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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

११२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४

११२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
‘अव्यक्त’ है। यही बात उक्त प्रकरणमें प्रदर्शित है। भाव यह है कि
कठोपनिषद्के इस रूपक-प्रकरणमें आत्माको रथी, शरीरको रथ, बुद्धिको
सारथि, मनको लगाम, इन्द्रियोंको घोड़ा और विषयोंको उन घोड़ोंका चारा
बताया गया है। इन उपकरणोंद्वारा परमपदस्वरूप परमेश्वरको ही प्राप्त
करनेयोग्य कहा गया है। इस प्रकार पूरे रूपकमें सात वस्तुओंकी कल्पना
हुई है। उन्हीं सातोंका वर्णन एकसे दूसरेको बलवान् बतानेमें भी होना
चाहिये। वहाँ इन्द्रियोंकी अपेक्षा विषयोंको बलवान् बताया गया है। जैसे
घास या चारा-दाना देखकर घोड़े हठात् उस ओर आकृष्ट होते हैं, उसी
प्रकार इन्द्रियाँ भी हठात् विषयोंकी ओर खिंच जाती हैं। फिर विषयोंसे परे
मनकी स्थिति कही गयी है; क्योंकि यदि सारथि लगामको खींचे रखे तो
घोड़े चारा-दानाकी ओर हठात् नहीं जा सकते हैं। उसके बाद मनसे परे
बुद्धिका स्थान माना गया है, वही सारथि है। लगामकी अपेक्षा सारथिको
श्रेष्ठ बतलाना उचित ही है; क्योंकि लगाम सारथिके ही अधीन रहती है।
बुद्धिसे परे महान् आत्मा है; यह ‘रथी’ के रूपमें कहा हुआ जीवात्मा ही होना
चाहिये। ‘महान् आत्मा’ का अर्थ महत्तत्त्व मान लें तो इस रूपकमें दो दोष
आते हैं। एक तो बुद्धिरूप सारथिके स्वामी रथी आत्माको छोड़ देना और
दूसरा जिसका रूपकमें वर्णन नहीं है, उस महत्तत्त्वकी व्यर्थ कल्पना करना।
अतः महान् आत्मा यहाँ रथीके रूपमें बताया हुआ जीवात्मा ही है। फिर
महान् आत्मासे परे जो अव्यक्त कहा गया है, वह है भगवान्की शक्तिरूप
प्रकृति। उसीका अंश कारणशरीर है। उसे ही इस प्रसंगमें रथका रूप दिया
गया है। अन्यथा रूपकमें रथकी जगह बताया हुआ शरीर एकसे दूसरेको
श्रेष्ठ बतानेकी परम्परामें छूट जाता है और अव्यक्त नामसे किसी अन्य
तत्त्वकी अप्रासंगिक कल्पना करनी पड़ती है। अतः कारणशरीर भगवान्की
प्रकृतिका अंश होनेसे उसे ही ‘अव्यक्त’ नामसे कहा गया है—
सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि शरीरको ‘अव्यक्त’ कहना
कैसे ठीक होगा; क्योंकि वह तो प्रत्यक्ष ही व्यक्त है। इसपर कहते हैं—