वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
सूत्र ५१ ] अध्याय ३ ३५९
सूत्र ५१ ] अध्याय ३ ३५९
(छा० उ० ८। १। ६)। अतः जिनके भीतर इन फलश्रुतियोंके आधारपर
ब्रह्मलोकके भोग प्राप्त करनेका संकल्प है, उनको तत्काल ब्रह्मका साक्षात्कार
कैसे हो सकता है? किन्तु जो भोगोंसे सर्वथा विरक्त होकर उस परब्रह्म
परमात्माको साक्षात् करनेके लिये तत्पर हैं, उन्हें परमात्माकी प्राप्ति होनेमें
विलम्ब नहीं हो सकता। शरीरके रहते-रहते यहीं परमात्माका साक्षात्कार हो
जाता है। अतः भावनाके भेदसे भिन्न-भिन्न अधिकारियोंको प्राप्त होनेवाले
फलमें भेद होना उचित ही है।
सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे उसी सिद्धान्तको दृढ़ करते हैं—
न सामान्यादप्युपलब्धेर्मृत्युवन्न हि लोकापत्तिः ॥ ३ । ३ । ५१ ॥
सामान्यात्=यद्यपि सभी ब्रह्मविद्या समानभावसे मोक्षमें हेतु हैं;
अपि=तथापि; न=बीचमें होनेवाले फलभेदका निषेध नहीं है; हि=क्योंकि;
उपलब्धेः=परब्रह्म परमेश्वरका साक्षात्कार हो जानेपर; मृत्युवत्=जिस
प्रकार मृत्यु होनेपर जीवात्माका स्थूल शरीरसे सम्बन्ध नहीं रहता, उसी
प्रकार उसका सूक्ष्म या कारण किसी भी शरीरसे सम्बन्ध नहीं रहता,
इसलिये; लोकापत्तिः=किसी भी लोककी प्राप्ति; न=नहीं हो सकती।
व्याख्या—सभी ब्रह्मविद्या अन्तमें मुक्ति देनेवाली हैं, इस विषयमें
सबकी समानता है तो भी किसीका ब्रह्मलोकमें जाना और किसीका ब्रह्मलोक-
में न जाकर यहीं ब्रह्मको प्राप्त हो जाना तथा वहाँ जाकर भी किसीका
प्रलयकालतक भोगोंके उपभोगका सुख अनुभव करना और किसीका
तत्काल ब्रह्ममें लीन हो जाना—इत्यादिरूपसे जो फल-भेद हैं, वे उन साधकोंके
भावसे सम्बन्ध रखते हैं; इसलिये इस भेदका निषेध नहीं हो सकता।
अतएव जिस साधकको मृत्युके पहले कभी भी परमात्माका साक्षात्कार
हो जाता है, जो उस परमेश्वरके तत्त्वको भलीभाँति जान लेता है, जिसकी
ब्रह्मलोकपर्यन्त किसी भी लोकके सुख-भोगमें किंचिन्मात्र भी वासना नहीं
रही है, वह किसी भी लोकविशेषमें नहीं जाता, वह तो तत्काल ही उस
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परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाता है। (बृह० उ० ४।४।६१ तथा क० उ०
२।३।१४२) प्रारब्धभोगके अन्तमें उसके स्थूल, सूक्ष्म और कारण-
शरीरोंके तत्त्व उसी प्रकार अपने-अपने कारण-तत्त्वोंमें विलीन हो जाते हैं,
जिस प्रकार मृत्युके बाद प्रत्येक मनुष्यके स्थूल-शरीरके तत्त्व पाँचों भूतोंमें
विलीन हो जाते हैं (मु० उ० ३।२।७)।३
सम्बन्ध—ऐसा होनेमें क्या प्रमाण है? इस जिज्ञासापर कहते हैं—
परेण च शब्दस्य ताद्विध्यं भूयस्त्वात्त्वनुबन्धः ॥ ३।३।५२ ॥
परेण=बादवाले मन्त्रोंसे (यह सिद्ध होता है); च=तथा; शब्दस्य=उसमें
कहे हुए शब्दसमुदायका; ताद्विध्यम्=उसी प्रकारका भाव है; तु=किंतु
अन्य साधकोंके; भूयस्त्वात्=दूसरे भावोंकी अधिकतासे; अनुबन्धः=सूक्ष्म
और कारण-शरीरसे सम्बन्ध रहता है। (इस कारण वे ब्रह्मलोकमें
जाते हैं)।
व्याख्या—मुण्डकोपनिषद्में पहले तो यह बात कही गयी है कि—
वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः संन्यासयोगाद्यतयः शुद्धसत्त्वाः।
ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे॥
'वेदान्तशास्त्रके ज्ञानद्वारा जिन्होंने वेदान्तके अर्थभूत परब्रह्म परमात्माके
स्वरूपका निश्चय कर लिया है, कर्मफलरूप समस्त भोगोंके त्यागरूप
योगसे जिनका अन्तःकरण शुद्ध हो गया है, वे सब साधक
मरणकालमें ब्रह्मलोकोंमें जाकर परम अमृतस्वरूप होकर सर्वथा मुक्त
हो जाते हैं' (३।२।६)। इसके बाद अगले मन्त्रमें जिनको इस
शरीरका नाश होनेसे पहले ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है, उनके विषयमें
इस प्रकार कहा है—
१-यह मन्त्र सूत्र ३।३।३० की व्याख्यामें आया है।
२-यह मन्त्र सूत्र ३।४।५२ की टिप्पणीमें आया है।
३-यह मन्त्र अगले सूत्रकी व्याख्यामें है।