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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

सूत्र ३९ ] अध्याय ३ ३४९

सूत्र ३९ ] अध्याय ३ ३४९
लेकर जीवसे उसकी भिन्नता नहीं बतायी जा सकती है' तो यह कथन
ठीक नहीं है; क्योंकि-
कामादीतरत्र तत्र चायतनादिभ्यः ॥ ३।३।३९॥
(उस परब्रह्मके) इतरत्र = दूसरी जगह (बताये हुए); कामादि = सत्यकामत्वादि
धर्म; तत्र च= जहाँ निर्विशेष स्वरूपका वर्णन है वहाँ भी हैं.
आयतनादिभ्यः = क्योंकि वहाँ उसके सर्वाधारत्व आदि धर्मोंका वर्णन पाया
जाता है।
व्याख्या- उस परब्रह्म परमेश्वरके जो सत्यसंकल्पत्व, सर्वज्ञत्व तथा
सर्वेश्वरत्वादि धर्म विभिन्न श्रुतियोंमें बतलाये गये हैं, वे सब जहाँ निर्विशेष
ब्रह्मका वर्णन है, वहाँ भी हैं; क्योंकि निर्विशेष स्वरूपका प्रतिपादन करनेवाली
श्रुतियोंमें भी ब्रह्मके सर्वाधारत्व आदि सविशेषधर्मोंका वर्णन है। इसलिये
वैसे दूसरे धर्मोंका भी वहाँ अध्याहार कर लेना उचित है। बृहदारण्यकमें
गार्गीके प्रश्नका उत्तर देते हुए याज्ञवल्क्यने उस परम अक्षर परमात्माके
स्वरूपका वर्णन किया है। वहाँ पहले 'अस्थूलमणणु' (न स्थूल है; न सूक्ष्म
है) इत्यादि प्रकारसे निर्विशेष स्वरूपके लक्षणोंका वर्णन करके अन्तमें कहा
है कि 'इस अक्षरके ही प्रशासनमें सूर्य और चन्द्रमा धारण किये हुए हैं, उस
अक्षरके ही प्रशासनमें द्युलोक और पृथिवी धारण किये हुए हैं।' इस प्रकार
याज्ञवल्क्यने यहाँ उस अक्षरब्रह्मको समस्त जगत्का आधार बतलाया है
(बृह० उ० ३।८।८-९)१ इसी तरह मुण्डकोपनिषद्में 'जाननेमें न आनेवाला,
पकड़नेमें न आनेवाला' इत्यादि प्रकारसे निर्विशेष स्वरूपके धर्मोंका वर्णन
करनेके पश्चात् उस ब्रह्मको नित्य, विभु, सर्वगत, अत्यन्त सूक्ष्म और
समस्त प्राणियोंका कारण बताकर उसे विशेष धर्मोंसे युक्त भी कहा गया है
(मु० उ० १।१।६)२ इससे यह सिद्ध होता है कि 'वह परमात्मा दोनों
१-यह मन्त्र १। ३। १० और ११ की व्याख्यामें आया है।
२-यह मन्त्र सूत्र १। २। २१ की व्याख्यामें आया है।

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प्रकारके धर्मोंवाला है।' इसलिये दूसरी जगह कहे हुए सत्यसंकल्पत्व,
सर्वज्ञत्व आदि जितने भी परमेश्वरके दिव्य गुण हैं, वे उनमें स्वाभाविक
हैं, उपाधिकृत नहीं हैं। अतः जहाँ जिन लक्षणोंका वर्णन नहीं है, वहाँ
उनका अध्याहार कर लेना चाहिये; इस प्रकार परमात्मा और जीवात्मामें
समानधर्मता न होनेके कारण उनमें सर्वथा अभेद नहीं माना जा सकता।
सम्बन्ध—यदि जीव और ईश्वरका भेद उपाधिकृत नहीं माना जायगा,
तब तो अनेक द्रष्टाओंकी सत्ता सिद्ध हो जायगी। इस परिस्थितिमें श्रुतिद्वारा
जो यह कहा है कि 'इससे अन्य कोई द्रष्टा नहीं है' इत्यादि, उसकी
व्यवस्था कैसे होगी? इसपर कहते हैं—
आदरादलोपः ॥ ३। ३। ४० ॥
आदरात् = वह कथन परमेश्वरके प्रति आदरका प्रदर्शक होनेके
कारण; अलोपः = उसमें अन्य द्रष्टाका लोप अर्थात् निषेध नहीं है।
व्याख्या—उस परब्रह्म परमेश्वरको सर्वश्रेष्ठ बतलानेके लिये वहाँ
आदरकी दृष्टिसे अन्य द्रष्टाका निषेध किया गया है, वास्तवमें नहीं।
भाव यह है कि वह परब्रह्म परमेश्वर ऐसा द्रष्टा, ऐसा सर्वश्रेष्ठ ज्ञाता
है कि उसकी अपेक्षा अन्य सब जीव द्रष्टा होते हुए भी नहींके समान
हैं; क्योंकि उनमें पूर्ण द्रष्टापन नहीं है। प्रलयकालमें जड तत्त्वोंकी
भाँति जीवोंको भी किसी प्रकारका विशेष ज्ञान नहीं रहता तथा
वर्तमानकालमें भी जो जीवोंका जानना, देखना, सुनना आदि है, वह
सीमित है और उस अन्तर्यामी परमेश्वरके ही सकाशासे है। (ऐ० उ०
१। ३। ११) तथा (प्र० उ० ४। ९) वही इसका प्रेरक है, अतः यह
सर्वथा स्वतन्त्र नहीं है। इससे यही सिद्ध होता है कि श्रुतिका वह
कहना भगवान्‌की श्रेष्ठता दिखलानेके लिये है, वास्तवमें अन्य द्रष्टाका
निषेध करनेके लिये नहीं है।
सम्बन्ध—उपर्युक्त कथन परमेश्वरके प्रति आदर सूचित करनेके लिये
है, इस बातको प्रकारान्तरसे सिद्ध करते हैं—