वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
१८२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
१८२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २
व्याख्या—परमाणुवादी परमाणुओंको नित्य मानते हैं, अतः उनका
जैसा भी स्वभाव माना जाय, वह नित्य ही होगा। यदि ऐसा मानें कि उनमें
प्रवृत्ति-मूलक कर्म स्वभावतः होता है, तब तो सदा ही सृष्टि होती रहेगी,
कभी भी प्रलय नहीं होगा। यदि उनमें निवृत्ति-मूलक कर्मका होना
स्वाभाविक मानें तब तो सदा संहार ही बना रहेगा, सृष्टि नहीं होगी। यदि
दोनों प्रकारके कर्मोंको उनमें स्वाभाविक माना जाय तो यह असंगत जान
पड़ता है; क्योंकि एक ही तत्त्वमें परस्परविरुद्ध दो स्वभाव नहीं रह सकते।
यदि उनमें दोनों तरहके कर्मोंका न होना ही स्वाभाविक मान लिया जाय
तब तो यह स्वीकार करना पड़ेगा कि कोई निमित्त प्राप्त होनेपर ही उनमें
प्रवृत्ति एवं निवृत्ति-सम्बन्धी कर्म भी हो सकते हैं; परंतु उनके द्वारा माने
हुए निमित्तसे सृष्टिका आरम्भ न होना पहले ही सिद्ध कर दिया गया है,
इसलिये यह परमाणुकारणवाद सर्वथा अयुक्त है।
सम्बन्ध—अब परमाणुओंकी नित्यतामें ही संदेह उपस्थित करते हुए
परमाणुकारणवादकी व्यर्थता सिद्ध करते हैं—
रूपादिमत्त्वाच्च विपर्ययो दर्शनात्॥ २। २। १५॥
च=तथा; रूपादिमत्त्वात्=परमाणुओंको रूप, रस आदि गुणोंवाला
माना गया है, इसलिये; विपर्ययः =उनमें नित्यताके विपरीत अनित्यताका
दोष उपस्थित होता है; दर्शनात्=क्योंकि ऐसा ही देखा जाता है।
व्याख्या—वैशेषिक मतमें परमाणु नित्य होनेके साथ-साथ रूप,
रस आदि गुणोंसे युक्त भी माने गये हैं। इससे उनमें नित्यताके
विपरीत अनित्यताका दोष उपस्थित होता है; रूपादि गुणोंसे युक्त
होनेपर वे नित्य नहीं माने जा सकते, क्योंकि रूप आदि गुणवाली
जो घट आदि वस्तुएँ हैं, उनकी अनित्यता प्रत्यक्ष देखी जाती
है। यदि उन परमाणुओंको रूप, रस आदि गुणोंसे रहित मानें
तो उनके कार्यमें रूप आदि गुण नहीं होने चाहिये। इसके सिवा
वैसा न माननेपर 'रूपादिमन्तो नित्याश्च'—रूपादि गुणोंसे युक्त और
सूत्र १६ ] अध्याय २ १८३
नित्य हैं, इस प्रतिज्ञाकी सिद्धि नहीं होती। इस प्रकार अनुपपत्तियोंसे भरा
हुआ यह परमाणुवाद कदापि सिद्ध नहीं होता।
सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे परमाणुवादको सदोष सिद्ध करते हैं—
उभयथा च दोषात्॥ २। २। १६॥
उभयथा=परमाणुओंको न्यूनाधिक गुणोंसे युक्त मानें या गुणरहित
मानें, दोनों प्रकारसे; च=ही; दोषात्=दोष आता है, इसलिये (परमाणुवाद
सिद्ध नहीं होता।)
व्याख्या—पृथिवी आदि भूतोंमेंसे किसीमें अधिक और किसीमें कम
गुण देखे जाते हैं, इससे उनके आरम्भक परमाणुओंमें भी न्यूनाधिक गुणोंकी
स्थिति माननी होगी। ऐसी दशामें यदि उनको अधिक गुणोंसे युक्त माना
जाय तब तो सभी कार्योंमें उतने ही गुण होने चाहिये; क्योंकि कारणके गुण
कार्यमें समानजातीय गुणान्तर प्रकट करते हैं। उस दशामें जलमें भी गन्ध
और तेजमें भी गन्ध एवं रस प्रकट होनेका दोष प्राप्त होगा। अधिक गुणवाली
पृथिवीमें स्थूलता नामक गुण देखा जाता है, यही गुण कारणभूत परमाणुमें
मानना पड़ेगा। यदि ऐसा मानें कि उनमें न्यूनतम अर्थात् एक-एक गुण ही हैं
तब तो सभी स्थूल भूतोंमें एक-एक गुण ही प्रकट होना चाहिये। उस
अवस्थामें तेजमें स्पर्श नहीं होगा, जलमें रूप और स्पर्श नहीं रहेंगे तथा
पृथिवीमें रस, रूप एवं स्पर्शका अभाव होगा; क्योंकि उनके परमाणुओंमें
एकसे अधिक गुणका अभाव है। यदि उनमें सर्वथा गुणोंका अभाव मान लें
तो उनके कार्योंमें जो गुण प्रकट होते हैं, वे उन कारणोंके विपरीत होंगे। यदि
कहें कि विभिन्न भूतोंके अनुसार उनके कारणोंमें कहीं अधिक, कहीं कम
गुण स्वीकार करनेसे दोष नहीं आवेगा; तो ठीक नहीं है; क्योंकि जिन
परमाणुओंमें अधिक गुण माने जायँगे, उनकी परमाणुता ही नहीं रह जायगी;
अतः परमाणुवाद किसी भी युक्तिसे सिद्ध नहीं होता है।
सम्बन्ध—अब परमाणुवादको अग्राह्य बताते हुए इस प्रकरणको समाप्त
करते हैं—