विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविवाह विज्ञान-कामशास्त्र ४२३
अर्थात्—मैथुन के समय जब स्त्री मल मूत्रों के वेगों को रोक
लेती है तब वायु कुपित होकर विष्टा और मूत्र को रोक कर योनि
को खुश्क कर देती है अर्थात् दिशा और पेशाब की गरमी जो
रोकने से पैदा होती है उस गरमी से योनि में खुश्की पैदा होती
है, इसलिये ऐसी योनि को शुष्का कहते हैं।
यह रोग एक ही बार ऐसी मूर्खता करने से उत्पन्न होजाता
है, जिसके कारण उस स्त्री की योनि में अनेक प्रकार की व्याधियां
उत्पन्न होजाती है। ऐसी रोगों वाली जितनी स्त्रियां मेरे पास आईं
उन सब से जब मैंने पूछा कि कभी ऐसा तो नहीं हुआ कि तुम
को दिशा पेशाब लगी हो, ऐसी दशा में प्रसंग किया हो, तब उन
सब ने यह स्वीकार किया और अपने पति की कामान्धता की
कहानी सुनाई। किसी ने कहा कि प्रातःकाल जब दिशा जाने का
समय होता है, प्रायः अनेक बार ऐसा हुआ और होता है कि
पति जाने नहीं देते और प्रसंग करते हैं। जिसके कारण कभी कभी
पेड़ू में पीड़ा होती है और दिशा पेशाब का रोकना कठिन होता
है। इस प्रकार का हाल ऐसे रोग वाली सभी स्त्रियां बतलाया
करती हैं।
इस कारण शास्त्रकारों ने प्रातः काल का मैथुन अत्यन्त
हानिकारक बतलाया है। स्त्री को ही नहीं, पुरुष भी यदि दिशा
पेशाब के वेगों को रोक कर प्रसंग करे तो उन्हें भी अनेक प्रकार
के रोग उत्पन्न होते हैं, जिनका वर्णन इस पुस्तक के दूसरे भाग में
विस्तार पूर्वक लिखूंगी।