विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२४ आनन्द मन्दिर
वामिनी योनि
षड्रात्रात् सप्तरात्राद्वा शुक्रं गर्भाशयं गतम् ।
रुजं नीरुजं वापि या लवेत् साच वामिनी ॥
अर्थात्—जिस स्त्री की योनि से गर्भाशय में पहुंचा हुआ
वीर्य पीडा करके अथवा बिना पीडा के ही छै सात दिन के
भीतर ही गर्भाशय से निकल पडता है, उसे वामिनी योनि कहते
है । इस मे कभी गर्भ नही ठहरता । यह रोग भी विवाह होते ही
अधिक प्रसंग से तथा विपरीत आसन से प्रसंग करने से गर्भाशय
खराब होजाने के कारण होता है ।
बन्ध्या योनि
बीज दोषात्तु गर्भस्था मारुतोपहताशयः ।
नृद्वेषिण्यस्तनी चैव षण्ढी स्यादनुपक्रमा ॥
अर्थात्—माता पिता के बीज दोष के कारण जिस कन्या
का गर्भाशय नष्ट हो जाता है । वह पुरुष समागम की कभी
इच्छा नही करती है और उसके स्तन भी नही होते । ऐसी स्त्री
षण्ढी या हिजड़ी कहलाती है । इसका इलाज धन्वन्तरी भी नहीं
कर सकते ।
क्योकि जिसके गर्भाशय ही न होगा उसके गर्भ ठहरेगा
कहा ? इसीलिये बन्ध्या का इलाज भी नही हो सकता ।