वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
१२२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
१२२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
प्राणादयो वाक्यशेषात् ॥ १ । ४ । १२ ॥
वाक्यशेषात्=बादवाले मन्त्रमें कहे हुए वाक्यसे; प्राणादयः=(यहाँ)
प्राण और इन्द्रियाँ ही ग्रहण करनेयोग्य हैं।
व्याख्या-उपर्युक्त मन्त्रके बाद आया हुआ मन्त्र इस प्रकार है-
‘प्राणस्य प्राणमुत चक्षुषश्चक्षुरुत श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो ये मनो विदुः। ते
निचिक्युर्ब्रह्म पुराणमग्र्यम् ॥' (४।४। १८) अर्थात् 'जो विद्वान् उस प्राणके
प्राण, चक्षुके चक्षु, श्रोत्रके श्रोत्र तथा मनके भी मनको जानते हैं; वे उस
आदि पुराण-पुरुष परमेश्वरको जानते हैं।' इस वर्णनसे यह सिद्ध होता है कि
पूर्वमन्त्रमें ‘पञ्च पञ्चजनाः' पदोंके द्वारा पंच प्राण, पंच ज्ञानेन्द्रिय, पंच
कर्मेन्द्रिय, मन तथा बुद्धि आदि परमेश्वरकी कार्यशक्तियोंका ही वर्णन है;
क्योंकि उस ब्रह्मको ही उक्त मन्त्रमें प्राणका प्राण' चक्षुका चक्षु, श्रोत्रका श्रोत्र
तथा मनका भी मन कहा गया है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि उस
परब्रह्मके सम्बन्धसे ही प्राण आदि अपना कार्य करनेमें समर्थ होते हैं,
इसलिये यहाँ इनके रूपमें उसीकी शक्तिविशेषका विस्तार बताया गया है।
सम्बन्ध - "माध्यन्दिनी शाखावालोंके पाठके अनुसार 'प्राणस्य प्राणम्'
इत्यादि मन्त्रमें अन्नका भी वर्णन होनेसे प्राण, चक्षु, श्रोत्र, मन और अन्नको
लेकर पाँचकी संख्या पूर्ण हो जाती है; परंतु काण्वशाखाके मन्त्रमें 'अन्न' का
वर्णन नहीं है; अतः वहाँ उस परमेश्वरकी पंचविध कार्यशक्तियोंकी संख्या
कैसे पूरी होगी ?'' ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं-
ज्योतिषैकेषामसत्यन्ने ॥ १ । ४ । १३ ॥
एकेषाम् = एक शाखावालोंके पाठमें; अन्ने = अन्नका वर्णन; असति = न
होनेपर; ज्योतिषा = पूर्ववर्णित 'ज्योतिष' के द्वारा (संख्यापूर्ति की जा सकती है)।
व्याख्या- 'माध्यन्दिनी' शाखावालोंके पाठके अनुसार इस मन्त्रमें
ब्रह्मको 'प्राणका प्राण' आदि बताते हुए 'अन्नका अन्न' भी कहा गया है।
अतः उनके पाठानुसार यहाँ पाँचकी संख्या पूर्ण हो जाती है। परंतु काण्वशाखा-
सूत्र १४ ] अध्याय १ १२३
वालोंके पाठमें 'अन्नस्य अन्नम्' इस अंशका ग्रहण नहीं हुआ है; अतः
उनके अनुसार चारका ही वर्णन होनेपर पाँचकी संख्या-पूर्तिमें एककी कमी
रह जाती है। अतः सूत्रकार कहते हैं कि काण्वशाखाके पाठमें अन्नका ग्रहण
न होनेसे जो एककी कमी रहती है, उसकी पूर्ति ४।४।१६ के मन्त्रमें वर्णित
'ज्योति' के द्वारा कर लेनी चाहिये। वहाँ उस ब्रह्मको 'ज्योतिकी भी ज्योति'
बताया गया है। सत्रहवें मन्त्रका वर्णन तो संकेतमात्र है, इसलिये उसमें पाँच
संख्याकी पूर्ति करना आवश्यक नहीं है, तो भी ग्रन्थकारने किसी प्रकार भी
प्रसंगवश उठनेवाली शंकाका निराकरण करनेके लिये यह सूत्र कहा है।
सम्बन्ध — यहाँ यह शंका होती है कि 'श्रुतियोंमें जगत्के कारणका
अनेक प्रकारसे वर्णन आया है। कहीं सत्से सृष्टि बतायी गयी है, कहीं
असत्से तथा जगत्की उत्पत्तिके क्रममें भी भेद है। कहीं पहले आकाशकी
उत्पत्ति बतायी है, कहीं तेजकी, कहीं प्राणकी और कहीं अन्य किसीकी।
इस प्रकार वर्णनमें भेद होनेसे वेदवाक्योंद्वारा यह निश्चित नहीं किया जा
सकता कि जगत्का कारण केवल परब्रह्म परमेश्वर ही है तथा सृष्टिका क्रम
अमुक प्रकारका ही है।' इसपर कहते हैं—
कारणत्वेन चाकाशादिषु यथाव्यपदिष्टोक्तेः ॥ १ । ४। १४॥
आकाशादिषु=आकाश आदि किसी भी क्रमसे रचे जानेवाले
पदार्थोंमें; कारणत्वेन=कारणरूपसे; च=तो; यथाव्यपदिष्टोक्तेः=सर्वत्र
एक ही वेदान्त-वर्णित ब्रह्मका प्रतिपादन किया गया है; इसलिये (परब्रह्म
ही जगत्का कारण है)।
व्याख्या — वेदमें जगत्के कारणोंका वर्णन नाना प्रकारसे किया गया है
तथा जगत्की उत्पत्तिका क्रम भी अनेक प्रकारसे बताया गया है, तथापि
केवल परब्रह्मको ही जगत्का कारण माननेमें कोई दोष नहीं है; क्योंकि
जगत्के दूसरे कारण जो आकाश आदि कहे गये हैं, उनका भी परम कारण
परब्रह्मको ही बताया गया है। इससे ब्रह्मकी ही कारणता सिद्ध होती है, अन्य
किसीकी नहीं। जगत्की उत्पत्तिके क्रममें जो भेद आता है, वह इस प्रकार