्त्यसम्भवात् ॥ २ । २ । ४२ ॥
उत्पत्त्यसम्भवात् = जीवकी उत्पत्ति सम्भव नहीं है, इसलिये (वासुदेवसे
संकर्षणकी उत्पत्ति मानना वेदविरुद्ध प्रतीत होता है)।
व्याख्या— भागवत-शास्त्र या पांचरात्र-आगम जो यह मानता है कि
‘इस जगत्के परम कारण परब्रह्म पुरुषोत्तम श्री ‘वासुदेव’ हैं, वे ही इसके
निमित्त और उपादान भी हैं;’ यह वैदिक मान्यताके सर्वथा अनुकूल है। परंतु
उसमें भगवान् वासुदेवसे जो ‘संकर्षण’ नामक जीवकी उत्पत्ति बतायी गयी
है, यह कथन वेदविरुद्ध जान पड़ता है, क्योंकि श्रुतिमें जीवको जन्म-मरणसे
रहित और नित्य कहा गया है (क० उ० १।२।१८)। उत्पन्न होनेवाली वस्तु