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विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha

विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished704 पृष्ठ

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४२६
हजारों स्त्रियो की जवानी यह बात सुनी गई कि पति जी
तो दो दो तीन तीन बार संभोग करते हैं परन्तु हमारी इच्छा
एक बार भी नही होती क्योंकि पति जी का हमारे पास आते ही
बातचीत करते ही करते वीर्य बहने लगता है, दो तीन घंटे मे
फिर प्रसग के लिये तैयार होते हैं फिर ऐसा ही होजाता है। हमारी
कभी इच्छा ही नहीं होती, हम महीनों तक पति के सग से कुछ
लाभ नहीं उठाती गर्भ कैसे रहे। इससे मालूम होता है जो पुरुष
अनियम प्रसंग करते हैं उनको बड़ी हानि पहुंचती है। स्त्रियो को
प्रसंग से तो उतनी नही पहुँचती परन्तु प्रसंग ठीक न होने
से उन्हें और भी अनेक रोग उत्पन्न होजाते हैं जिनका वर्णन
आगे कहूंगी। यहां इतना वर्णन करने से यह पता चल जायगा
कि अनेक कारणों से योनि मे भिन्न २ प्रकार की खराबियां
होती हैं। यहां केवल वीर्य सम्बन्धी पुरुष रोगों का-जो अनियम
प्रसंग से उत्पन्न होते हैं उनका वर्णन करती हूँ ।
तथा बीजमकालाम्बुकृमिकीटाग्नि दूषितम् ।
न विरोहति सन्तुष्टं तथा शुक्रं शरीरिणाम् ॥
अर्थात्—जैसे कुसमय वर्षा होने से कीड़े मकोड़े वा अग्नि
दग्ध के कारण बिगड़ा हुआ बीज अकुरित नही होता अर्थात्
सड़ा गला घुना बीज बोने से पौधा नहीं जमता इसी प्रकार
मनुष्य का बिगड़ा हुआ वीर्य भी सन्तान उत्पन्न करने के योग्य
नही रहता ।

४१० आनन्द मन्दिर
वीर्य के दूषित होने का कारण
आयुर्वेद बतलाता है:-
अतिव्यवायाद्व्यायामादसात्म्यानां च सेवनात् ।
अकाले चाप्ययोनौ वा मैथुनं न च गच्छतः ॥
अर्थात्-अति शारीरिक परिश्रम और प्रकृति के विरुद्ध
पदार्थों का सेवन करना, कुसमय मैथुन करना व अयोन मे
मैथुन करना तथा अगम्या योनि से मैथुन करना । रुखे, कसैले,
तीक्ष्ण, खट्टे, चरपरे, राई, मिर्चा, सिरका आदि पदार्थों का अत्यन्त
सेवन करना अत्यन्त गरम नमकीन पदार्थों का सेवन अत्यन्त मीठे,
भारी, चिकने अन्न का सेवन करना। हानिकारी पदार्थों का सेवन
करना। वृद्धावस्था, चिन्ता शोक और प्रकाश स्थान में स्त्री गमन
करना और शिश्नेन्द्रिय तथा उसके समीप वाली नसों पर शस्त्र
कर्म, अग्नि दाह और क्षार कर्म का अनुचित विधि से होना,
भय क्रोध व्यभिचार, मल मूत्र वेगो का रोकना, धातु की
क्षीणता तथा सप्त धातुओं का दूषित होना इन कारणों से सम्पूर्ण
दोष अलग अलग अथवा सब एक साथ मिलकर वीर्य वाली
नलियों मे पहुंच कर वीर्य को शीघ्र ही दूषित कर देते हैं ।
जिसके कारण पुरुषो को अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न हो
जाते हैं और वीर्य क्षीणता तथा नपुसकता उत्पन्न होती है
और अनेक भयंकर रोग उत्पन्न होकर जीवन लीला दुःखमय

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४३१

बना देते हैं। ऊपर लिखे कारणों से पुरुष के जितने रोग हैं सभी
उत्पन्न होते हैं ।
चेतसोवातिहर्षेण व्यवायं सेवते तु यः ।
शुक्लं तु क्षीयते तस्य ततः प्राप्नोति संक्षयम् ॥
घोरां व्याधिमवाप्नोति मरणं वा स ऋच्छति ।
शुक्रं तस्माद्विशेषेण रक्ष्यमारोग्यमिच्छता ॥
एतन्निदानलिङ्गाभ्यामुक्तं क्लैव्यं चतुर्विधम् ।
अर्थात्—जो मनुष्य चित्तकी हर्षता से अत्यन्त मैथुन में
प्रवृत्त होता है अर्थात् अधिक स्त्री प्रसग करता है उसका वीर्य
अधिकता से क्षीण होजाता है और क्षयरोग उत्पन्न होजाता है
अथवा और भी घोर व्याधियो के होने के कारण वह पुरुष मृत्यु
के मुख मे प्रवेश करता है । इसलिये जो पुरुष वा स्त्री आरोग्यता
की इच्छा रखते हों उनको अपने वीर्य की सावधानी से रक्षा
करनी योग्य है । प्रमाण से अधिक मौज मे आकर क्षणिक
आनन्द के लिये विषय वासना के वशीभूत होकर वीर्य का
सत्यानाश न करे। वीर्य के ही आश्रय मनुष्य का बल है और
बलके आश्रय शरीर का जीवन है ।
याद रखने की बात
पुरुषो के सब रोगो का निदान व चिकित्सा रोग दूर होने

Based on the image provided, here is the transcription of the page:

४३२ आनन्द मन्दिर
के उपाय व औषधियां जो पुरुष अपने रोगों को आपही समझ
कर घर पर ही सरलता से बहुत कम मूल्य मे अपने हाथों तय्यार
कर रोगों को दूर कर सकते हैं वे दूसरे भाग में विस्तार पूर्वक
लिखी जायगी, जो मेरी लाखो बार परीक्षा की हुई हैं । लाखों
पुरुष जिनमे आराम हो चुके है ।
अनुचित मैथुन से हानि
बहु मैथुन के सम्बन्ध मे शास्त्रों में लिखा है कि तरुण पुरुष
और स्त्री का जब विवाह हो तथा स्त्री रजोधर्म मे शुद्ध हो तो
पुरुष केवल गर्भाधान के लिये सम्भोग करे। जब गर्भ रहजाने के
चिन्ह मालूम हों तब प्रसंग करना बन्द करदे । जब तक बालक
उत्पन्न होकर माता का दूध पीना न छोड़ देवे तब तक पुन. प्रसंग
नही करना चाहिये ।
बहु मैथुन इस प्रकार बढ़ा हुआ है कि जिसका वर्णन करना
असम्भव है । मेरे पास प्रति दिन रोगी पुरुषो की अनेक चिट्ठियां
आया करती हैं । प्राय चिट्ठियों मे यह लिखा होता है कि विवाह
होने के समय से कई वर्ष तक मैंने विलाना

परपुरुषरता स्त्री को दण्ड । पृ० ५८९ ( सर्वाधिकार सुरक्षित )

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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४३३
पुरुष के साथ उसकी स्त्री की भी चिट्ठी आती है। स्त्री भी प्रदर
रोग तथा मासिकधर्म की खराबी से दुःखी है। पाठक पाठिकाओं
विचारिये तो सही लोग कैसी अज्ञानता करते हैं, अपने तथा स्त्री
के शरीर का किस प्रकार सत्यानाश कर रहे हैं। धिक्कार है इस
आनन्द को जिससे पति पत्नी दोनों रोगी और निर्बल हो जाते हैं
और फिर उसी आनन्द के लिये रोया और पछताया करते हैं।
स्त्रियों के पत्रों से मालूम होता है कि युवा पुरुष मासिक
धर्म्म के दिनों में तथा प्रसूतावस्था में भी मूर्खतावश प्रसंग करते
हैं, और स्त्री की आरोग्यता का कुछ भी ध्यान नहीं रखते । यह
कैसी अज्ञानता है और पत्नी के साथ कैसा अत्याचार है ।
कितनी ही युवती स्त्रियां मेरे देखने में आई हैं और प्रति
दिन आया करती हैं। वे अपने पति के रोगों की भी दुःखद कहानी
सुनाया करती हैं, जिसे सुनकर शोक होता है कि विषय की अज्ञा-
नता से कितने ही विवाहित जोड़ों का जीवन तबाह और बर-
बाद हो गया है और हो रहा है।
कोई कोई घमंडी लोग इस मूर्खता के कारण बहुमैथुन
करते हैं कि कहीं हमारी स्त्री यह ख्याल न कर बैठे कि
हमारे पति में बल नहीं है। वे बड़े मूर्ख हैं, यह नहीं जानते
कि स्त्री को केवल गर्भाधान के लिये ही, ऋतु-स्नान के बाद
उचित सम्भोग की प्रबल इच्छा होती है; यह प्राकृतिक नियम
है। जो पति अपनी पत्नी से ऐसा समझ कर कि अधिक प्रसंग
न करने से, कहीं स्त्री सुस्त न समझ ले, यह समझ कर शक्ति न
२८

४३४ आनन्द मन्दिर

रहते हुए भी अधिक प्रसंग करते हैं, महामूर्ख हैं। वे यह नहीं जानते कि जब बहुमैथुन के कारण हम बेकार हो जावेंगे, तो उस समय बिलकुल ही इच्छा पूरी न कर सकेंगे।

इसलिये नियमपूर्वक सभोग करना ही स्त्री पुरुष दोनों के लिये प्रसन्नता और आनन्द की बात है, क्योकि नियमपूर्वक सम्भोग करने से दाम्पत्य-प्रेम और विवाह का आनन्द भी मिलता है और सन्तान भी उत्तम और आरोग्य होती है। अधिक विषय से स्त्री पुरुष दोनो ही क्षय तपेदिक आदि भयंकर रोगों मे ग्रसित होजाते हैं। शरीर का सार वीर्य है। रुधिर की सौ बूंदों के समान वीर्य की एक बूंद होती है। यह ऐसा अनमोल रत्न है जिससे बहुमूल्य शरीर उत्पन्न होता है। इसे बरबाद करके शरीर का सत्यानाश मारना कैसी मूर्खता है।

आनन्द-वर्द्धक प्रसंग

जिस प्रसंग के पश्चात आनन्द आवे, शरीर मे स्फूर्ति हो, स्त्री पुरुष दोनो का चित्त प्रसन्न हो, और शरीर मे नूतन शक्ति ज्ञात हो, शरीर अधिक फुरतीला और परिश्रम करने योग्य मालूम हो, प्रसंग के बाद सुस्ती और उदासी न मालूम हो, बल्कि थोड़ी देरी मे शक्ति और इन्द्री मे उत्तेजना मालूम हो, तो यह समझना चाहिये कि सम्भोग स्वास्थ्य के नियमानुसार हुआ है। स्त्री पुरुष दोनो मे यह बाते मालूम होनी चाहिये।

यदि सम्भोग के पीछे थकान और शिर का भारीपन अनुभव

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४३५

हो तो जान लेना चाहिये कि विना जरूरत के ही प्रसंग किया गया
है। पाठक विचार कर देखे कि कितने पुरुष ऐसे हैं जो इस
नियम का पालन करते हैं ? बहुत कम होगे । इसी कारण सैकड़ा
पीछे निन्नानवे स्त्री-पुरुषों को औषधियां सेवन करने की आव-
श्यकता होती है ।
उचित प्रसंग का दूसरा लक्षण यह भी है कि जब तक
सच्ची रुचि न हो, तब तक प्रसंग न करे। सच्ची रुचि वह है जो
विना स्त्री के साथ हंसे बोले और चित्त को विगाड़ने वाले अन्य
साधनों के बिना ही हृदय मे उत्साह और सम्भोग की इच्छा
उत्पन्न हो और सम्भोग करने के लिये व्याकुल कर दे ।
शास्त्र बतलाता है कि उत्तेजना कई कारणों से—प्रायः
कमजोरी से भी हुआ करती है। अज्ञानी पुरुष उस झूठी उत्ते-
जना को ही सच्ची उत्तेजना समझकर वीर्य का सत्यानाश कर
अपने चित्त की शान्ति करते हैं। वह झूठी उत्तेजना कमजोरी,
ज्यादः सुस्ती और अधिक उदासी प्रकट करती है ।
जब कि सम्भोग के पीछे सुस्ती और कमजोरी मालूम हो,
शिर में कुछ दर्द मालूम हो, तब वह निर्बलता का कारण है और
उसे बेजा विषयभोग समझना चाहिये । ऊपर लिखे विषय पर
विचार करने और ध्यान देने से पाठको को मालूम होगा कि
सैकड़ा पीछे निन्नानवे पुरुष विना सच्ची इच्छा के ही सम्भोग
करके अनेक प्रकार के रोगो मे ग्रसित हो रहे हैं।
मेरे पास प्रति दिन बीसो चिट्ठियां और ऐसे रोगी पुरुषो की

४३६ आनन्द मन्दिर
स्त्रियां स्वयं अपनी और पति की चिकित्सा के लिये आया
करती हैं इससे इस बात का मुझे पचीस वर्ष का अनुभव है कि
अनियम विषय से ही सैकड़ा पीछे निन्यानवे स्त्रियां और इतने
ही पुरुष रोगी हो रहे हैं और इसी कारण हमारे देश
के बालको की रोगी तथा मृत्यु-संख्या अन्य सब देशो से
अधिक है।
बाल-विवाह
बाल-विवाह के कारण पति पत्नी का रोगी
होना ; रोगी माता पिता से रोगी और अल्पायु
सन्तान उत्पन्न होना ।
हमारे देश में बाल-विवाह और बेमेल विवाह भी स्त्री-पुरुषों
में रोगो की उत्पत्ति और सन्तान के रोगी होने का दूसरा
कारण है।
अनेक उपाय और उद्योग करने पर भी यह अज्ञानता देश
से दूर नहीं होती। मुझे इस विषय में २५ पचीस वर्ष का अनुभव
है, क्योकि मेरे पास अब तक लाखो स्त्रिया इलाज के लिये आईं।
पता लगाने से मालूम हुआ है कि इनमे बहुत से स्त्री-पुरुष बाल
विवाह के कारण कम अवस्था मे ही रतिक्रिया का आरम्भ
करके रोगी होगये हैं, इसी कारण सन्तान भी रोगी और
निर्बल तथा कम आयुवाली हो रही हैं।

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४३७
जिनका विवाह बाल्यावस्था में हुआ है या होगा वे सदैव
रोगी और निर्बल ही रहेगे और सन्तान भी रोगी और अल्पायु
होगी । इसका कोई इलाज नहीं, केवल एक उपाय है कि इस
प्रथा को एकदम बन्द करना चाहिये ।
जो माता-पिता अपने किसी सुख अथवा खुशी के लिये
सन्तान का कम अवस्था मे विवाह करते हैं, वे सन्तान के साथ
बडी भारी शत्रुता करते हैं और अपने कुलका आगे के लिये
सत्यानाश मारते हैं।
बेमेल विवाह
बेमेल विवाह कई प्रकार के होते हैं। एक तो वह बेमेल
विवाह हैं जिनका हाल पीछे लिखा गया है, जिनमे पति पत्नी की
प्रकृति न मिले अर्थात् पद्मिनी, चित्रणी, शंखिनी, हस्तिनी जाति
की स्त्रियों का विवाह उनके मेल के मृग, शशक, वृषभ, अश्व
आदि पुरुष के साथ न हो ।
इस प्रकार के मेल से स्त्री-पुरुषों के विवाह होना कठिन है,
क्योकि कामशास्त्र ने तो इन सब स्त्री पुरुषों के लक्षण बतलाये
हैं और आयुर्वेद मे सबकी प्रकृति बतलाई है तथा और भी
लक्षण बतलाये हैं; परन्तु यह सब लक्षण मिलाकर विवाह करने
मे बड़ी भारी कठिनाइयाँ हैं। इस प्रकार से मेल मिलाकर
विवाह करने की लोग परवाह न करेंगे, क्योकि जितना हो
सकता है और सरल है उसी को बहुतेरे लोग नहीं मान रहे हैं।

१३८ आनन्द मन्दिर

स्त्री-पुरुष की ठीक ठीक पहिचान वड़ी कठिन है, क्योंकि
लड़के वाले को इतना मौका कहा मिलता है कि वह पद्मिनी
चित्रणी शंखिनी आदि के लक्षण ठीक ठीक मिलाकर विवाह
करें। न लड़की वाले को ही पुरुष की पहिचान करने का मौका
मिलता है, इसी कारण जितना हो सकता है मिलाया जाता है।
अब इसकी भी प्रथा उठती जाती है। इसी कारण ठीक मेल
नहीं मिलता।
बाल विवाह रोकने के लिये शारदा एक्ट बन गया है, परन्तु
उसका भी कितना विरोध हुआ और उसके पास होजाने पर भी
लोग परवाह नहीं कर रहे है। जैसा चाहिये वैसा प्रभाव शारदा
एक्ट का जनता पर नही पड़ा। जितना असर हुआ भी, वह नहीं
के बराबर है। फिर भला वैद्यकशास्त्र को कौन मानने लगा।
दूसरा बेमेल विवाह वह है जिसमें लड़का छोटा और
लड़की बड़ी होती है। यह विवाह बड़ा ही हानिकारक और
भयंकर परिणाम वाला होता है।
बेमेल विवाहका भयंकर परिणाम
पचीस वर्ष से मैं बराबर देख रही हूँ; मेरे पास अनेक
स्त्रियां इलाज के लिये ऐसी आईं और आया करती हैं कि जिनके
पति की अवस्था चौदह पन्द्रह वर्ष की है और पत्नी की पचीस
तीस वर्ष की है। उनका विवाह जब पति की अवस्था दस ग्यारह
वर्ष की थी तभी होगया था। इसी प्रकार के अनेक बेमेल विवाह

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४३६
होते हैं। ऐसी रोगी स्त्रियों की माताएं जब मेरे पास रोगी को
लेकर आती हैं तो मैं उन स्त्रियों से पति का भी हाल पूछती हूं।
मैने स्त्रियो और पुरुषो दोनो के रोगों की परीक्षा का आयुर्वेद के
अनुसार एक फार्म तैय्यार किया है। वह फार्म हर एक स्त्री के
पति से भराया करती हू क्योकि जो रोग पति के कारण स्त्री
को होते हैं उनका, विना पति का पूरा हाल मालूम किये, ठीक
इलाज नही होसकता ।
सन्तानहीन स्त्रियों का शर्तिया इलाज
सन्तानहीन स्त्रियों का शर्तिया इलाज विना पति का पूरा
हाल मालूम किये नही होसकता क्योकिं:—मान लीजिये किसी
के पति को गरमी या सुजाक है। उसी से स्त्री को भी गरमी सुजाक
होगया है, तो स्त्री का इलाज करके मै स्त्री को आराम कर दूंगी
परन्तु यह रोग स्त्री को पति से मिला है और पति के वह रोग
मौजूद है। उस के समागम से स्त्री को फिर रोग होजावेगा
और रोगी के घर वाले और रोगी स्त्री कहेगी कि कैसा इलाज
किया कि रोग फिर से होगया।
अथवा किसी का पति नपुंसक है। जिससे वह प्रसंग
ठीक नही कर सकता। पति तो किसी योग्य नहीं है, गर्भ
कैसे रहेगा ? पति की नपुंसकता के कारण स्त्री को अनेक रोग
उत्पन्न होजाते हैं, स्त्री के उन रोगो को मैं दूर तो कर दूंगी
परन्तु वह थोड़े ही दिनों मे फिर से होजावेगे। कई रोग ऐसे भी

१४० आनन्द मन्दिर
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हैं, जो बिना पति के भली भांति प्रसग किये हुए स्त्री के शरीर से
दूर हो ही नहीं सकते ।
स्त्रियो के कई रोग ऐसे हैं जो नियमानुसार रति क्रिया होने
से ही दूर होते हैं। स्त्रियो के बहुत से रोग ऐसे भी हैं जो पुरुष के
शीघ्रपात व सुस्ती और इन्द्री की कमजोरी के कारण उचित रीति
से स्त्री-प्रसंग न होने से स्त्री को होजाते है । ऊपर लिखे अनेक
कारणो से स्त्री को गर्भ नहीं रहता इस लिये रोगी स्त्री के पति
का भी पूरा हाल जानने की अत्यन्त आवश्यकता होती है ।
पति पत्नी दोनो का हाल मालूम करके जिसमे जो रोग
हुआ वह दूर कर दिया जाता है। तब सन्तान होने लगती
है और रोग भी सदैव के लिये दूर होजाते हैं। इस प्रकार
रोगी स्त्रियो के पतियो के रोगी फार्म देखने से मुझे इस बात
का २५ पचीस वर्ष का अनुभव है कि ऐसे बेमेल विवाह की
रोगी स्त्रियो की भी सख्या कम नहीं है। जब मैं ऐसी रोगी स्त्रियो
के पति का फार्म देखती हू तो उनमे भी अनेक रोग पाती हू ।
मै रोगी स्त्री के साथ आई हुई माता या सास से पूछती हूं कि
तुमने यह मुर्खता क्यो की कि लड़की का बेजोड़ विवाह कर
दिया। लड़के से लड़की दूनी या ड्योढ़ी या सवाई है, इसी कारण
यह दोनो रोगी हो रहे हैं और जिन्दगी भर रोगी रहेगे ।
तब उस रोगी स्त्री की सास या माता कहती हैं कि हमने
देखा नही, रिश्तेदारो ने विवाह करा दिया। रोगी स्त्री की सास
साथ मे हुई तो वह कहती है कि हमलोग क्या जाने इसके मां

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र १४१
बाप ने कहा कि लड़की ऊंचे कद की है। उम्र अभी लड़के से
बहुत कम है। यही बात विवाह ठीक कराने वाले रिश्तेदारों ने
भी कही, हम लोगो ने लडकी देखी नही क्योंकि लड़की दिखलाने
की प्रथा अभी कम है। विश्वास ही पर विवाह कर लिया।
यदि रोगी स्त्री की माता साथ में हुई तो वह कहती है कि
क्या करें ? लड़की की बात ठहरी लड़का कहीं मिलता नहीं था
इस लिये कर दिया। कहीं लड़की लड़के से छोटी होती है, कहीं
लड़का छोटा होता है इसमे क्या हर्ज होगया ? तब मुझे उस
रोगी स्त्री की माता से खुलासा कहना पडता है कि तुम महामूर्ख
हो। प्राचीन समय से बड़ों ने जो रिवाज चलाई है कि लड़का
लड़की से ड्योढ़ा न हो तो कम से कम सवाया जरूर होना चाहिये
तब विवाह का मेल ठीक होता है। वे क्या हमलोगो की तरह
मूर्ख थे जो व्यर्थ को ऐसा रिवाज चलाते, अब देखो तुमने जैसी
मूर्खता लड़की के विवाह में की है उसीका यह फल है कि स्त्री
पुरुष दोनों रोगी होरहे हैं। इनकी सन्तान भी रोगी अल्पायु होगी
और यह दोनों जन्म भर रोवेंगे और तुम भी कष्ट उठाओगी;
तब वह जवाब देती है कि क्या जिन लड़कियों का विवाह बराबर
वाले लड़के या ज्यादा उम्र वाले लड़के से होता है, वे लोग
बीमार नहीं पड़ते ? इस प्रकार उस रोगी स्त्री की माता या
सास जो साथ में हुई मुझसे हुज्जत करने लगती हैं।
पतिकी अवस्था कम होने का परिणाम
यह बात किसी को मालूम नही है कि लड़की से लड़के की

४४२ आनन्द मन्दिर
अवस्था कम होने से विवाह में आगे चलकर कितना बुरा परिणाम
होता है। यदि इस बात को सब मनुष्य भली भांति जान जाये
तो कदाचित यह मूर्खता दूर होने मे कुछ सहायता मिले, इसलिये
मैं संकोच छोड़कर इस विषय को आयुर्वेद के आधार पर
दाम्पत्य प्रेम-विज्ञान के अनुसार विस्तार पूर्वक लिखती हूँ। पाठक
पाठिकाए ध्यान से पढे और इस पर विचार करे। विचार ही
नहीं, इस दुष्ट प्रथा को बन्द करें और नीचे लिखे अनुसार
अवस्था देखकर खूब सोच समझ कर और देख-सुनकर लड़की
लड़के का विवाह करे।
मै तो यह कहूंगी कि जो बाल विवाह करते हैं और जो बे-
मेल विवाह करते है दोनों महा अज्ञान हैं, अथवा शास्त्रकारों के
उद्देश्य को समझने मे उन्होने भूल की है। मुझे २५ पचीस वर्ष
का इस विषय मे लाखो स्त्रियों की चिकित्सा करके पूरा अनुभव
हुआ है कि बाल विवाह और बेमेल विवाह से ही पुरुषों में
रोगो की अधिकता और बच्चो की रोगी तथा मृत्यु-संख्या अधिक
देखी जाती है। मुझे जो कुछ अनुभव इतने वर्षों मे रोगी
स्त्रियो को देखकर तथा उनकी जबानी मालूम होने से हुआ है
उसे मै सब के हितके लिये लिखती हूँ।
आयुर्वेद बतलाता है:—
पूर्णषोडशवर्षा स्त्री पूर्ण विंशेन संगता ।
शुद्धेगर्भाशये मार्गे रक्ते शुक्रेऽनिलेहृदि ॥

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४४३
वीर्य्यवंतं सुतं सूते ततोन्यूनाद्वयोःपुनः ।
रोग्यल्पायुरधन्यो वा गर्भेस्रवति नैव वा ॥
इसका अर्थ यह है कि गर्भाशय, योनि, स्त्री का रज और
पुरुष का वीर्य शुद्ध निर्मल हो, किसी प्रकार का दोष न हो
वातादि से दूषित न हो, वायु भी शुद्ध हो, अर्थात् पित्तादि से दूषित
न हो ऐसी अवस्था मे जब स्त्री पूरी सोलह वर्ष की हो जावे और
पुरुष बीस वर्ष का हो जावे तब स्त्री-पुरुष के समागम से वीर्यवान
बालक का जन्म होता है। इससे कम अवस्था वाले पति पत्नी के
समागम से जो सन्तान उत्पन्न होती है वह रोगी अल्पायु और
भाग्यहीन होती है और प्राय सन्तान नहीं भी होती ।
इस कारण किसी किसी शास्त्रकार का मत है कि सोलह
वर्ष की स्त्री और पचीस वर्ष का पुरुष हो, तब गर्भाधान होने से
आरोग्य और बलिष्ठ सन्तान उत्पन्न होती है। परन्तु पचीस वर्ष
तक लड़के का विवाह न करना यह माता पिता को अखरता
है। माता पिता जहां तक हो लड़कपन में ही विवाह करके शीघ्रही
पतोहू की सेवा का फल चखना चाहते हैं और नाती खिलाने की
बडी भारी अभिलाषा रखते हैं, परन्तु माता पिता को इस मूर्खता
का फल भी वैसा ही मिलता है। बहुत कम पतोहू ऐसी मिलती
हैं जो सास ससुर की सेवा करके उनको प्रसन्न रक्खे, और
आरोग्य सन्तान उत्पन्न करे और सास ससुर नाती देखकर प्रसन्न
हों। एक तो बाल्यावस्था में विवाह होने से गर्भ ही नही रहता

४४४ आनन्द मन्दिर

यदि सन्तान हुई भी तो गर्भस्राव व गर्भपात का रोग लग जाता है
और लड़का पतोहू भी रोगी हो जाते हैं। इसका पता अभी किसी
को नहीं है, इसीलिये बाल्यावस्था में विवाह कर देने के बुरे परि-
णाम का पता नहीं है।
बीस वर्ष की अवस्था लड़के के विवाह के लिये जिन शास्त्र-
कारो ने कही है वह भी ठीक है, यदि पच्चीस वर्ष की अवस्था
तक न रहा जाय तो बीस वर्ष की अवस्था में सोलह वर्ष की
लडकी से विवाह करने से मेलका विवाह होगा।
आजकल कुसंगति के कारण तथा अनेक प्रकार के स्त्री
पुरुष के प्रेम सम्बन्धी उपन्यासो की शिक्षा के बुरे प्रभाव में
पड़कर लड़के लड़कियाँ बचपन में ही विवाह के उत्सुक होजाते
हैं, इस कारण समय देखकर माता पिता को भी विवाह करने
की जल्दी पड़जाती है, इसलिये सचमे जरूरी अब यह बात
रहगई है कि पति पत्नी स्वयं अपनी आरोग्यता और आरोग्य
सन्तान उत्पन्न करने के लिये नियम पूर्वक रति-क्रिया करके उत्तम
सन्तान उत्पन्न करे।
माता पिता को चाहिये कि लड़की का विवाह लड़के की
अवस्था देखकर करे। ड्योढी अवस्था न हो तो सवाई अवश्य होनी
चाहिये। जिस अवस्था में विवाह करने का शारदा एक्ट बना है यह
बहुत उचित है, यद्यपि शास्त्रकारों के मत से यह भी अवस्था छोटी
है परन्तु समय के देखते हुए ठीक ही समझना चाहिये। चौदह वर्ष
की लड़की और १८ अट्ठारह वर्ष का लड़का—लड़की से सवाई

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४४५

अवस्था वाला हुआ, इस प्रकार यदि चौदह वर्ष की लड़की का
विवाह अठारह वर्ष के लड़के से होकर दो वर्ष बाद गौना किया
जावे तो आयुर्वेद के उन ऋषियो की राय ठीक मिल जावेगी
जिन्होने उत्तम सन्तान उत्पन्न करने के लिये सोलह वर्ष की स्त्री
और बीस वर्ष का पुरुष योग्य बतलाया है। किसी की राय
मे २५ वर्ष का लड़का और १६ की लडकी, और किसी की राय
मे १६ की लड़की और बीस वर्ष का लड़का ठीक होता है।
जितने विवाह बड़ी लड़की और छोटा लड़का ऐसे हो गये
हैं उनके सुधार का तो कोई उपाय नही। सम्भव है मूर्ख
माता पिता को इस प्रकार के भयंकर परिणामो का पता न हो
क्योकि आज तक इस विषय की कोई पुस्तक नही बनी, न कोई
चर्चा ही इस विषय की है कि बेमेल विवाह का क्या परिणाम
होता है। मुझे तो इसका परिणाम इसलिये मालूम है कि मेरे
पास पचीस वर्षों मे लाखो स्त्रियां अनेक प्रकार के रोगों वाली
इलाज के लिये आईं। इनमें हजारों इस प्रकार के बेमेल विवाह
की भी थी जिनके पति की अवस्था पत्नी की अवस्था से बहुत
कम और बहुत सी ऐसी स्त्रियां आईं जिनके पति बुड्ढे और
स्त्रियां पन्द्रह, सोलह, अठारह, या बीस वर्ष की थी। ऐसे विवाह
बहुत हानिकारक हैं।

रतिक्रिया के योग्य स्त्री की अवस्था

स्त्री की गर्भाधान के योग्य अवस्था सोलह वर्ष की है
अर्थात् स्त्री सोलह वर्ष की अवस्था मे बालिग होती है

४४६ आनन्द सान्दर
और पुरुष वीस वर्ष की अवस्था मे वालिग होता है यह
शास्त्रकारो का मत है; परन्तु अव समय के अनुसार चौदह
वर्ष की स्त्री और अठारह वर्ष का पुरुष वालिग समझा
जाता है। यदि पति की अवस्था कम हुई और स्त्री की अधिक
तो वह प्रसंग ठीक नही कर सकता क्योंकि जव तक उसकी
अवस्था प्रसंग के योग्य होगी तव तक स्त्री की अवस्था और भी
अधिक हो जावेगी।
मेरे पास वनारस से एक स्त्री इलाज के लिये आई जिसकी
अवस्था २७ सत्ताईस दर्प की थी। उसे हिस्टीरिया (मूर्छा) रोग
था। देखने मे वह बहुत हृष्ट पुष्ट और सव प्रकार से आरोग्य
थी। साथ में उसकी सास आई थी। मैंने उसे देखते ही कहा तुम्हें
तो कोई रोग नहीं मालूम होता, तुम तो अच्छी खासी हो। तव
उसकी सास ने कहा कि मै इसे इसलिये लाई हूं कि विवाह हुए
तीन वर्ष हुए, अभी तक कोई वचा नहीं हुआ और न कभी गर्भ
ही रहा और इसे वेहोशी हो जाती है, सो इसे देखिये कि क्या
खरावी है मैंने उसकी नाड़ी देखी कोई रोग नहीं था। नाड़ी से
कोई रोग हो तो पता लगे तव मैं उसे एकान्त मे जहां स्त्रियो के
गुप्त रोगो की परीक्षा करती हू, ले गई। परीक्षा करने से भी किसी
प्रकार का कोई गुप्त रोग न पाया, तव मैने उस स्त्री से कहा
कि तुम्हें कोई रोग नहीं है; तुम यह वताओ और सव सच्चा हाल
कहो तुम्हारे पति मे तो कोई खरावी नही है। तुम तो निरोग हो
परन्तु तुम्हारे पति मे खरावी मालूम होती है। तव उस स्त्री ने