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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

सूत्र १०] अध्याय १ ८३

सूत्र १०] अध्याय १ ८३
इन सब धर्मोंकी संगति परब्रह्म परमात्मामें ही लग सकती है; अतः
वही इस प्रकरणमें 'भूमा' के नामसे कहा गया है।
सम्बन्ध—पूर्व प्रकरणमें भूमाके जो धर्म बताये गये हैं, वे ही
बृहदारण्यकोपनिषद् (३।८।७)-में 'अक्षर' के भी धर्म कहे गये हैं। अक्षर
शब्द प्रणवरूप वर्णका भी वाचक है; अतः यहाँ 'अक्षर' शब्द किसका वाचक
है? इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है—
अक्षरमम्बरान्तधृतेः ॥ १। ३। १०॥
अक्षरम् = (उक्त प्रकरणमें) अक्षर शब्द परब्रह्म परमात्माका ही
वाचक है; अम्बरान्तधृतेः = क्योंकि उसको आकाशपर्यन्त सम्पूर्ण जगत्को
धारण करनेवाला बताया गया है।
व्याख्या—यह प्रकरण इस प्रकार है—'सा होवाच यदूर्ध्वं याज्ञवल्क्य
दिवो यदवाक् पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद् भूतं च भवच्च
भविष्यच्चेत्याचक्षते कस्मिन् तदोतं च प्रोतं चेति॥' (३।८।६)
गार्गीने याज्ञवल्क्यसे पूछा—'याज्ञवल्क्य! जो द्युलोकसे भी ऊपर, पृथिवीसे
भी नीचे और इन दोनोंके बीचमें भी हैं तथा जो यह पृथिवी और द्युलोक
हैं, ये सब-के-सब एवं जिसको भूत, भविष्यत् और वर्तमान कहते हैं,
वह काल किसमें ओत-प्रोत है?' इसके उत्तरमें याज्ञवल्क्यने कहा—
'गार्गि ! यह सब आकाशमें ओत-प्रोत है।' इसपर गार्गीने पूछा—'वह
आकाश किसमें ओत-प्रोत है?' (३।८।७) तब याज्ञवल्क्यने कहा—
'एतद्वै तदक्षरं गार्गि ब्राह्मणा अभिवदन्त्यस्थूलमनण्वह्रस्वमदीर्घमलोहित-
मस्नेहम्······ इत्यादि।' 'हे गार्गि ! उस तत्त्वको तो ब्रह्मवेत्तालोग 'अक्षर'
कहते हैं। जो कि न स्थूल है, न सूक्ष्म है, न छोटा है, न बड़ा है, न
लाल है, न पीला है, इत्यादि।' (३।८।८) इस प्रकार वह
अक्षर आकाशपर्यन्त सबको धारण करनेवाला बताया गया है,
इसलिये यहाँ 'अक्षर' नामसे उस परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन है, अन्य
किसीका नहीं।