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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

सूत्र १३ ] अध्याय ३ २७३

सूत्र १३ ] अध्याय ३ २७३
गया है। इससे तो बुरे कर्म करनेवालोंका भी स्वर्गलोकमें जाना सिद्ध होता
है, अतः श्रुतिमें जो यह कहा गया है कि इष्टापूर्त और दानादि शुभ कर्म
करनेवाले धूममार्गसे चन्द्रलोकको जाते हैं, उसके साथ उपर्युक्त श्रुतिका
विरोध प्रतीत होता है; उसका निराकरण कैसे होगा ?
सम्बन्ध — पूर्वसूत्रमें उपस्थित की हुई शंकाका उत्तर देते हैं—
संयमने त्वनुभूयेतरेषामारोहावरोहौ तद्गति-
दर्शनात् ॥ ३ । १ । १३ ॥
तु=किंतु; इतरेषाम्=दूसरोंका अर्थात् पापकर्म करनेवालोंका; संयमने=
यमलोकमें; अनुभूय=पापकर्मोंका फल भोगनेके बाद; आरोहावरोहौ=चढ़ना-
उतरना होता है; तद्गतिदर्शनात्=क्योंकि उनकी गति श्रुतिमें इसी
प्रकार देखी जाती है।
व्याख्या — वहाँ पापीलोगोंका चन्द्रलोकमें जाना नहीं कहा गया है;
क्योंकि पुण्यकर्मोंका फल भोगनेके लिये ही स्वर्गलोकमें जाना होता है;
चन्द्रलोकमें बुरे कर्मोंका फल भोगनेकी व्यवस्था नहीं है; इसलिये यही
समझना चाहिये कि अच्छे कर्म करनेवाले ही चन्द्रलोकमें जाते हैं। उनसे भिन्न
जो पापीलोग हैं, वे अपने पापकर्मोंका फल भोगनेके लिये यमलोकमें जाते
हैं; वहाँ पापकर्मोंका फल भोग लेनेके बाद उनका पुनः कर्मानुसार गमनागमन
यानी नरकसे मृत्युलोकमें आना और पुनः नये कर्मानुसार स्वर्गमें जाना या
नरक आदि अधोगतिको पाना होता रहता है। उन लोगोंकी गतिका ऐसा ही
वर्णन श्रुतिमें देखा जाता है। कठोपनिषद्में यमराजने स्वयं कहा है कि—
न साम्परायः प्रतिभाति बालं प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम्।
अयं लोको नास्ति पर इति मानी पुनः पुनर्वशमापद्यते मे॥
'सम्पत्तिके अभिमानसे मोहित हुए, निरन्तर प्रमाद करनेवाले अज्ञानीको
परलोक नहीं दीखता। वह समझता है कि यह प्रत्यक्ष दीखनेवाला लोक ही
सत्य है, दूसरा कोई लोक नहीं, इस प्रकार माननेवाला मनुष्य बार-बार मेरे
वशमें पड़ता है।' (कठ० १।२।६) इससे यही सिद्ध होता है कि शुभ कर्म

२७४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १
करनेवाला ही पितृयानमार्गसे या अन्य मार्गसे स्वर्गलोकमें जाता है,
पापीलोग यमलोकमें जाते हैं। कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद्में जिनके चन्द्रलोकमें
जानेकी बात कही गयी है, वे सब पुण्यकर्म करनेवाले ही हैं; क्योंकि
उसी श्रुतिमें चन्द्रलोकसे लौटनेवालोंकी कर्मानुसार गति बतायी गयी
है। इसलिये दोनों श्रुतियोंमें कोई विरोध नहीं है।
सम्बन्ध—इसी बातको दृढ़ करनेके लिये स्मृतिका प्रमाण देते हैं—
स्मरन्ति च॥ ३ । १ । १४॥
च=तथा; स्मरन्ति=स्मृतिमें भी इसी बातका समर्थन किया गया है।
व्याख्या—गीतामें सोलहवें अध्यायके ७ वें श्लोकसे १५ वें श्लोकतक
आसुरी प्रकृतिवाले पापी पुरुषोंके लक्षणोंका विस्तारपूर्वक वर्णन करके
अन्तमें कहा है कि ‘वे अनेक प्रकारके विचारोंसे भ्रान्त हुए, मोहजालमें
फँसे हुए और भोगोंके उपभोगमें रचे-पचे हुए मूढ़लोग कुम्भीपाक आदि
अपवित्र नरकोंमें गिरते हैं (गीता १६। १६)। इस प्रकार स्मृतिके वर्णनसे
भी उसी बातका समर्थन होता है। अतः पापकर्मियोंका नरकमें गमन होता
है; यही मानना ठीक है।
सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे उसी बातको कहते हैं—
अपि च सप्त ॥ ३ । १ । १५ ॥
अपि च=इसके सिवा; सप्त=पापकर्मका फल भोगनेके लिये
प्रधानतः सात नरकोंका भी वर्णन आया है।
व्याख्या—इसके सिवा, पापकर्मोंका फल भोगनेके लिये पुराणोंमें
प्रधानतासे रौरव आदि सात नरकोंका भी वर्णन किया गया है, इससे
उन पापकर्मियोंके स्वर्गगमनकी तो सम्भावना ही नहीं की जा सकती।
सम्बन्ध—नरकोंमें तो चित्रगुप्त आदि दूसरे अधिकारी बताये गये हैं,
फिर यह कैसे कहा कि पापीलोग यमराजके अधिकारमें दण्ड भोगते हैं?
इसपर कहते हैं—