वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
सूत्र ४२ ] अध्याय १ १०९
सूत्र ४२ ] अध्याय १ १०९
रूपात्मक जगत्को धारण करनेवाला बताया गया है; इसलिये वह भूताकाश
अथवा जीवात्माका वाचक नहीं हो सकता; क्योंकि भूताकाश तो स्वयं
नाम-रूपात्मक प्रपंचके अन्तर्गत है और जीवात्मा सबको धारण करनेमें
समर्थ नहीं है। इसलिये जो भूताकाशसहित समस्त जड-चेतनात्मक जगत्को
अपनेमें धारण करनेवाला है, वह परब्रह्म परमात्मा ही यहाँ 'आकाश'
नामसे कहा गया है। वहाँ जो ब्रह्म, अमृत और आत्मा- ये विशेषण दिये
गये हैं, वे भी भूताकाश अथवा जीवात्माके उपयुक्त नहीं हैं; इसलिये उनसे
भिन्न परब्रह्म परमात्माका ही वहाँ 'आकाश' नामसे वर्णन हुआ है।
सम्बन्ध - यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि मुक्तात्मा जब ब्रह्मको
प्राप्त होता है, उस समय उसमें ब्रह्मके सभी लक्षण आ जाते हैं। अतः
यहाँ उसीको आकाश नामसे कहा गया है; ऐसा मान लें तो क्या हानि है?
इसपर कहते हैं-
सुषुप्त्युत्क्रान्त्योर्भेदेन ॥ १। ३ । ४२ ॥
सुषुप्त्युत्क्रान्त्योः = सुषुप्ति तथा मृत्युकालमें भी; भेदेन = (जीवात्मा
और परमात्माका) भेदपूर्वक वर्णन है (इसलिये 'आकाश' शब्द यहाँ
परमात्माका ही बोधक है)।
व्याख्या - छान्दोग्योपनिषद् (६।८।१)-में कहा है कि जिस अवस्थामें
यह पुरुष सोता है, उस समय यह सत् (अपने कारण) -से सम्पन्न (संयुक्त)
होता है। १ यह वर्णन सुषुप्तिकालका है। इसमें जीवात्माका 'पुरुष' नामसे
और कारणभूत परमात्माका 'सत्' नामसे भेदपूर्वक उल्लेख हुआ है। इसी
तरह उत्क्रान्तिका भी इस प्रकार वर्णन मिलता है - 'यह जीवात्मा इस शरीरसे
निकलकर परमज्योतिः स्वरूप परमात्माको प्राप्त हो अपने शुद्धरूपसे सम्पन्न
हो जाता है।' (छा० उ० ८।३।४) २ इसमें भी सम्प्रसाद नामसे जीवात्माका
१-यह मन्त्र अर्थसहित पृष्ठ २९ में सूत्र १।१।९ की व्याख्यामें आ गया है।
२-यह मन्त्र सूत्र १। ३। १९ की व्याख्या (पृष्ठ ९०) में आ गया है।
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और 'परमज्योति' नामसे परमात्माका भेदपूर्वक निरूपण है। इस प्रकार
सुषुप्ति और उत्क्रान्तिकालमें भी जीवात्मा और परमात्माका भेदपूर्वक
वर्णन होनेसे उपर्युक्त 'आकाश' शब्द मुक्तात्माका वाचक नहीं हो
सकता; क्योंकि मुक्तात्मामें ब्रह्मके सदृश कुछ सद्गुणोंका आविर्भाव होनेपर
भी उसमें नाम-रूपात्मक जगत्को धारण करनेकी शक्ति नहीं आती।
सम्बन्ध—उपर्युक्त कथनकी पुष्टिके लिये ही दूसरा हेतु उपस्थित
करते हैं—
पत्यादिशब्देभ्यः ॥ १ । ३ । ४३ ॥
पत्यादिशब्देभ्यः = उस परब्रह्मके लिये श्रुतिमें पति, परमपति,
परममहेश्वर आदि विशेष शब्दोंका प्रयोग होनेसे भी (यह सिद्ध होता
है कि जीवात्मा और परमात्मामें भेद है)।
व्याख्या—श्वेताश्वतरोपनिषद् (६।७)-में परमात्माके स्वरूपका
इस प्रकार वर्णन आया है—
तमीश्वराणां परमं महेश्वरं तं देवतानां परमं च दैवतम्।
पतिं पतीनां परमं परस्ताद् विदाम देवं भुवनेशमीड्यम्॥
'ईश्वरोंके भी परम महेश्वर, देवताओंके भी परम देवता तथा
पतियोंके भी परम पति, अखिल ब्रह्माण्डके स्वामी एवं स्तवन
करनेयोग्य उस प्रकाशस्वरूप परमात्माको हमलोग सबसे परे जानते हैं।'
इस मन्त्रमें देवता आदिकी कोटिमें जीवात्मा हैं और परम देवता,
परम महेश्वर एवं परम पतिके नामसे परमात्माका वर्णन किया गया है।
इससे भी यही निश्चय होता है कि जीवात्मा और परमात्मामें भेद है।
इसलिये 'आकाश' शब्द परमात्माका ही वाचक है, मुक्त जीवका नहीं।
तीसरा पाद सम्पूर्ण