विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
४२२ आनन्द मन्दिर
निकल सकता तब काटकर निकाला जाता है। यदि काटकर निका-
लने का मौका न मिला या उस समय कोई योग्य चिकित्सक न मिला
तो वह स्त्री मरजाती है। बालक योनि मे आकर फंस जाता है।
इसी कारण गर्भवती के साथ मैथुन करना ऋषियों ने मना
किया है। इससे गर्भ और गर्भवती दोनो को शारीरिक हानि
पहुँचती है। अनेक स्त्रियो की यह दशा होते लोगो ने देखी होगी
परन्तु फिर भी वाज नही आते ।
मेरे पास गर्भस्राव व गर्भपात और अन्य शिकायतो वाली
सैकड़ों स्त्रियां आया करती हैं। इन सबका कारण गर्भवती के
साथ रतिक्रिया करना पाया गया और अधिक प्रसंग करना
तथा विपरीत आसन से सभोग करना यह तो बहुत अधिक
स्त्रियो मे पाया जाता है, क्योकि जितनी स्त्रिया मेरे पास इलाज
के लिये आया करती हैं वे अपने पति का कुल हाल, अधिक
विषय तथा अनियम और विपरीत विषय का ही कहा करती हैं।
पुरुषों की इस अज्ञानता और कामान्धता ने स्त्रियो का
जीवन दुःखमय बना दिया है। पुरुष रोगी पत्नी पर भी दया
नही करते यह कितनी बड़ी अज्ञानता है।
शुष्का योनि
व्यवायकाले रुन्धन्त्या वेगात् प्रकुपितोऽनिलः ।
कुर्याद्विरामूत्रसङ्गार्त्तिं शोषं योनि मुखस्यतु ॥
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४२३
अर्थात्—मैथुन के समय जब स्त्री मल मूत्रों के वेगों को रोक
लेती है तब वायु कुपित होकर विष्टा और मूत्र को रोक कर योनि
को खुश्क कर देती है अर्थात् दिशा और पेशाब की गरमी जो
रोकने से पैदा होती है उस गरमी से योनि में खुश्की पैदा होती
है, इसलिये ऐसी योनि को शुष्का कहते हैं।
यह रोग एक ही बार ऐसी मूर्खता करने से उत्पन्न होजाता
है, जिसके कारण उस स्त्री की योनि में अनेक प्रकार की व्याधियां
उत्पन्न होजाती है। ऐसी रोगों वाली जितनी स्त्रियां मेरे पास आईं
उन सब से जब मैंने पूछा कि कभी ऐसा तो नहीं हुआ कि तुम
को दिशा पेशाब लगी हो, ऐसी दशा में प्रसंग किया हो, तब उन
सब ने यह स्वीकार किया और अपने पति की कामान्धता की
कहानी सुनाई। किसी ने कहा कि प्रातःकाल जब दिशा जाने का
समय होता है, प्रायः अनेक बार ऐसा हुआ और होता है कि
पति जाने नहीं देते और प्रसंग करते हैं। जिसके कारण कभी कभी
पेड़ू में पीड़ा होती है और दिशा पेशाब का रोकना कठिन होता
है। इस प्रकार का हाल ऐसे रोग वाली सभी स्त्रियां बतलाया
करती हैं।
इस कारण शास्त्रकारों ने प्रातः काल का मैथुन अत्यन्त
हानिकारक बतलाया है। स्त्री को ही नहीं, पुरुष भी यदि दिशा
पेशाब के वेगों को रोक कर प्रसंग करे तो उन्हें भी अनेक प्रकार
के रोग उत्पन्न होते हैं, जिनका वर्णन इस पुस्तक के दूसरे भाग में
विस्तार पूर्वक लिखूंगी।
४२४ आनन्द मन्दिर
वामिनी योनि
षड्रात्रात् सप्तरात्राद्वा शुक्रं गर्भाशयं गतम् ।
रुजं नीरुजं वापि या लवेत् साच वामिनी ॥
अर्थात्—जिस स्त्री की योनि से गर्भाशय में पहुंचा हुआ
वीर्य पीडा करके अथवा बिना पीडा के ही छै सात दिन के
भीतर ही गर्भाशय से निकल पडता है, उसे वामिनी योनि कहते
है । इस मे कभी गर्भ नही ठहरता । यह रोग भी विवाह होते ही
अधिक प्रसंग से तथा विपरीत आसन से प्रसंग करने से गर्भाशय
खराब होजाने के कारण होता है ।
बन्ध्या योनि
बीज दोषात्तु गर्भस्था मारुतोपहताशयः ।
नृद्वेषिण्यस्तनी चैव षण्ढी स्यादनुपक्रमा ॥
अर्थात्—माता पिता के बीज दोष के कारण जिस कन्या
का गर्भाशय नष्ट हो जाता है । वह पुरुष समागम की कभी
इच्छा नही करती है और उसके स्तन भी नही होते । ऐसी स्त्री
षण्ढी या हिजड़ी कहलाती है । इसका इलाज धन्वन्तरी भी नहीं
कर सकते ।
क्योकि जिसके गर्भाशय ही न होगा उसके गर्भ ठहरेगा
कहा ? इसीलिये बन्ध्या का इलाज भी नही हो सकता ।
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४२५
महायोनि
विषमं दुःख शय्यायां मैथुनात् कुपितोऽनिलः ।
गर्भाशयस्य योन्यश्च मुखं विष्टम्भयेत् स्त्रियः ॥
असंवृतमुखा सार्तिरुच्छफेनास्रवाहिनी ।
मांसोत्सन्ना महायोनिः पर्य्यं वंक्षण शूलिनी ॥
इत्येतै लक्षणैः प्रोक्ता विंशतियोनिजा गदाः ॥
अर्थात्—विपरीत दुखदाई शय्या पर, विपरीत आसन से जो
स्त्री प्रसग किया जाता है उस से उस स्त्री की वायु कुपित होकर
गर्भाशय और योनि मुख को बिगाड़ देती है दूषित करके फैला
देती है । उसके गर्भाशय तथा योनि का मुख अधिक खुल जाता
है इसलिये योनि बड़ी हो जाती है, उससे झागदार रूखा पीड़ा
करता हुआ आर्त्तव निकला करता है। इस स्त्री के हड्डियों की सन्धि
अर्थात् जोड़ों मे और गर्भाशय तथा योनि मे प्राय. पीड़ा हुआ
करती है। यह महायोनि अर्थात् बड़ी योनि कहलाती है। जो
स्त्री के लिए अतिशय दुखदाई होती है।
ये ऊपर लिखे, अनेक प्रकार के योनि रोग स्त्रियो की अज्ञा-
नता और उनके पति की मदान्धता के कारण, अनियम आहार
विहार स्त्री प्रसंग आदि से उत्पन्न होते हैं, ऐसा आयुर्वेद मे ऋषियो
ने बतलाया है।
४३६ आनन्द मन्दिर
स्त्रियों की योनि के ये रोग सुश्रुत मे बतलाये हैं। सुश्रुत
आयुर्वेद का बड़ा भारी प्राचीन ग्रन्थ है। स्त्रियो के इन योनि
रोगो से और भी अनेक प्रकार के भयकर रोग उत्पन्न होजाते हैं
जिससे स्त्रियो का जीवन दुखमय बनजाता है और वे रोरोकर
जीवन व्यतीत कर कुसमय मे ही काल का कलेवा बनजाती हैं।
यदि स्त्रियो के पति अपनी पत्नियो पर दया दृष्टि दिखावे और
अधिक प्रसग से उन्हे बचाते रहे तथा स्वय बचते रहे तो स्त्रियों
की रोगी सख्या सैकड़ा पीछे निन्यानवे की जगह जो इस समय
देखी जाती है बहुत कम होजावे और भारत के बालक जो कुस-
मय मे ही काल का कलेवा बनजाते हैं जिसके कारण हमारे देश
के बालको की रोगी तथा मृत्यु सख्या अधिक सुनी जाती है
बहुत कम हो जावे।
योनि संकोचन
आयुर्वेद मे योनि संकोचन की अनेक औषधियां बतलाई हैं
वे औषधियां केवल ऊपर कहे गये महायोनि नामक रोग के लिये
हैं परन्तु मूर्ख अज्ञानी विषयी लोग प्राय उन औषधियो को विना
रोग के ही आरोग्य स्त्री की योनि सकोचन के काम मे केवल इस
लिये लाते हैं कि उन्होंने यह समझ रक्खा है कि जितनी ही
संकुचित योनि हो उतना ही आनन्द मिलेगा। इसलिये मूर्ख
विषयी पुरुष ऐसी औषधियो वाली पुस्तको की खोज मे रहा
करते हैं, यह देखकर पुस्तक बनाने वाले भी अपनी मूर्खता, पुस्तक
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४२७
बनाने में खर्च कर डालते हैं और इधर उधर से मनगढ़ंत प्रयोग
योनि संकोचन के अपनी पुस्तकों में लिखदेते हैं जिससे ऐसे
प्रयोगों से पुस्तक की बिक्री अधिक हो ।
वे पुस्तक बनाने वाले यह तो समझते ही नहीं कि किस
लिये यह प्रयोग काम में लाया जाना चाहिये। पुस्तक बनाने वालों
को स्वयं इस बात का ज्ञान नहीं है क्योंकि वे तो वैद्यक विषय में
बिल्कुल अज्ञान हैं। वे तो संग्रह करना जानते हैं, हानि लाभ का
उन्हें कुछ ज्ञान नहीं होता। किसी प्रकार पुस्तक बिके, यही ध्यान
रहता है।
उन पुस्तक बनाने वालों से अधिक अज्ञान वे हैं जो बिना
सोचे समझे ऐसे प्रयोगों को क्षणिक आनन्द के लिये काम में
लाकर अपना तथा अपनी प्यारी पत्नी का जीवन नष्ट करते हैं
क्योंकि बिना रोग के औषधियां काम में लाने से वे हानिकारक
होती हैं।
योनि संकोचन और पुरुष इन्द्री को बढ़ाने तथा स्थूल करने
वाली औषधियां बड़ी हानिकारक होती हैं। बिना रोग के भूल
कर भी काम में नहीं लानी चाहिये। जो पुरुष मूर्खता वश बिना
रोग के ही इन्द्री को बढ़ाने तथा स्थूल करने की औषधियां काम
में लाते हैं उनकी इन्द्री कुछ दिनों में बेकाम हो जाती है और
वे नपुंसक होजाते हैं।
जो पुरुष बिना जरूरत के ही स्तम्भन की औषधियों का
सेवन करते हैं उन्हें भी कुछ दिन बाद नपुंसकता आघेरती है फिर
४२८ आनन्द मन्दिर
वे रोया करते हैं और बिना स्तम्भन के जो कुछ आनन्द प्राप्त
करते थे वह भी हाथ से जाता रहता है फिर उनकी उसी कुत्ते
की सी दशा हो जाती है कि:—
आधी छोड़ एक को धावै, ऐसा डूबै थाह न पावै ।
इसलिये ऐसी पुस्तकों के प्रयोगों को जो बिना वैद्यक के
ज्ञान के बनाई गई हों काम में नहीं लाना चाहिये। मेरे पास
प्रतिदिन बीसों ऐसी स्त्री पुरुषों के पत्र आया करते हैं जो ऐसी
पुस्तकों के प्रयोगों से हानि उठा चुके हैं और उठा रहे हैं।
अनियम संभोग और पुरुष रोगों
की उत्पत्ति
अनियम और अधिक स्त्री प्रसंग से स्त्रियों को हानि पहुँचती
है। यही नहीं पुरुषों को अनियम स्त्री प्रसंग से बहुत अधिक हानि
पहुँचती है क्योंकि अनियम प्रसंग में स्त्री हिस्सा नहीं लिया
करती। इसका कारण यह है कि पुरुषों में अधिक संख्या ऐसे
पुरुषों की है जो शीघ्रपात व शिथिलता के कारण शीघ्र ही स्खलित
होजाते हैं। मेरे पास २५ पच्चीस वर्षों में लाखो रोगी पुरुषों की
चिट्ठियां और उनकी स्त्रियां पुरुषों की चिकित्सा के लिये आई
चिट्ठियां देखने से और स्त्रियों के द्वारा मालूम हुआ है कि
सैकड़ा पीछे निन्यानवे पुरुष शीघ्रपात स्वप्नदोष शिथिलता और
नपुंसकता से ग्रसित हैं इस कारण वे शीघ्र ही स्खलित होते हैं।
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४२६
हजारों स्त्रियो की जवानी यह बात सुनी गई कि पति जी
तो दो दो तीन तीन बार संभोग करते हैं परन्तु हमारी इच्छा
एक बार भी नही होती क्योंकि पति जी का हमारे पास आते ही
बातचीत करते ही करते वीर्य बहने लगता है, दो तीन घंटे मे
फिर प्रसग के लिये तैयार होते हैं फिर ऐसा ही होजाता है। हमारी
कभी इच्छा ही नहीं होती, हम महीनों तक पति के सग से कुछ
लाभ नहीं उठाती गर्भ कैसे रहे। इससे मालूम होता है जो पुरुष
अनियम प्रसंग करते हैं उनको बड़ी हानि पहुंचती है। स्त्रियो को
प्रसंग से तो उतनी नही पहुँचती परन्तु प्रसंग ठीक न होने
से उन्हें और भी अनेक रोग उत्पन्न होजाते हैं जिनका वर्णन
आगे कहूंगी। यहां इतना वर्णन करने से यह पता चल जायगा
कि अनेक कारणों से योनि मे भिन्न २ प्रकार की खराबियां
होती हैं। यहां केवल वीर्य सम्बन्धी पुरुष रोगों का-जो अनियम
प्रसंग से उत्पन्न होते हैं उनका वर्णन करती हूँ ।
तथा बीजमकालाम्बुकृमिकीटाग्नि दूषितम् ।
न विरोहति सन्तुष्टं तथा शुक्रं शरीरिणाम् ॥
अर्थात्—जैसे कुसमय वर्षा होने से कीड़े मकोड़े वा अग्नि
दग्ध के कारण बिगड़ा हुआ बीज अकुरित नही होता अर्थात्
सड़ा गला घुना बीज बोने से पौधा नहीं जमता इसी प्रकार
मनुष्य का बिगड़ा हुआ वीर्य भी सन्तान उत्पन्न करने के योग्य
नही रहता ।
४१० आनन्द मन्दिर
वीर्य के दूषित होने का कारण
आयुर्वेद बतलाता है:-
अतिव्यवायाद्व्यायामादसात्म्यानां च सेवनात् ।
अकाले चाप्ययोनौ वा मैथुनं न च गच्छतः ॥
अर्थात्-अति शारीरिक परिश्रम और प्रकृति के विरुद्ध
पदार्थों का सेवन करना, कुसमय मैथुन करना व अयोन मे
मैथुन करना तथा अगम्या योनि से मैथुन करना । रुखे, कसैले,
तीक्ष्ण, खट्टे, चरपरे, राई, मिर्चा, सिरका आदि पदार्थों का अत्यन्त
सेवन करना अत्यन्त गरम नमकीन पदार्थों का सेवन अत्यन्त मीठे,
भारी, चिकने अन्न का सेवन करना। हानिकारी पदार्थों का सेवन
करना। वृद्धावस्था, चिन्ता शोक और प्रकाश स्थान में स्त्री गमन
करना और शिश्नेन्द्रिय तथा उसके समीप वाली नसों पर शस्त्र
कर्म, अग्नि दाह और क्षार कर्म का अनुचित विधि से होना,
भय क्रोध व्यभिचार, मल मूत्र वेगो का रोकना, धातु की
क्षीणता तथा सप्त धातुओं का दूषित होना इन कारणों से सम्पूर्ण
दोष अलग अलग अथवा सब एक साथ मिलकर वीर्य वाली
नलियों मे पहुंच कर वीर्य को शीघ्र ही दूषित कर देते हैं ।
जिसके कारण पुरुषो को अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न हो
जाते हैं और वीर्य क्षीणता तथा नपुसकता उत्पन्न होती है
और अनेक भयंकर रोग उत्पन्न होकर जीवन लीला दुःखमय
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४३१
बना देते हैं। ऊपर लिखे कारणों से पुरुष के जितने रोग हैं सभी
उत्पन्न होते हैं ।
चेतसोवातिहर्षेण व्यवायं सेवते तु यः ।
शुक्लं तु क्षीयते तस्य ततः प्राप्नोति संक्षयम् ॥
घोरां व्याधिमवाप्नोति मरणं वा स ऋच्छति ।
शुक्रं तस्माद्विशेषेण रक्ष्यमारोग्यमिच्छता ॥
एतन्निदानलिङ्गाभ्यामुक्तं क्लैव्यं चतुर्विधम् ।
अर्थात्—जो मनुष्य चित्तकी हर्षता से अत्यन्त मैथुन में
प्रवृत्त होता है अर्थात् अधिक स्त्री प्रसग करता है उसका वीर्य
अधिकता से क्षीण होजाता है और क्षयरोग उत्पन्न होजाता है
अथवा और भी घोर व्याधियो के होने के कारण वह पुरुष मृत्यु
के मुख मे प्रवेश करता है । इसलिये जो पुरुष वा स्त्री आरोग्यता
की इच्छा रखते हों उनको अपने वीर्य की सावधानी से रक्षा
करनी योग्य है । प्रमाण से अधिक मौज मे आकर क्षणिक
आनन्द के लिये विषय वासना के वशीभूत होकर वीर्य का
सत्यानाश न करे। वीर्य के ही आश्रय मनुष्य का बल है और
बलके आश्रय शरीर का जीवन है ।
याद रखने की बात
पुरुषो के सब रोगो का निदान व चिकित्सा रोग दूर होने
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४३२ आनन्द मन्दिर
के उपाय व औषधियां जो पुरुष अपने रोगों को आपही समझ
कर घर पर ही सरलता से बहुत कम मूल्य मे अपने हाथों तय्यार
कर रोगों को दूर कर सकते हैं वे दूसरे भाग में विस्तार पूर्वक
लिखी जायगी, जो मेरी लाखो बार परीक्षा की हुई हैं । लाखों
पुरुष जिनमे आराम हो चुके है ।
अनुचित मैथुन से हानि
बहु मैथुन के सम्बन्ध मे शास्त्रों में लिखा है कि तरुण पुरुष
और स्त्री का जब विवाह हो तथा स्त्री रजोधर्म मे शुद्ध हो तो
पुरुष केवल गर्भाधान के लिये सम्भोग करे। जब गर्भ रहजाने के
चिन्ह मालूम हों तब प्रसंग करना बन्द करदे । जब तक बालक
उत्पन्न होकर माता का दूध पीना न छोड़ देवे तब तक पुन. प्रसंग
नही करना चाहिये ।
बहु मैथुन इस प्रकार बढ़ा हुआ है कि जिसका वर्णन करना
असम्भव है । मेरे पास प्रति दिन रोगी पुरुषो की अनेक चिट्ठियां
आया करती हैं । प्राय चिट्ठियों मे यह लिखा होता है कि विवाह
होने के समय से कई वर्ष तक मैंने विलाना
परपुरुषरता स्त्री को दण्ड । पृ० ५८९ ( सर्वाधिकार सुरक्षित )
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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४३३
पुरुष के साथ उसकी स्त्री की भी चिट्ठी आती है। स्त्री भी प्रदर
रोग तथा मासिकधर्म की खराबी से दुःखी है। पाठक पाठिकाओं
विचारिये तो सही लोग कैसी अज्ञानता करते हैं, अपने तथा स्त्री
के शरीर का किस प्रकार सत्यानाश कर रहे हैं। धिक्कार है इस
आनन्द को जिससे पति पत्नी दोनों रोगी और निर्बल हो जाते हैं
और फिर उसी आनन्द के लिये रोया और पछताया करते हैं।
स्त्रियों के पत्रों से मालूम होता है कि युवा पुरुष मासिक
धर्म्म के दिनों में तथा प्रसूतावस्था में भी मूर्खतावश प्रसंग करते
हैं, और स्त्री की आरोग्यता का कुछ भी ध्यान नहीं रखते । यह
कैसी अज्ञानता है और पत्नी के साथ कैसा अत्याचार है ।
कितनी ही युवती स्त्रियां मेरे देखने में आई हैं और प्रति
दिन आया करती हैं। वे अपने पति के रोगों की भी दुःखद कहानी
सुनाया करती हैं, जिसे सुनकर शोक होता है कि विषय की अज्ञा-
नता से कितने ही विवाहित जोड़ों का जीवन तबाह और बर-
बाद हो गया है और हो रहा है।
कोई कोई घमंडी लोग इस मूर्खता के कारण बहुमैथुन
करते हैं कि कहीं हमारी स्त्री यह ख्याल न कर बैठे कि
हमारे पति में बल नहीं है। वे बड़े मूर्ख हैं, यह नहीं जानते
कि स्त्री को केवल गर्भाधान के लिये ही, ऋतु-स्नान के बाद
उचित सम्भोग की प्रबल इच्छा होती है; यह प्राकृतिक नियम
है। जो पति अपनी पत्नी से ऐसा समझ कर कि अधिक प्रसंग
न करने से, कहीं स्त्री सुस्त न समझ ले, यह समझ कर शक्ति न
२८
४३४ आनन्द मन्दिर
रहते हुए भी अधिक प्रसंग करते हैं, महामूर्ख हैं। वे यह नहीं जानते कि जब बहुमैथुन के कारण हम बेकार हो जावेंगे, तो उस समय बिलकुल ही इच्छा पूरी न कर सकेंगे।
इसलिये नियमपूर्वक सभोग करना ही स्त्री पुरुष दोनों के लिये प्रसन्नता और आनन्द की बात है, क्योकि नियमपूर्वक सम्भोग करने से दाम्पत्य-प्रेम और विवाह का आनन्द भी मिलता है और सन्तान भी उत्तम और आरोग्य होती है। अधिक विषय से स्त्री पुरुष दोनो ही क्षय तपेदिक आदि भयंकर रोगों मे ग्रसित होजाते हैं। शरीर का सार वीर्य है। रुधिर की सौ बूंदों के समान वीर्य की एक बूंद होती है। यह ऐसा अनमोल रत्न है जिससे बहुमूल्य शरीर उत्पन्न होता है। इसे बरबाद करके शरीर का सत्यानाश मारना कैसी मूर्खता है।
आनन्द-वर्द्धक प्रसंग
जिस प्रसंग के पश्चात आनन्द आवे, शरीर मे स्फूर्ति हो, स्त्री पुरुष दोनो का चित्त प्रसन्न हो, और शरीर मे नूतन शक्ति ज्ञात हो, शरीर अधिक फुरतीला और परिश्रम करने योग्य मालूम हो, प्रसंग के बाद सुस्ती और उदासी न मालूम हो, बल्कि थोड़ी देरी मे शक्ति और इन्द्री मे उत्तेजना मालूम हो, तो यह समझना चाहिये कि सम्भोग स्वास्थ्य के नियमानुसार हुआ है। स्त्री पुरुष दोनो मे यह बाते मालूम होनी चाहिये।
यदि सम्भोग के पीछे थकान और शिर का भारीपन अनुभव
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४३५
हो तो जान लेना चाहिये कि विना जरूरत के ही प्रसंग किया गया
है। पाठक विचार कर देखे कि कितने पुरुष ऐसे हैं जो इस
नियम का पालन करते हैं ? बहुत कम होगे । इसी कारण सैकड़ा
पीछे निन्नानवे स्त्री-पुरुषों को औषधियां सेवन करने की आव-
श्यकता होती है ।
उचित प्रसंग का दूसरा लक्षण यह भी है कि जब तक
सच्ची रुचि न हो, तब तक प्रसंग न करे। सच्ची रुचि वह है जो
विना स्त्री के साथ हंसे बोले और चित्त को विगाड़ने वाले अन्य
साधनों के बिना ही हृदय मे उत्साह और सम्भोग की इच्छा
उत्पन्न हो और सम्भोग करने के लिये व्याकुल कर दे ।
शास्त्र बतलाता है कि उत्तेजना कई कारणों से—प्रायः
कमजोरी से भी हुआ करती है। अज्ञानी पुरुष उस झूठी उत्ते-
जना को ही सच्ची उत्तेजना समझकर वीर्य का सत्यानाश कर
अपने चित्त की शान्ति करते हैं। वह झूठी उत्तेजना कमजोरी,
ज्यादः सुस्ती और अधिक उदासी प्रकट करती है ।
जब कि सम्भोग के पीछे सुस्ती और कमजोरी मालूम हो,
शिर में कुछ दर्द मालूम हो, तब वह निर्बलता का कारण है और
उसे बेजा विषयभोग समझना चाहिये । ऊपर लिखे विषय पर
विचार करने और ध्यान देने से पाठको को मालूम होगा कि
सैकड़ा पीछे निन्नानवे पुरुष विना सच्ची इच्छा के ही सम्भोग
करके अनेक प्रकार के रोगो मे ग्रसित हो रहे हैं।
मेरे पास प्रति दिन बीसो चिट्ठियां और ऐसे रोगी पुरुषो की
४३६ आनन्द मन्दिर
स्त्रियां स्वयं अपनी और पति की चिकित्सा के लिये आया
करती हैं इससे इस बात का मुझे पचीस वर्ष का अनुभव है कि
अनियम विषय से ही सैकड़ा पीछे निन्यानवे स्त्रियां और इतने
ही पुरुष रोगी हो रहे हैं और इसी कारण हमारे देश
के बालको की रोगी तथा मृत्यु-संख्या अन्य सब देशो से
अधिक है।
बाल-विवाह
बाल-विवाह के कारण पति पत्नी का रोगी
होना ; रोगी माता पिता से रोगी और अल्पायु
सन्तान उत्पन्न होना ।
हमारे देश में बाल-विवाह और बेमेल विवाह भी स्त्री-पुरुषों
में रोगो की उत्पत्ति और सन्तान के रोगी होने का दूसरा
कारण है।
अनेक उपाय और उद्योग करने पर भी यह अज्ञानता देश
से दूर नहीं होती। मुझे इस विषय में २५ पचीस वर्ष का अनुभव
है, क्योकि मेरे पास अब तक लाखो स्त्रिया इलाज के लिये आईं।
पता लगाने से मालूम हुआ है कि इनमे बहुत से स्त्री-पुरुष बाल
विवाह के कारण कम अवस्था मे ही रतिक्रिया का आरम्भ
करके रोगी होगये हैं, इसी कारण सन्तान भी रोगी और
निर्बल तथा कम आयुवाली हो रही हैं।
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४३७
जिनका विवाह बाल्यावस्था में हुआ है या होगा वे सदैव
रोगी और निर्बल ही रहेगे और सन्तान भी रोगी और अल्पायु
होगी । इसका कोई इलाज नहीं, केवल एक उपाय है कि इस
प्रथा को एकदम बन्द करना चाहिये ।
जो माता-पिता अपने किसी सुख अथवा खुशी के लिये
सन्तान का कम अवस्था मे विवाह करते हैं, वे सन्तान के साथ
बडी भारी शत्रुता करते हैं और अपने कुलका आगे के लिये
सत्यानाश मारते हैं।
बेमेल विवाह
बेमेल विवाह कई प्रकार के होते हैं। एक तो वह बेमेल
विवाह हैं जिनका हाल पीछे लिखा गया है, जिनमे पति पत्नी की
प्रकृति न मिले अर्थात् पद्मिनी, चित्रणी, शंखिनी, हस्तिनी जाति
की स्त्रियों का विवाह उनके मेल के मृग, शशक, वृषभ, अश्व
आदि पुरुष के साथ न हो ।
इस प्रकार के मेल से स्त्री-पुरुषों के विवाह होना कठिन है,
क्योकि कामशास्त्र ने तो इन सब स्त्री पुरुषों के लक्षण बतलाये
हैं और आयुर्वेद मे सबकी प्रकृति बतलाई है तथा और भी
लक्षण बतलाये हैं; परन्तु यह सब लक्षण मिलाकर विवाह करने
मे बड़ी भारी कठिनाइयाँ हैं। इस प्रकार से मेल मिलाकर
विवाह करने की लोग परवाह न करेंगे, क्योकि जितना हो
सकता है और सरल है उसी को बहुतेरे लोग नहीं मान रहे हैं।
१३८ आनन्द मन्दिर
स्त्री-पुरुष की ठीक ठीक पहिचान वड़ी कठिन है, क्योंकि
लड़के वाले को इतना मौका कहा मिलता है कि वह पद्मिनी
चित्रणी शंखिनी आदि के लक्षण ठीक ठीक मिलाकर विवाह
करें। न लड़की वाले को ही पुरुष की पहिचान करने का मौका
मिलता है, इसी कारण जितना हो सकता है मिलाया जाता है।
अब इसकी भी प्रथा उठती जाती है। इसी कारण ठीक मेल
नहीं मिलता।
बाल विवाह रोकने के लिये शारदा एक्ट बन गया है, परन्तु
उसका भी कितना विरोध हुआ और उसके पास होजाने पर भी
लोग परवाह नहीं कर रहे है। जैसा चाहिये वैसा प्रभाव शारदा
एक्ट का जनता पर नही पड़ा। जितना असर हुआ भी, वह नहीं
के बराबर है। फिर भला वैद्यकशास्त्र को कौन मानने लगा।
दूसरा बेमेल विवाह वह है जिसमें लड़का छोटा और
लड़की बड़ी होती है। यह विवाह बड़ा ही हानिकारक और
भयंकर परिणाम वाला होता है।
बेमेल विवाहका भयंकर परिणाम
पचीस वर्ष से मैं बराबर देख रही हूँ; मेरे पास अनेक
स्त्रियां इलाज के लिये ऐसी आईं और आया करती हैं कि जिनके
पति की अवस्था चौदह पन्द्रह वर्ष की है और पत्नी की पचीस
तीस वर्ष की है। उनका विवाह जब पति की अवस्था दस ग्यारह
वर्ष की थी तभी होगया था। इसी प्रकार के अनेक बेमेल विवाह
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४३६
होते हैं। ऐसी रोगी स्त्रियों की माताएं जब मेरे पास रोगी को
लेकर आती हैं तो मैं उन स्त्रियों से पति का भी हाल पूछती हूं।
मैने स्त्रियो और पुरुषो दोनो के रोगों की परीक्षा का आयुर्वेद के
अनुसार एक फार्म तैय्यार किया है। वह फार्म हर एक स्त्री के
पति से भराया करती हू क्योकि जो रोग पति के कारण स्त्री
को होते हैं उनका, विना पति का पूरा हाल मालूम किये, ठीक
इलाज नही होसकता ।
सन्तानहीन स्त्रियों का शर्तिया इलाज
सन्तानहीन स्त्रियों का शर्तिया इलाज विना पति का पूरा
हाल मालूम किये नही होसकता क्योकिं:—मान लीजिये किसी
के पति को गरमी या सुजाक है। उसी से स्त्री को भी गरमी सुजाक
होगया है, तो स्त्री का इलाज करके मै स्त्री को आराम कर दूंगी
परन्तु यह रोग स्त्री को पति से मिला है और पति के वह रोग
मौजूद है। उस के समागम से स्त्री को फिर रोग होजावेगा
और रोगी के घर वाले और रोगी स्त्री कहेगी कि कैसा इलाज
किया कि रोग फिर से होगया।
अथवा किसी का पति नपुंसक है। जिससे वह प्रसंग
ठीक नही कर सकता। पति तो किसी योग्य नहीं है, गर्भ
कैसे रहेगा ? पति की नपुंसकता के कारण स्त्री को अनेक रोग
उत्पन्न होजाते हैं, स्त्री के उन रोगो को मैं दूर तो कर दूंगी
परन्तु वह थोड़े ही दिनों मे फिर से होजावेगे। कई रोग ऐसे भी