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विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha

विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा

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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४४३
वीर्य्यवंतं सुतं सूते ततोन्यूनाद्वयोःपुनः ।
रोग्यल्पायुरधन्यो वा गर्भेस्रवति नैव वा ॥
इसका अर्थ यह है कि गर्भाशय, योनि, स्त्री का रज और
पुरुष का वीर्य शुद्ध निर्मल हो, किसी प्रकार का दोष न हो
वातादि से दूषित न हो, वायु भी शुद्ध हो, अर्थात् पित्तादि से दूषित
न हो ऐसी अवस्था मे जब स्त्री पूरी सोलह वर्ष की हो जावे और
पुरुष बीस वर्ष का हो जावे तब स्त्री-पुरुष के समागम से वीर्यवान
बालक का जन्म होता है। इससे कम अवस्था वाले पति पत्नी के
समागम से जो सन्तान उत्पन्न होती है वह रोगी अल्पायु और
भाग्यहीन होती है और प्राय सन्तान नहीं भी होती ।
इस कारण किसी किसी शास्त्रकार का मत है कि सोलह
वर्ष की स्त्री और पचीस वर्ष का पुरुष हो, तब गर्भाधान होने से
आरोग्य और बलिष्ठ सन्तान उत्पन्न होती है। परन्तु पचीस वर्ष
तक लड़के का विवाह न करना यह माता पिता को अखरता
है। माता पिता जहां तक हो लड़कपन में ही विवाह करके शीघ्रही
पतोहू की सेवा का फल चखना चाहते हैं और नाती खिलाने की
बडी भारी अभिलाषा रखते हैं, परन्तु माता पिता को इस मूर्खता
का फल भी वैसा ही मिलता है। बहुत कम पतोहू ऐसी मिलती
हैं जो सास ससुर की सेवा करके उनको प्रसन्न रक्खे, और
आरोग्य सन्तान उत्पन्न करे और सास ससुर नाती देखकर प्रसन्न
हों। एक तो बाल्यावस्था में विवाह होने से गर्भ ही नही रहता