वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
२. साम्प्रयोगिक अधिकरण २९
सा पुनराभिमानिकेन सुखेन संसृष्टा रसान्तरं जनयति, तस्मिन् सुखबुद्धि-
रस्याः ॥ १२ ॥
पूर्वपक्ष की शंका का उत्तर—पुरुष के साथ समागम से उसकी खाज ही नहीं मिटती,
बल्कि आलिङ्गन, चुम्बन आदि सुखात्मक उपक्रियाओं से वह अनिर्वचनीय सुख भी प्राप्त करती
है, और यह अनुभव भी करती है कि मैं आनन्दित हूँ॥ १२ ॥
पुरुषप्रीतेश्चानभिज्ञत्वात् कथं ते सुखमिति प्रष्टुमशक्यत्वात् ॥ १३ ॥
श्वेतकेतु के मत पर शङ्का—जब पुरुष और स्त्री को एक दूसरे की सुखानुभूति का पता
ही नहीं चलता, और मानसिक आनन्द शब्दों का विषय न होने से पूछकर भी निश्चित नहीं किया
जा सकता, तब आपने यह कैसे जाना कि स्त्री की सुखानुभूति पुरुष की सुखानुभूति से
भिन्न है ? ॥ १३ ॥
कथमेतदुपलभ्यत इति चेत् ? पुरुषो हि रतिमधिगम्य स्वेच्छया विरमति, न
स्त्रियमपेक्षते, न त्वेवं स्त्रीत्यौद्दालकिः ॥ १४॥
श्वेतकेतु का समाधान—यदि 'आपने इस बात को कैसे जाना ?'—यह शंका करो तो
मेरे जानने का यही कारण है कि पुरुष स्खलन-सुख के पश्चात् समागम से स्वयं विरत हो जाता
है, फिर स्त्री की अपेक्षा नहीं करता, परन्तु स्त्रियों में ऐसा नहीं मिलता। इससे स्पष्ट होता है कि
उसे स्खलन-सुख प्राप्त नहीं होता—ऐसा उद्दालक-पुत्र श्वेतकेतु का मत है॥ १४ ॥
तन्नैतत्स्यात्। चिरवेगे नायके स्त्रियोऽनुरज्यन्ते, शीघ्रवेगस्य भावमना-
साद्यावसानेऽभ्यसूयिन्यो भवन्ति। तत्सर्वं भावप्राप्तेरप्राप्तेश्च लक्षणम्॥ १५ ॥
इस विषय में एक बात अवश्य है कि स्त्रियाँ चिरकाल तक समागम करने वाले पुरुषों से.
प्रेम करती हैं, और शीघ्र स्खलित होने वाले पुरुषों की, स्खलन-सुख न प्राप्त करने के कारण,
निन्दा करती हैं। यह सब स्खलन-सुख की प्राप्ति और अप्राप्ति का लक्षण है। अर्थात् जब स्त्रियाँ
पुरुषों से प्रेम करें, तभी समझना चाहिये कि उन्हें स्खलन-सुख प्राप्त हुआ है, अन्यथा
नहीं ॥ १५ ॥
तच्च न। कण्डूतिप्रतीकारोऽपि हि दीर्घकालं प्रिय इति। एतदुपपद्यत एव।
तस्मात् सन्दिग्धत्वादलक्षणमिति ॥ १६ ॥
श्वेतकेतु का उत्तर—अनुराग स्खलन-सुख का ज्ञापक नहीं है। देर तक समागम करने में
उसकी खाज देर तक मिटती है, जो उसे प्रिय है, फलतः वह पुरुष से अनुराग करेगी ही।
अनुराग खाज मिटने के कारण है, अथवा स्खलन-सुख प्राप्त होने के कारण?—यह सन्दिग्ध है,
इसलिए अनुराग को स्खलन-सुख का लक्षण मानना ठीक नहीं है॥ १६ ॥
संयोगे योषितः पुंसा कण्डूतिरपनुद्यते।
तच्चाभिमानसंसृष्टं सुखमित्यभिधीयते ॥ १७ ॥
श्वेतकेतु के मत का सारसंग्रह—इस सिद्धान्त को श्वेतकेतु एक श्लोक में कहते हैं—
पुरुषों के साथ मिलकर करने से स्त्रियों की खाज मिटती है, और आलिङ्गन, चुंबन, कुचमर्दन
आदि के साथ मिलकर यही अनिर्वचनीय सुख कहलाता है ॥ १७ ॥
३० वात्स्यायन-कामसूत्र
सातत्याद्युवतिरारम्भात्प्रभृति भावमधिगच्छति । पुरुषः पुनरन्त एव । एतदुप-
पन्नतरम्। नह्यसत्यां भावप्राप्तौ गर्भसम्भव इति बाभ्रवीयाः ॥ १८ ॥
बाभ्रव्य का मत—समागम में स्त्री प्रारम्भ से ही निरन्तर स्खलन-सुख को प्राप्त करती
रहती हैं और पुरुष स्खलन-सुख को अन्त में ही प्राप्त करता है। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि
स्खलन के बिना कदापि गर्भ स्थिर नहीं हो सकता—ऐसा आचार्य बाभ्रव्य के अनुयायियों का
मत है ॥ १८ ॥
अत्रापि तावेवाशङ्कापरिहारौ भूयः ॥ १९ ॥
पुरुषवत् स्खलन मानने वालों की शंका और समाधान—आचार्य बाभ्रव्य के मत में
भी वही शङ्काएँ उठती हैं जो आचार्य श्वेतकेतु के मत में उठायी गयी हैं, और उनका समाधान भी
पूर्ववत् ही समझ लेना चाहिये ॥ १९ ॥
तत्रैतत्स्यात्—सातत्येन रसप्राप्तावारम्भकाले मध्यस्थचित्तता नातिसहिष्णुता
च । ततः क्रमेणाधिको रागयोगः, शरीरे निरपेक्षत्वम्, अन्ते च विरामाभीप्सेत्ये-
तदुपपन्नमिति ॥ २० ॥
बाभ्रव्य के मत पर शङ्का—इस पर यह शङ्का होती है कि यदि स्त्री समागम के प्रारम्भ
से ही निरन्तर स्खलित होती रहती है, तो क्या कारण है कि प्रारम्भ में वह शान्त और निश्चेष्ट
रहती है, नखक्षत, दन्तक्षत, कुचमर्दन आदि प्रयोगों का निषेध करती है, परन्तु ज्यों ज्यों राग
बढ़ता जाता है, वह शरीर से निरपेक्ष होती है, अर्थात् रागाधिक्य में नखक्षत, दन्तक्षत, कुचमर्दन
आदि प्रयोगों के प्रति सहिष्णु हो जाती है, और अन्त में विराम की इच्छा करती है। यदि स्त्री
प्रारम्भ से अन्त तक निरन्तर स्खलित होती रहती है, तो यह अवस्था-भेद नहीं बन सकता
॥ २० ॥
तच्च न। सामान्येऽपि भ्रान्तिसंस्कारे कुलालचक्रस्य भ्रमरकस्य वा भ्रान्तावेव
वर्तमानस्य प्रारम्भे मन्दवेगता ततश्च क्रमेण पूर्णं वेगस्येत्युपपद्यते । धातुक्षयाच्च
विरामाभीप्सेति। तस्मादनाक्षेपः ॥ २१ ॥
बाभ्रव्य का समाधान—ऐसी शङ्का करना ठीक नहीं है। सामान्यतः घूमने वाले कुम्हार
के चाक (चक्र) या लट्टू (भ्रमरक) में घूमने की क्रिया निरन्तर विद्यमान रहने पर भी वे प्रारम्भ
में मन्दवेग से घूमते हैं। बाद में क्रमशः उनका बेग बढ़ता है, और अन्त में वेग बन्द हो जाता है।
इसी प्रकार स्त्री का स्खलन भी प्रारम्भ में मन्द रहता है, तदुपरान्त वह क्रमशः बढ़ता है, और
च्युत हुए रज के पूर्णतः झड़ जाने पर वह समागम से विराम चाहती है। इसमें शङ्का के लिये कोई
अवकाश नहीं है ॥ २१ ॥
सुरतान्ते सुखं पुंसां स्त्रीणां तु सततं सुखम्।
धातुक्षयनिमित्ता च विरामेच्छोपजायते ॥ २२ ॥
बाभ्रव्य का सार-संक्षेप—पुरुष को स्खलन-सुख समागम के अन्त में ही प्राप्त होता है
किन्तु स्त्रियों को वह सुखानुभूति प्रारम्भ से अन्त तक होती रहती है, और स्थान से च्युत हुए
सम्पूर्ण धातु (रज) के झड़ जाने पर समागम से विराम की इच्छा होती है ॥ २२ ॥
२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ३१
तस्मात् पुरुषवदेव योषितोऽपि रसव्यक्तिर्द्रष्टव्या ॥ २३ ॥
वात्स्यायन का मत—इससे यही समझना चाहिये कि पुरुष के समान स्त्री को भी
समागम के अन्त में सुखानुभूति (स्खलन-सुख) होती है ॥ २३ ॥
कथं हि समानायामेवाकृतावेकार्थमभिप्रपन्नयोः कार्यवैलक्षण्यं
स्यात् ? ॥ २४ ॥
स्त्री-पुरुष के सुख की अभिन्नता—समान जाति और समान कार्य में संलग्न स्त्री-
पुरुष का सुख परस्पर भिन्न कैसे हो सकता है ? अर्थात् दोनों का सुख परस्पर अभिन्न ही
होगा ? ॥ २४ ॥
उपायवैलक्षण्यादभिमानवैलक्षण्याच्च ॥ २५ ॥
उपाय (स्थिति) और अनुभूति में भिन्नता होने से सुखानुभूति में भिन्नता हो सकती
हैं ॥ २५ ॥
कथम् ? उपायवैलक्ष्यं तु सर्गात् । कर्ता हि पुरुषोऽधिकरणं युवतिः । अन्यथा
हि कर्ता क्रियां प्रतिपद्यतेऽन्यथा चाधारः । तस्माच्चोपायवैलक्षण्यात् सर्गाद-
भिमानवैलक्षण्यमपि भवति । अभियोक्ताहमिति पुरुषोऽनुरज्यते । अभियुक्ता-
हमनेनेति युवतैरिति वात्स्यायनः ॥ २६ ॥
सुखानुभूति की अभिन्नता की स्थापना—स्थिति की भिन्नता तो प्राकृतिक है। पुरुष
कर्ता (मैथुन करने वाला) है और स्त्री अधिकरण या आधार (मैथुन कराने वाली)। कर्ता की
क्रिया, आधार की क्रिया से सदैव भिन्न होती है, इसलिये स्थिति और अनुभूति की भिन्नता से
व्यापार में कुछ भिन्नता अवश्य आयेगी। समागम करते समय पुरुष सोचता है कि मैं सम्भोग कर
रहा हूँ, और स्त्री सोचती है कि मैं सम्भोग करा रही हूँ, लेकिन दोनों की अनुभूति में कोई अन्तर
नहीं होता—यह महर्षि वात्स्यायन का मत है ॥ २६ ॥
तत्रैतत्स्यात्—उपायवैलक्षण्यवदेव हि कार्यवैलक्षण्यमपि कस्मान्न
स्यादिति ? तच्च न; हेतुमदुपायवैलक्षण्यम् । तत्र कर्त्राधारयोर्भिन्नलक्षणत्वाद-
हेतुमत्कार्यवैलक्षण्यमन्याय्यं स्यात् । आकृतेरभेदादिति ॥ २७ ॥
यदि आप कहें कि जब आप स्त्री-पुरुष की स्थिति और अनुभूति में भिन्नता मानते हैं, तो
उसकी सुखानुभूति में भी भिन्नता क्यों नहीं मान लेते ? तो हम उत्तर देते हैं कि ऐसा नहीं हो
सकता। उपाय के हेतुरूप स्त्री-पुरुष भिन्न भिन्न हैं, इसलिये कर्ता (पुरुष) और आधार (स्त्री)
के भिन्न होने से उनका व्यापार भी भिन्न होगा, किन्तु वे जिस रतिरूप कार्य को सिद्ध कर रहे हैं,
वह एक ही है, इसलिये दोनों को समान सुखानुभूति ही होगी ॥ २७ ॥
तत्रैतत्स्यात्—संहत्य कारकैरेकोऽर्थोऽभिनिर्वर्त्यते । पृथक्पृथक् स्वार्थ-
साधकौ पुनरिमौ तदयुक्तमिति ॥ २८ ॥
आपके कथन पर यह शङ्का होती है कि लोक में भिन्न कारक मिलकर एक काम को
करते हैं, लेकिन स्त्री-पुरुष तो भिन्न-भिन्न स्वार्थों को सिद्ध करते हैं, इसलिए वे समागमरूप
एक कार्य करते हैं—यह कहना युक्तिसङ्गत नहीं है ॥ २८ ॥
३२ वात्स्यायन-कामसूत्र
तच्च न; युगपदनेकार्थसिद्धिरपि दृश्यते। यथा मेषयोरभिघाते कपित्थयोर्भेद
मल्लयोर्युद्ध इति। न तत्र कारकभेद इति चेदिहापि न वस्तुभेद इति। उपायवैलक्षण्यं
तु सर्गादिति तदभिहितं पुरस्तात्। तेनोभयोरपि सदृशी सुखप्रतिपत्तिरिति ॥ २९ ॥
आपका यह कहना कि स्त्री-पुरुष को सुखरूप एक कार्य की सिद्धि नहीं ही सकती,
उचित नहीं है; क्योंकि एक साथ अनेक पुरुषों के कार्य की सिद्धि भी दिखायी देती है। जैसे दो
मेढ़ों के युद्ध में, कैथ में कैथ मारकर तोड़ने में और दो पहलवानों की कुश्ती में। यदि आप कहें
कि इनमें कारक-भेद नहीं है, दोनों ही कर्ता हैं, तो स्त्री-पुरुष में भी वस्तु-भेद नहीं है; क्योंकि
दोनों ही मनुष्य हैं। स्थिति की भिन्नता तो प्राकृतिक है, और उसका समाधान पीछे किया जा
चुका है। अतएव यह सिद्ध हुआ कि स्त्री-पुरुष दोनों को समान ही सुखानुभूति होती है ॥ २९ ॥
जातेरभेदाद्दम्पत्योः सदृशं सुखमिष्यते।
तस्मात्तथोपचर्या स्त्री यथाग्रे प्राप्नुयाद्रतिम् ॥ ३० ॥
सजातीय होने कारण स्त्री और पुरुष को समागम में समान सुख की ही प्राप्ति होती है,
इसलिये समागम से पूर्व स्त्री को आलिङ्गन, चुम्बन, कुचमर्दन आदि बाह्य उपक्रियाओं द्वारा इस
प्रकार तैयार कर लेना चाहिये कि वह पुरुष से पूर्व रति प्राप्त कर ले। अर्थात् पुरुष से पूर्व स्खलित
हो जाये ॥ ३० ॥
सदृशत्वस्य सिद्धत्वात् कालयोगीन्यपि भावतोऽपि कालतः प्रमाणवदेव नव
रतानि ॥ ३१ ॥
स्त्री और पुरुष की समानता सिद्ध हो जाने पर काल, भाव और प्रमाण प्रत्येक के अनुसार
स्त्री-पुरुष के नौ रत होते हैं ॥ ३१ ॥
रसो रतिः प्रीतिर्भावो रागो वेगः समाप्तिरिति रतिपर्यायाः। संप्रयोगो रतं रहः
शयनं मोहनं सुरतपर्यायाः ॥ ३२ ॥
व्यवहार के लिए रति और रत के पर्याय बताते हैं—
रस, रति, प्रीति, भाव, राग, वेग और समाप्ति—ये शब्द रति (आनन्द) के पर्याय है, और
सम्प्रयोग, रत, रह (एकान्त), शयन और मोहन—ये शब्द सुरत (समागम, सम्भोग या मैथुन)
के पर्याय हैं ॥ ३२ ॥
प्रमाणकालभावजानां सम्प्रयोगाणामेकैकस्य नवविधत्वात् तेषां व्यतिकरे
सुरतसङ्ख्या न शक्यते कर्तुम्; अतिबहुत्वात् ॥ ३३ ॥
प्रमाण, काल और भाव से सम्पन्न रतों में प्रत्येक नौ नौ प्रकार का होने के कारण, उनके
मिश्रण से बनने वाले सुरत-भेदों की संख्या इतनी अधिक हो जाती है कि गणना सम्भव नहीं
है ॥ ३३ ॥
तेषु तर्कादुपचारान् प्रयोजयेदिति वात्स्यायनः ॥ ३४ ॥
इन सङ्कीर्णरतों में अपनी विचारशक्ति में आलिङ्गन, चुम्बन आदि उपक्रियाओं का प्रयोग
करना चाहिये—ऐसा महर्षि वात्स्यायन का मत है ॥ ३४ ॥
२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ३३
प्रथमरते चण्डवेगता शीघ्रकालता च पुरुषस्य, तद्विपरीतमुत्तरेषु। योषितः
पुनरेतदेव विपरीतम्। आ धातुक्षयात्॥ ३५॥
प्रथम समागम में पुरुष चण्डवेग होता है, फलतः शीघ्र स्खलित हो जाता है, किन्तु उसी
समय पुनः मैथुन करने पर पुरुष मन्दवेग हो जाता है, फलतः देर से स्खलित होता है। स्त्रियों की
प्रवृत्ति इसके विपरीत होती है। अर्थात् प्रथम समागम में मन्दवेग होती हैं, फलतः देर से स्खलित
होती हैं, लेकिन उसी समय पुनः मैथुन करने पर वे चण्डवेग होने से शीघ्र स्खलित हो जाती हैं।
यह अपने स्थान से च्युत धातु (रज और वीर्य) के क्षय होने तक रहता है॥ ३५॥
प्राक् च स्त्रीधातुक्षयात् पुरुषधातुक्षय इति प्रायोवादः॥ ३६॥
समागम में पुरुष स्त्री से पहले ही स्खलित हो जाता है—यह प्रायः देखा जाता है॥ ३६॥
मृदुत्वादुपमृद्यत्वान्निसर्गाच्चैव योषितः।
प्राप्नुवन्त्याशु ताः प्रीतिमित्याचार्या व्यवस्थिताः॥ ३७॥
जो स्त्रियाँ स्वभावतः कोमलाङ्गी हैं और जो किञ्चित् कठोर अङ्गों वाली, फलतः
आलिङ्गन, चुम्बन, कुचमर्दन आदि बाह्य उपचारों से उपमर्दन करने योग्य हैं, वे सभी समुचित
रीति से समागम करने पर शीघ्र ही रतिसुख प्राप्त कर लेती हैं—ऐसा कामशास्त्र के आचार्यों का
मत है॥ ३७॥
एतावदेव युक्तानां व्याख्यातं साम्प्रयोगिकम्।
मन्दानामवबोधार्थं विस्तरोऽतः प्रवक्ष्यते॥ ३८॥
स्त्री-पुरुष के समागम के विषय में, विद्वानों के लिए, इतना विवेचन ही पर्याप्त है।
मन्दबुद्धि व्यक्तियों को समझाने के लिये अब इसे विस्तार से कहेंगे॥ ३८॥
अभ्यासादभिमानाच्च तथा सम्प्रत्ययादपि।
विषयेभ्यश्च तन्त्रज्ञाः प्रीतिमाहुश्चतुर्विधाम्॥ ३९॥
प्रीति के भेद—कामशास्त्र के आचार्यों का मत है कि प्रीति चार प्रकार की होती है—
१. आभ्यासिकी—निन्तर कर्मों के अभ्यास से उत्पन्न, २. आभिमानिकी—सङ्कल्पमात्र से
उत्पन्न, ३. सम्प्रत्ययात्मिका—विश्वास से उत्पन्न, और ४. विषयात्मिका—विषयों से
उत्पन्न॥ ३९॥
शब्दादिभ्यो बहिर्भूता या कर्माभ्यासलक्षणा।
प्रीतिः साभ्यासिकी ज्ञेया मृगयादिषु कर्मसु॥ ४०॥
१. आभ्यासिकी प्रीति—शब्दादिक के अतिरिक्त कर्मों में निरन्तर लगे रहने से जो प्रीति
उत्पन्न होती है, वह अभ्यास से बढ़ने के कारण आभ्यासिकी कहलाती है, जैसे मृगया (शिकार)
आदि कर्मों में देखी जाती है॥ ४०॥
अनभ्यस्तेष्वपि पुरा कर्मस्वविषयात्मिका।
सङ्कल्पाज्जायते प्रीतिर्या सा स्यादाभिमानिकी॥ ४१॥
२. आभिमानिकी प्रीति—पहले जिन कर्मों का अभ्यास न किया हो, उनमें संकल्पमात्र
से जो प्रीति उत्पन्न होती है, वह विषयों से उत्पन्न होने वाली प्रीति से भिन्न आभिमानिकी
कहलाती है॥ ४१॥
३४ वात्स्यायन-कामसूत्र
प्रकृतेर्या तृतीयास्याः स्त्रियाश्चैवौपरिष्टके।
तेषु तेषु च विज्ञेया चुम्बनादिषु कर्मसु॥ ४२ ॥
जैसे नपुंसकों और स्त्रियों को औपरिष्टक (मुखमैथुन) में जो प्रीति होती है, वह
मानसिक कहलाती है, वैसे ही आलिङ्गन, चुम्बन, कुचमर्दन, नखक्षत, दन्तक्षत आदि में स्त्री-
पुरुषों की जो प्रीति होती है, वह मानसिक ही है॥ ४२ ॥
नान्योऽयमिति यत्र स्यादन्यस्मिन् प्रीतिकारणे।
तन्त्रज्ञैः कथ्यते सापि प्रीतिः सम्प्रत्ययात्मिका॥ ४३ ॥
३. सम्प्रत्ययात्मिका प्रीति—जब किसी अपरिचित व्यक्ति पर 'यह वही है' इस प्रकार
प्रीति की जाती है, उसे कामशास्त्र के आचार्य सम्प्रत्ययात्मिका—विश्वास से उत्पन्न प्रीति
कहते हैं॥ ४३ ॥
प्रत्यक्षा लोकतः सिद्धा या प्रीतिर्विषयात्मिका।
प्रदानफलवत्त्वात् सा तदर्थाश्चेतरा अपि॥ ४४॥
४. विषयात्मिका प्रीति—इन्द्रियों के विषयों से होने वाली प्रीति विषयात्मिका प्रीति
कहलाती है। यह सर्वप्रधान और प्रत्यक्षसिद्ध है, फलतः शेष तीनों प्रीतियाँ उसी के
निमित्त हैं॥ ४४॥
प्रीतिरेताः परामृश्य शास्त्रतः शास्त्रलक्षणाः।
यो यथा वर्तते भावस्तं तथैव प्रयोजयेत्॥ ४५ ॥
प्रीतियों का उपयोग—इन चारों प्रकार की प्रीतियों को शास्त्र से भली भाँति समझकर,
स्त्री और पुरुष के भाव के अनुरूप ही इनका इस प्रकार प्रयोग करना चाहिये कि स्त्री-पुरुष
दोनों की प्रीति नित्य निरन्तर बढ़ती रहे॥ ४५ ॥
रतावस्थानप्रकरण नामक प्रथम अध्याय सम्पन्न॥
•
द्वितीय अध्याय
आलिङ्गनादिविचारप्रकरण
सम्प्रयोगाङ्गं चतुःषष्टिरित्याचक्षते। चतुःषष्टिप्रकरणत्वात्॥ १ ॥
कामशास्त्र के पूर्ववर्ती आचार्यों ने सम्प्रयोग (सम्भोग) के चौंसठ अङ्ग कहे हैं। क्योंकि
उनके ग्रन्थों में चौंसठ प्रकरण हैं, इसलिये उनका कथन असङ्गत नहीं माना जा सकता॥ १ ॥
शास्त्रमेवेदं चतुःषष्टिरित्याचार्यवादः॥ २ ॥
कामशास्त्र का ही पर्याय चतुःषष्टि है—ऐसा भी कुछ आचार्यों का मत है॥ २ ॥
कलानां चतुःषष्टित्वात्तासां च सम्प्रयोगाङ्गभूतत्वात् कलासमूहो वा
चतुःषष्टिरिति। ऋचां दशतयीनां च संज्ञितत्वात्। इहापि तदर्थसम्बन्धनात्।
पञ्चालसम्बन्धाच्च बह्वृचैरैषा पूजार्थं संज्ञा प्रवर्तिता इत्येके॥ ३ ॥
२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ३५
विद्यासमुद्देश प्रकरण में गीत आदि चौंसठ कलाएँ कही गयी हैं, और पाञ्चाल चौंसठ
कामकलाओं की विवेचना करते हैं, ये दोनों ही कलाएँ सम्प्रयोग का अङ्ग बनती हैं, अतः
'चतुःषष्टि' शब्द न केवल कलाओं, अपितु कामशास्त्र और उसके प्रयोजन सम्प्रयोग के लिये
भी प्रयुक्त होता है। जिस प्रकार 'ऋग्वेद' में दस मण्डल होने के कारण, उसे 'दशतयी' भी कहा
जाता है, उसी प्रकार सम्प्रयोग में दस अध्याय होने से, उसे भी 'दशतयी' कहा जाता है; क्योंकि
'दशतयी' का वैसा ही अर्थ यहाँ भी है। क्योंकि साम्प्रयोगिक अधिकरण के स्वतन्त्र व्याख्याता
बाभ्रव्य ने ही 'ऋग्वेद' को चौंसठ अध्यायों में विभक्त किया था, अतएव ग्रन्थकार के प्रति
अनुराग और महत्त्व प्रकट करने के लिये ही कामशास्त्र को भी चौंसठ अङ्गों वाला कहा जाने
लगा—ऐसा भी कई आचार्यों का मत है ॥ ३ ॥
आलिङ्गनचुम्बननखच्छेददशनच्छेद्यसंवेशनसीत्कृतपुरुषाायितौपरिष्टिकानाम्
अष्टानाामष्टधा विकल्पभेदादष्टावष्टकाश्रतःषष्टिरिति बाभ्रतीगाः ॥ ४ ॥
चतुःषष्टि का स्वरूप— १. आलिङ्गन, २. चुम्बन, ३. नखक्षत, ४. दन्तक्षत, ५. संवेशन,
६. सीत्कार, ७. पुरुषायित (विपरीत रति) और ८. औपरिष्टक (मुखमैथुन)—इन आठ अङ्गों
के आठ आठ भेद होने के कारण, सम्प्रयोग के कुल चौंसठ भेद हो जाते हैं—यह आचार्य
बाभ्रव्य के अनुयायियों (शिष्यों) का मत है ॥ ४ ॥
विकल्पवर्गाणामष्टानां न्यूनाधिकत्वदर्शनात् प्रहणनविरुतपुरुषोपसृप्तचित्र-
रतादीनामन्येषामपि वर्गाणामिह प्रवेशनात् प्रायोवादोऽयम्। यथा सप्तपर्णो वृक्षः
पञ्चवर्णो बलिरिति वात्स्यायनः ॥ ५ ॥
वात्स्यायन द्वारा खण्डन—क्योंकि आलिङ्गनादिकों में प्रत्येक के आठ-आठ भेद नहीं
होते, किसी के कम होते हैं और किसी के अधिक, तथा इनके अतिरिक्त प्रहणन, विरुत,
पुरुषोपसृप्त और चित्ररत आदि अन्य वर्गों का भी साम्प्रयोगिक अधिकरण में प्रवेश देखा जाता
है, अतः बाभ्रव्य के अनुयायियों का उक्त कथन प्रायोवादमात्र है। सम्प्रयोग को चौंसठ अङ्ग वाला
मानना वैसा ही प्रायोवाद है, जैसे सप्तपर्ण (सप्तपत्र) कह देने से छतिवन वृक्ष को सात पत्तों
वाला एवं पंचवर्ण कह देने से बलि को पाँच रंगों वाला मानना—ऐसा आचार्य वात्स्यायन का
मत है। तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार सप्तपर्ण नाम होने से छतिवन सात-सात पत्तों वाला और
पंचवर्ण नाम होने से बलि पाँच वर्ण वाली नहीं हो जाती, उसी प्रकार 'चतुःषष्टि' नाम रखे जाने
से सम्प्रयोग चौंसठ अङ्गों वाला नहीं हो जाता ॥ ५ ॥
तत्रासमागतयोः प्रीतिलिङ्गद्योतनार्थमालिङ्गनचतुष्टयम्। स्पृष्टकम्, विद्धकम्,
उद्घृष्टकम्, पीडितकम् इति ॥ ६ ॥
जो प्रेमपात्र पहले मिले नहीं हैं, उनमें परस्पर अनुराग को द्योतित करने के लिये चार
प्रकार के आलिङ्गन होते हैं—(१) स्पृष्टक, (२) विद्धक, (३) उद्घृष्टक और
(४) पीड़ितक ॥ ६ ॥
सर्वत्र संज्ञार्थेनैव कर्मातिदेशः ॥ ७ ॥
स्पृष्टक, विद्धक आदि शब्द ही अपने अभिधेय कर्म को व्यक्त कर देते हैं। अर्थात् इन
३६ वात्स्यायन-कामसूत्र
पारिभाषिक शब्दों से अर्थ स्वतः विदित हो जाता है, अतएव इनकी परिभाषाएँ देने की
आवश्यकता भी नहीं है ॥ ७ ॥
सम्मुखागतायां प्रयोज्यायामन्यापदेशेन गच्छतो गात्रेण गात्रस्य स्पर्शनं
स्पृष्टकम् ॥ ८ ॥
स्पृष्टक—किसी बहाने से आती हुई नायिका के शरीर से अपने शरीर से अपने शरीर को
छुआ देना ही स्पृष्टक आलिङ्गन है ॥ ८ ॥
प्रयोज्यं स्थितमुपविष्टं वा विजने किञ्चिद् गृहती पयोधरेण विध्येत्।
नायकोऽपि तामवपीड्य गृह्णीयादिति विद्धकम् ॥ ९ ॥
विद्धक—नायिका भी जब एकान्त में खड़े या बैठे नायक को देखकर किसी वस्तु को
रखने या लेने के बहाने अपने स्तनों को उससे छुआ दे और नायक भी अनुराग समझकर उसे
कसकर दबावे—वह विद्धक आलिङ्गन है ॥ ९ ॥
तदुभयमनतिप्रवृत्तसंभाषणयोः ॥ १० ॥
स्पृष्टक और विद्धक आलिङ्गनों का प्रयोग तभी किया जाता है जब नायक और नायिका
दोनों के मध्य अधिक वार्तालाप न हो ॥ १० ॥
तमसि जनसंबाधे विजने वाथ शनकैर्गच्छतोर्नातिह्रस्वकालमुद्धर्षणं परस्परस्य
गात्राणामुद्घृष्टकम् ॥ ११ ॥
उद्घृष्टक—अन्धकार में, भीड़भरे स्थान में अथवा निर्जन स्थान में धीरे-धीरे चलते हुए
चिरकाल तक एक का शरीर दूसरे के शरीर से घर्षण करता रहे, तो उसे उद्घृष्टक कहते हैं ॥ ११ ॥
तदेव कुड्यसंदंशेन स्तम्भसंदंशेन वा स्फुटकमवपीडयेदिति पीडित-
कम् ॥ १२ ॥
पीडितक—वह उद्घृष्टक आलिङ्गन ही, यदि दीवार या स्तम्भ के सहारे हो, तो नायक
और नायिका, दोनों के शरीरों के परस्पर पीड़न के कारण पीड़ितक कहलाता है। अर्थात्
पीड़ितक आलिङ्गन में नायक और नायिका दीवार या स्तम्भ के सहारे एक-दूसरे के शरीर को
अच्छी तरह दबाते हैं ॥ १२ ॥
तदुभयमवगतपरस्पराकारयोः ॥ १३ ॥
उद्घृष्टक और पीड़ितक आलिङ्गन उन नायक-नायिकाओं के लिये है जो परस्पर प्रीति से
अवगत हों, लेकिन समागम न हुआ हो ॥ १३ ॥
लतावेष्टितकं वृक्षाधिरूढकं तिलतण्डुलकं क्षीरनीरकमिति चत्वारि
सम्प्रयोगकाले ॥ १४ ॥
सुरत के समय चार आलिङ्गन अधिक उपयुक्त रहते हैं—लतावेष्टितक, वृक्षाधिरूढक,
तिलतण्डुलक और क्षीरनीरक ॥ १४ ॥
लतेव शालमावेष्टयन्ती चुम्बनार्थं मुखमवनयेत्। उद्धृत्य मन्दसीत्कृता
तमाश्रिता वा किञ्चिद्रामणीयकं पश्येत्तल्लतावेष्टितकम् ॥ १५ ॥
१. लतावेष्टितक—जिस प्रकार लता शाल के वृक्ष से लिपटती है, उसी प्रकार नायिका
२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ३७
नायक से लिपटती हुई उसके मुख को चुम्बन के लिए तनिक नीचे झुकाये, उसके राग को उद्दीप्त
करती हुई मन्द सीत्कार करे, अथवा उससे लिपटी हुई ही किसी रमणीय वस्तु (स्तनादि
कामकेन्द्रों अथवा नायककृत नख-दन्त-क्षतों आदि) का अवलोकन करे—यह लतावेष्टितक
आलिङ्गन है ॥ १५ ॥
चरणेन चरणमाक्रम्य द्वितीयेनोरुदेशमाक्रमन्ती वेष्टयन्ती वा तत्पृष्ठसक्तैक-
बाहुर्द्वितीयेनांसमवनमयन्ती ईषन्मन्दसीत्कृतकूजिता चुम्बनार्थमेवाधिरोढुमिच्छेदिति
वृक्षाधिरूढकम् ॥ १६ ॥
२. वृक्षाधिरूढ़क—नायिका अपना एक पैर नायक के पैर पर रखकर, दूसरे पैर से
नायक की जाँघों को दबाती है या लपेटती है और अपना एक हाथ नायक की पीठ पर रखकर
दूसरे हाथ से उसके कन्धे को झुकाकर मन्द मन्द सीत्कार करती हुई, उसके अधरों का चुम्बन
करने के लिये नायकरूपी वृक्ष पर चढ़ने की चेष्टा सी करती है—यह वृक्षाधिरूढक आलिङ्गन
कहलाता है ॥ १६ ॥
तदुभयं स्थितकर्म ॥ १७ ॥
लतावेष्टितक और वृक्षाधिरूढ़क—ये दोनों आलिङ्गन समागम से पूर्व खड़े हुए ही किये
जाते हैं ॥ १७ ॥
शयनगतावेवोरुव्यत्यासं भुजव्यत्यासं च ससंघर्षमिव घनं संस्वजेते तत्तिल-
तण्डुलकम् ॥ १८ ॥
तिलतण्डुलक—शय्या पर लेटे हुए नायक और नायिका अपनी भुजाओं और पैरों को
विपरीत रूप में मिलाते हुए, संघर्षपूर्वक दृढ़ालिङ्गन करें—यह आलिङ्गन तिलतण्डुलक
कहलाता है ॥ १८ ॥
रागान्धावनपेक्षित्वात्ययौ परस्परमनुविशत इवोत्सङ्गायामभिमुखोपविष्टायां
शयने वेति क्षीरजलकम् ॥ १९ ॥
क्षीरजलक—रागाधिक्य के कारण विवेकहीन बने नायक और नायिका, हानि की
चिन्ता छोड़कर, जब एक-दूसरे में प्रविष्ट सा हो जाने की लालसा से प्रगाढ़ आलिङ्गन करते हैं
तो वह आलिङ्गन क्षीरजलक कहलाता है। यह आलिङ्गन उसी स्थिति में सम्भव है जब नायिका
अपने पैर नायक की कमर में फँसाकर उसकी ओर मुख करके गोद में बैठी हो अथवा दोनों
शय्या पर एक दूसरे की ओर मुख कर लेटे हुए हों ॥ १९ ॥
तदुभयं रागकाले ॥ २० ॥
तिलतण्डुलक और क्षीरजलक—ये दोनों आलिङ्गन समागम से पूर्व राग के प्रचण्ड हो
जाने पर ही करने चाहियें ॥ २० ॥
इत्युपगूहनयोगा बाभ्रवीयाः ॥ २१ ॥
आचार्य बाभ्रव्य के अनुयायियों (शिष्यों) द्वारा कथित आलिङ्गन के भेद समाप्त
हुए ॥ २१ ॥
सुवर्णनाभस्य त्वधिकमेकाङ्गोपगूहनचतुष्टयम् ॥ २२ ॥
३८ वात्स्यायन-कामसूत्र
आचार्य सुवर्णनाभ के मत से आलिङ्गन के चार अन्य भेद अधिक हैं, जिनमें पुरुष के
किसी एक अङ्ग का स्त्री के उसी अङ्ग द्वारा आलिङ्गन किया जाता है ॥ २२ ॥
तत्रोरुसन्दंशेनैकमूरूमूरुद्वयं वा सर्वप्राणं पीडयेदित्यूरूपगूहनम् ॥ २३ ॥
ऊरूपगूहन—जब एक-दूसरे की ओर मुख करके करवट के बल लेटे हुए नायक या
नायिका एक-दूसरे की एक या दोनों जाँघों को अपनी जाँघों में लेकर सँड़सी की तरह पूरी शक्ति
से दबायें, तो ऊरूपगूहन आलिङ्गन होता है ॥ २३ ॥
जघनेन जघनमवपीड्य प्रकीर्यमाणकेशहस्ता नखदशनप्रहरणचुम्बनप्रयोज-
नाय तदुपरि लङ्घयेत् तज्जघनोपगूहनम् ॥ २४ ॥
जघनोपगूहन—अपने बिखरे हुए बालों को हाथ में लिये हुए नायिका, नायक के
जघनस्थल को अपने जघनस्थल से दबाती हुई नखक्षत, दन्तक्षत और प्रहरण के उद्देश्य से
उसके ऊपर लेट जाये, तो जघनोपगूहन आलिङ्गन होता है ॥ २४ ॥
स्तनाभ्यामुरः प्रविश्य तत्रैव भारमारोपयेदिति स्तनालिङ्गनम् ॥ २५ ॥
स्तनालिङ्गन—जब नायिका अपने वक्ष को पुरुष के वक्ष पर झुकाकर स्तनों का भार
उसके ऊपर रख दे और दृढ़ आलिङ्गन करे, तो उसे स्तनालिङ्गन कहते हैं ॥ २५ ॥
मुखे मुखमासज्ज्याक्षिणी अक्ष्णोर्ललाटेन ललाटमाहन्यात् सा
ललाटिका ॥ २६ ॥
ललाटिका—मुख के सामने मुख करके और आँखों में आँखें मिलाकर मस्तक से
मस्तक को दबाये—इस आलिङ्गन को ललाटिका कहते हैं ॥ २६ ॥
संवाहनमप्युपगूहनप्रकारमित्येके मन्यन्ते। संस्पर्शत्वात् ॥ २७ ॥
कुछ आचार्य संवाहन (मुट्ठियों से अङ्ग दबाना) को भी आलिङ्गन मानते हैं, क्योंकि
इसमें भी स्पर्श-सुख होता है ॥ २७ ॥
पृथक्कालत्वाद्भिन्त्रप्रयोजनत्वादसाधारणत्वान्नेति वात्स्यायनः ॥ २८ ॥
क्योंकि संवाहन का समय आलिङ्गन (सम्भोग) काल से भिन्न है, उसका प्रयोजन थकान
दूर करना है, रतिसुख देना नहीं, और संवाहन का सुख एक को मिलता है जबकि आलिङ्गन का
नायक-नायिका दोनों को, फलतः संवाहन को आलिङ्गनप्रकार नहीं माना जा सकता—
ऐसा आचार्य वात्स्यायन का मत है ॥ २८ ॥
पृच्छतां शृण्वतां वापि तथा कथयतामपि ।
उपगूहविधिं कृत्स्नं रिरंसा जायते नृणाम् ॥ २९ ॥
आलिङ्गन का महत्त्व—आलिङ्गन की विधि को पूछते, सुनते और कहते हुए ही मनुष्य
की रमण की इच्छा जाग्रत हो जाती है ॥ २९ ॥
येऽपि ह्यशास्त्रिताः केचित् संयोगा रागवर्धनाः ।
आदरेणैव तेऽप्यत्र प्रयोज्याः साम्प्रयोगिकाः ॥ ३० ॥
अशास्त्रीय योग—जो योग शास्त्र में न कहे गये हों, लेकिन रागवर्धक और कामोत्तेजक
हों, सम्भोग के समय उनका भी आदरपूर्वक प्रयोग करना चाहिये ॥ ३० ॥
२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ३९
शास्त्राणां विषयस्तावद्यावन्मन्दरसा नराः ।
रतिचक्रे प्रवृत्ते तु नैव शास्त्रं न च क्रमः ॥ ३१ ॥
अशास्त्रीय योगों के उपयोग का कारण—मनुष्य को शास्त्र का ज्ञान तभी तक रहता
है, जब तक राग-मन्द रहता है। राग के प्रचण्ड होनेपर तो मनुष्य कामान्ध हो उठता है और तब
उसे न शास्त्र के ज्ञान का ध्यान रहता है और न उसमें कथित आलिङ्गन, चुम्बन आदि के क्रम
का ही ॥ ३१ ॥
आलिङ्गनविचारप्रकरण नामक द्वितीय अध्याय सम्पन्न ॥
तृतीय अध्याय
चुम्बनादिविकल्पप्रकरण
चुम्बननखदशनच्छेद्यानां न पौर्वापर्यमस्ति। रागयोगात् प्राक्संयोगादेषां
प्राधान्येन प्रयोगः। प्रहणनसीत्कृतयोश्च सम्प्रयोगे ॥ १ ॥
चुम्बन, नखक्षत, दन्तक्षत—इन तीनों में पूर्व और अपर का क्रम नहीं है, क्योंकि ये तीनों
ही उपक्रियाएँ राग के योग से होती हैं। प्रायः समागम से पूर्व काम को उत्तेजित करने के निमित्त
इनका प्रयोग होता है। समागम के समय तो केवल प्रहणन और सीत्कार का ही प्रयोग
होता है ॥ १ ॥
सर्वं सर्वत्र। रागस्यानपेक्षितत्वात्। इति वात्स्यायनः ॥ २ ॥
चुम्बन आदि सभी उपक्रियाओं का प्रयोग शिश्नप्रवेश के पहले और बाद में सर्वत्र किया
जा सकता है, क्योंकि इनके प्रयोग में नायक-नायिका दोनों के राग की अपेक्षा नहीं है—यह
आचार्य वात्स्यायन का मत है ॥ २ ॥
तानि प्रथमरते नातिव्यक्तानि विश्रब्धिकायां विकल्पेन च प्रयुञ्जीत।
तथाभूतत्वाद्रागस्य। ततः परमतित्वरया विशेषवत्समुच्चयेन रागसंधुक्षणार्थम् ॥ ३ ॥
प्रथम समागम में चुम्बन आदि का एक साथ और अतिव्यक्त प्रयोग नहीं करना चाहिये
और कुछ विश्रब्ध नायिका में इनका वैकल्पिक प्रयोग करना चाहिये, क्योंकि राग की यही रीति
है। नायिका के पूर्ण विश्रब्ध हो जाने पर—राग और रति के बढ़ जाने पर—राग को प्रदीप्त करने *
(भड़काने) के लिये इनका शीघ्रतापूर्वक और एक साथ प्रयोग करना चाहिये ॥ ३ ॥
ललाटालककपोलनयनवक्षःस्तनोष्ठान्तर्मुखेषु चुम्बनम् ॥ ४ ॥
मस्तक, केश, कपोल, नेत्र, वक्ष, स्तन, ओष्ठ और मुख का आन्तरिक भाग—ये चुम्बन के
स्थान हैं ॥ ४ ॥
ऊरुसन्धिबाहुनाभिमूलयोर्लाटानाम् ॥ ५ ॥
लाटवासियों की रीति—लाट देश के निवासी योनि के ओष्ठों, जाँघों के सन्धिस्थल
और काँख का भी चुम्बन करते हैं ॥ ५ ॥
२. साम्प्रयोगिक अधिकरण (प्रमाण-काल-भाव भेद, आलिङ्गन, चुम्बन, नखच्छेद्य व रति-बन्ध)
४० वात्स्यायन-कामसूत्र
रागवशाद्देशप्रवृत्तेश्च सन्ति तानि तानि स्थानानि, न तु सर्वजनप्रयोज्यानीति
वात्स्यायनः॥ ६॥
स्थानों पर वात्स्यायन की व्यवस्था—जो व्यक्ति रागवश या देशाचार के कारण जाँघ
आदि स्थानों का चुम्बन करते हैं, ये स्थान उन ही के चुम्बन के योग्य हैं। शिष्टजनों को उनका
अनुकरण नहीं करना चाहिये॥ ६॥
तद्यथा—निमित्तकं स्फुरितकं घट्टितकमिति त्रीणि कन्याचुम्बनानि॥ ७॥
कन्या के चुम्बन—कन्या या नवपरिणीता, जिसने किसी पुरुष के साथ समागम न
किया हो, फलतः जो अक्षतयोनि हो, का चुम्बन तीन प्रकार से होता है—निमित्तक, स्फुरितक
और घट्टितक॥ ७॥
बलात्कारेण नियुक्ता मुखे मुखमाधत्ते न तु विचेष्टत इति निमित्तकम्॥ ८॥
निमित्तक—नायक द्वारा आग्रहपूर्वक चुम्बन के लिये नियुक्त की गयी नायिका जब
अपना मुख नायक के मुख पर रख दे, लेकिन सङ्कोचवश चुम्बन की कोई चेष्टा न करे, तो उसे
निमित्तक चुम्बन कहते हैं॥ ८॥
वदने प्रवेशितं चौष्ठं मनागपत्रपादग्रहीतुमिच्छन्ती स्पन्दयति स्वमोष्ठं
नोत्तरमुत्सहंत इति स्फुरितकम्॥ ९॥
स्फुरितक—नायक द्वारा अपना अधर नायिका के मुख में रख देने पर संकोच के
किञ्चित् शिथिल हो जाने के कारण, जब नायिका के अधर को पकड़ने की इच्छा से अपने अधर
को फड़काये, लेकिन लज्जावश ऊपर के ओष्ठ को न चलाये, तो इस चुम्बन को स्फुरितक
कहते हैं॥ ९॥
ईषत्परिगृह्य विनिमीलितनयना करेण च तस्य नयने अवच्छादयन्ती जिह्वाग्रेण
घट्टयति इति घट्टितकम्॥ १०॥
घट्टितक—लज्जा के कुछ अधिक हट जाने पर जब नायिका, अपने मुख में रखे नायक
के अधर को, अपने ओष्ठों में दबाकर, आँखें बन्द करके तथा अपने हाथों से नायक के नयनों
को भी बन्द करके, जिह्वा के अग्रभाग को उसके ओष्ठों पर रगड़े, तो यह घट्टितक चुम्बन
कहलाता है॥ १०॥
समं तिर्यगुद्भ्रान्तमवपीडितकमिति चतुर्विधमपरे॥ ११॥
शेष नायिकाओं के चुम्बन—नवपरिणीत नायक-नायिकाओं के अतिरिक्त शेष के चार
प्रकार के चुम्बन होते हैं—सम, तिर्यक्, उद्भ्रान्त और अवपीडितक॥ ११॥
अङ्गुलिसम्पुटेन पिण्डीकृत्य निर्दशनमोष्ठपुटेनावपीडयेदित्यवपीडितकं
पञ्चममपि करणम्॥ १२॥
आकृष्ट चुम्बन—अङ्गूठा और तर्जनी अङ्गुलि से नायिका के अधर को गोल करके,
अपने दोनों ओष्ठों से बिना दाँत लगाये ही उसका अवपीड़न 'अवपीडितक' नामक पाँचवाँ
चुम्बन है॥ १२॥
द्यूतं चात्र प्रवर्तयेत्॥ १३॥
२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ४१
चुम्बनद्यूत—नायक और नायिका को एक-दूसरे के अधर-चुम्बन की बाजी (शर्त) भी
लगानी चाहिये ॥ १३ ॥
पूर्वमधरसम्पादनेन जितमिदं स्यात् ॥ १४ ॥
चुम्बनद्यूत का लक्षण—नायक-नायिका में जो पहले दूसरे का अधर चूम ले, वही
जीतेगा ॥ १४ ॥
तत्र जिता सार्धरुदितं करं विधुनुयात् प्रणोद्देशेत् परिवर्तयेद् बलादाहता
विवदेत् पुनरप्यस्तु पण इति ब्रूयात् । तत्रापि जिता द्विगुणमायस्येत् ॥ १५ ॥
द्यूतकलह—यदि नायिका चुम्बनद्यूत में पराजित हो जाये, तो हाथों को नचा नचाकर
रोने लग जाये, पति को ठेलकर एक ओर कर दे, दाँतों से उसे काट ले और दूसरी ओर मुख कर
ले। यदि पति अनुनय विनय करे, तो उससे वाग्युद्ध प्रारम्भ कर दे, और पुनः बाजी लगाने को
कहे। यदि दोबारा भी पराजित हो जाये, तो पहले से दुगुना कलह और कोलाहल करे ॥ १५ ॥
विश्रब्धस्य प्रमत्तस्य चाधरमवगृह्य दशनान्तर्गतमनिर्गमं कृत्वा हसेदुत्क्रोशेत्
तर्जयेद्गलोदाहयेन्नृत्येत्प्रनर्तितभ्रूणा च विचलनयनेन मुखेन विहसन्ती तानि तानि च
ब्रूयात्। इति चुम्बनद्यूतकलहः ॥ १६ ॥
कपटद्यूत—निष्कपट चुम्बनद्यूत में पराजित नायिका, विश्वस्त या असावधान नायक के
अधर को दाँतों के मध्य इस प्रकार पकड़े कि नायक द्वारा अधर स्वतः न निकाला जा सके।
अपनी इस अप्रत्याशित जीत पर खुलकर हँसे, अपनी जीत की घोषणा करे, अधर को दाँतों से
काटने की धमकी दे, विलासपूर्वक शरीर को मटकाये, अधर छुड़ाने का नायक को आह्वान दे,
प्रसन्नतापूर्वक नृत्य करे और भौंहे नचाये, आँखें चलाती और हँसती हुई राग को बढ़ाने वाली
बातें कहें। इस प्रकार चुम्बनद्यूत सम्बन्धी प्रणयकलह समाप्त हुआ ॥ १६ ॥
एतेन नखदशनच्छेद्यप्रहणनद्यूतकलहा व्याख्याताः ॥ १७ ॥
नखक्षतादि का कलह—चुम्बन के कलह से नखक्षत, दन्तक्षत और प्रहणन के द्यूतों
को भी कह दिया गया है, अर्थात् नखक्षत, दन्तक्षत और प्रहणन के द्यूतों और उनमें सन्निहित
कलहों की भी यही रीति है ॥ १७ ॥
चण्डवेगयोरेव त्वेषां प्रयोगः । तत्सात्म्यात् ॥ १८ ॥
नखक्षत आदि के द्यूत और कलह का प्रयोग चण्डवेग वाले नायक नायिकाओं में ही होता
है, क्योंकि यह उन की प्रकृति के अनुकूल पड़ता है ॥ १८ ॥
तस्यां चुम्बन्त्यामयमप्युत्तरं गृह्णीयात् । इत्युत्तरचुम्बितम् ॥ १९ ॥
उत्तर-ओष्ठ-चुम्बन—जब नायिका नायक का अधरपान कर रही हो, तो अवसर पाकर
नायक भी उसके ऊपर के ओष्ठ को पकड़ ले और उसका चुम्बन करे—इस प्रकार के चुम्बन को
उत्तर चुम्बन कहते हैं ॥ १९ ॥
ओष्ठसंदंशेनावगृह्यौष्ठद्वयमपि चुम्बेत् । इति सम्पुटकं स्त्रियाः, पुंसो वाऽजात-
व्यञ्जनस्य ॥ २० ॥
दोनों ओष्ठों के चुम्बन की विधि—अपने दोनों ओष्ठों से नायिका के दोनों ओष्ठों का
४२ वात्स्यायन-कामसूत्र
चुम्बन करे। यह चुम्बन नायिका भी कर सकती है, यदि नायक बिना मूँछों वाला हो। इस
प्रकारका चुम्बन सम्पुटक कहलाता है॥ २०॥
तस्मिन्नितरोऽपि जिह्वयास्या दशनान् घट्टयेत्, तासु जिह्वां चेति
जिह्वायुद्धम्॥ २१॥
अन्तर्मुखचुम्बन—नायक या नायिका द्वारा सम्पुटक चुम्बन करने पर दूसरा अपनी जिह्वा
को चुम्बन लेने वाले के दाँतों, तालु और जिह्वा पर फेरे, तो यह जिह्वायुद्ध कहलाता है॥ २१॥
एतेन बलाद्दशनरदनग्रहणं दानं च व्याख्यातम्॥ २२॥
मुखदन्तयुद्ध—इस जिह्वायुद्ध से ही मुखयुद्ध और दन्तयुद्ध भी कह दिया गया है अर्थात्
जिह्वायुद्ध के समान ही मुखयुद्ध और दन्तयुद्ध भी समझना चाहिये॥ २२॥
समं पीडितमञ्चितं मृदु शेषाङ्गेषु चुम्बनं स्थानविशेषयोगात्। इति चुम्बन-
विशेषाः॥ २३॥
शेषाङ्गचुम्बन—शेष अङ्गों में सुविधानुसार सम, पीडित, अञ्चित और मृदु—ये चार
प्रकार के चुम्बन होते हैं। इस प्रकार चुम्बन के भेद समाप्त हुए॥ २३॥
सुप्तस्य मुखमवलोकयन्त्या स्वाभिप्रायेण चुम्बनं रागदीपनम्॥ २४॥
रागदीपन—सोये हुए नायक के मुख को देखती हुई नायिका द्वारा चुम्बन अनुराग के
दीपन (जागरण एवं रागवर्धन) के कारण 'रागदीपन' कहलाता है॥ २४॥
प्रमत्तस्य विवदमानस्य वाऽन्यतोऽभिमुखस्य सुप्ताभिमुखस्य वा
निद्राव्याघातार्थं चलितकम्॥ २५॥
चलितक—जब नायक नायिका की ओर से असावधान हो, उससे विवाद में लीन हो,
उससे विमुख होकर किसी अन्य विषय में संलग्न हो, अथवा सोने को तत्पर हो, तो उसे नींद
से जगाने के लिये (अपनी ओर ध्यान आकृष्ट करने, विवाद समाप्त करने एवं तन्द्रा दूर करने,
अर्थात् उसे भोगरत बनाने के लिये) जो चुम्बन होता है, उसे चलितक चुम्बन कहते हैं॥ २५॥
चिररात्रावागतस्य शयनसुप्तायाः स्वाभिप्रायचुम्बनं प्रातिबोधिकम्॥ २६॥
प्रातिबोधिक—रात को देर से लौटा नायक, शैय्या पर सोयी हुई नायिका का चुम्बन
अपने अभिप्राय से करे, तो वह चुम्बन प्रातिबोधिक कहलाता है॥ २६॥
सापि तु भावजिज्ञासार्थिनी नायकस्यागमनकालं संलक्ष्य व्याजेन सुप्ता
स्यात्॥ २७॥
इसकी विधि—नायक के प्रेम की परीक्षा करने के लिये नायिका उसके आगमन-काल
को जानकर बहाना बनाकर सो जाये॥ २७॥
आदर्शे कुड्ये सलिले वा प्रयोज्यायाश्छायाचुम्बनमाकारप्रदर्शनार्थमेव
कार्यम्॥ २८॥
छायाचुम्बन—प्रेमप्रदर्शनार्थ दर्पण, दीवार या जल में पड़ रही नायक या नायिका की
छाया का चुम्बन करना चाहिये—यह छायाचुम्बन कहलाता है॥ २८॥
बालस्य चित्रकर्मणः प्रतिमायाश्च चुम्बनं संक्रान्तकमालिङ्गनं च॥ २९॥
२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ४३
संक्रान्तकचुम्बन—बालक, चित्र और प्रतिमा के चुम्बन और आलिङ्गन के बहाने
अपना प्रेम-प्रदर्शित करना चाहिये—यह संक्रान्तकचुम्बन या आलिङ्गन कहलाता है ॥ २९ ॥
तथा निशि प्रेक्षणके स्वजनसमाजे वा समीपे गतस्य प्रयोज्याया हस्ताङ्गुलि-
चुम्बनं संविष्टस्य वा पादाङ्गुलिचुम्बनम् ॥ ३० ॥
अङ्गुलिचुम्बन—रात्रि में होने वाले खेल-तमाशे या स्वजन सम्बन्धियों के मध्य
आयोजित कार्यक्रम में, समीप में आये या साथ-साथ होने पर नायक या नायिका के हाथ की
अंगुलि को और सोते हुए के पैर की अंगुलि का चुम्बन कर प्रेम प्रदर्शित करना चाहिये—इसे
ही अंगुलिचुम्बन कहा जाता है ॥ ३० ॥
संवाहिकायास्तु नायकमाकारयन्त्या निद्रावशादकामाया इव तस्योर्वोर्वदनस्य
निधानमूरूचुम्बनं चेत्याभियोगिकानि ॥ ३१ ॥
संवाहिका की प्रेमाभिव्यक्ति—यदि संवाहिका (हाथ-पैर दबाने वाली स्त्री) नायक से
प्रेम करती हो, तो अपना प्रेम प्रदर्शित करने के लिये निद्रा के बहाने, उसकी जाँघ पर अपना सिर
रख दे और फिर उसे चूम ले—यह सब मिलन के उपाय हैं ॥ ३१ ॥
भवति चात्र श्लोकः—
कृते प्रतिकृतं कुर्यात् ताडिते प्रतिताडितम्।
करणेन च तेनैव चुम्बिते प्रतिचुम्बितम्॥ ३२॥
इस विषय में एक आनुवंश्य श्लोक है—
समागम के समय रागभाव उद्दीप्त करने के लिये नायक जो भी करे, नायिका को वही
करना चाहिये। यदि नायक हस्तप्रहार करे, तो नायिका को भी उसी प्रकार हस्तप्रहार करना
चाहिये, नायक जिस रीति से चुम्बन करे, नायिका को भी उसी रीति से चुम्बन करना
चाहिये ॥ ३२ ॥
चुम्बनादिविकल्पप्रकरण नामक तृतीय अध्याय सम्पन्न॥
●
चतुर्थ अध्याय
नखक्षत आदि प्रकरण
रागवृद्धौ सङ्घर्षात्मकं नखविलेखनम् ॥ १ ॥
नखक्षत का स्वरूप—नायक-नायिका में राग बढ़ जाने पर परस्पर संघर्षात्मक रूप में
नखक्षत किये जाते हैं ॥ १ ॥
तस्य प्रथमसमागमे प्रवासप्रत्यागमने प्रवासगमने क्रुद्धप्रसन्नायां मत्तायां च
प्रयोगः। न नित्यमचण्डवेगयोः ॥ २ ॥
समय और स्थान—प्रथम समागम में, प्रवास से लौटने पर, प्रवास पर जाते समय,
मानवती नायिका के प्रसन्न होने पर और नायिका के काम या मद से उन्मत्त होने पर नखक्षतों का
काम० ५
४४ वात्स्यायन-कामसूत्र
प्रयोग होता है। मन्दवेग नायक-नायिकाओं में इनका सदैव प्रयोग नहीं होता, अर्थात् चण्डवेग
नायक-नायिका ही इसका नित्य प्रयोग कर सकते हैं ॥ २ ॥
तथा दशनच्छेद्यस्य सात्म्यवशाद्वा ॥ ३ ॥
नखक्षतों के समान, इन्हीं परिस्थितियों में, ही दन्तक्षतों का भी प्रयोग किया जाता है ॥ ३ ॥
तदाच्छुरितकमर्धचन्द्रो मण्डलं रेखा व्याघ्रनखं मयूरपदकं शशप्लुतक-
मुत्पलपत्रकमिति रूपतोऽष्टविकल्पम् ॥ ४ ॥
नखक्षत के आठ भेद—(१) आच्छुरितक, (२) अर्धचन्द्र, (३) मण्डल, (४) रेखा,
(५) व्याघ्रनख, (६) मयूरपदक, (७) शशप्लुतक और (८) उत्पलपत्रक ॥ ४ ॥
कक्षौ स्तनौ गलः पृष्ठं जघनमूरू च स्थानानि ॥ ५ ॥
नखक्षतों के वे स्थान—काँख, स्तन, ग्रीवा (गला), पीठ, जाँघें और ऊरु (जाँघों के
[L1
२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ४५
तैः सुनियमितैर्हनुदेशे स्तनयोरधरे वा लघुकरणमनुद्गतलेखं स्पर्शमात्र-
जननाद् रोमाञ्चकरमन्ते सन्निपातवर्धमानशब्दमाच्छुरितकम्॥ १२॥
आच्छुरितक—हाथ की अँगुलियों को एक साथ मिलाकर कपोल, स्तन या अधर पर
ऐसा हल्का स्पर्श किया जाये कि शरीर रोमाञ्चित हो उठे, लेकिन क्षत न हो, और नखों के
परस्पर टकराने से चटचट शब्द बढ़े, उसे आच्छुरितक नखक्षत कहते हैं॥ १२॥
प्रयोज्यायां च तस्याङ्गसंवाहने शिरसः कण्डूयने पिटकभेदने व्याकुलीकरणे
भीषणेने प्रयोगः॥ १३॥
अवस्थानुरूप प्रयोग—जब नायिका, नायक का शरीर दबा रही हो, सिर खुजा रही हो,
मुंहासे फोड़ रही हो अथवा जब उसे कामोत्तेजित करना हो, तब इसका अत्यधिक प्रयोग होता
है। इसका प्रयोग नायक और नायिका, दोनों एक-दूसरे को उत्तेजित करने में कर सकते
हैं॥ १३॥
ग्रीवायां स्तनपृष्ठे च वक्रो नखपदनिवेशोऽर्धचन्द्रकः॥ १४॥
अर्धचन्द्र और उसका स्थान—जब गले और स्तनों पर अर्धचन्द्र के समान नखों से
चिह्न अङ्कित किया जाये तो उसे अर्धचन्द्र कहते हैं॥ १४॥
तावेव द्वौ परस्पराभिमुखौ मण्डलम्॥ १५॥
मण्डल—जब दो अर्धचन्द्र परस्पर सम्मुख अङ्कित किये जाते हैं तो उसे मण्डल
कहते हैं॥ १५॥
नाभिमूलककुन्दरवंक्षणेषु तस्य प्रयोगः॥ १६॥
नाभिमूल (पेड़ू), ककुन्दर (नितम्बगर्त) और ऊरुसन्धि (योनि) पर इसका प्रमुख रूप
में प्रयोग होता है॥ १६॥
सर्वस्थानेषु नातिदीर्घा लेखा॥ १७॥
लेखा—नखों से अङ्कित रेखा, जो बहुत लम्बी न हो, लेखा कहलाती है। इसे नायिका
के किसी भी अङ्ग में अङ्कित किया जा सकता है॥ १७॥
सैव वक्रा व्याघ्रनखकमास्तनमुखम्॥ १८॥
व्याघ्रनख—यदि लेखा स्तन के मुख (चूचुक) से ऊपर की ओर कुछ टेढ़ी हो तो
व्याघ्रनख कहलाती है॥ १८॥
पञ्चभिरभिमुखैर्लेखा चूचुकाभिमुखी मयूरपदकम्॥ १९॥
मयूरपदक—पाँचों नखों से स्तनों को पकड़कर खींचने से स्तनों के मुख (चूचुक) पर
बनी रेखाएँ मयूरपदक कहलाती हैं॥ १९॥
तत्सम्प्रयोगश्लाघायाः स्तनचूचुके सन्निकृष्टानि पञ्चनखपदानि शशप्लुत-
कम्॥ २०॥
शशप्लुतक—समागम की प्रशंसा चाहने वाली नायिकाओं के स्तनों के चूचुकों पर
खिंची हुई पाँचों नखों की रेखाएँ शशप्लुतक कहलाती हैं॥ २०॥
स्तनपृष्ठे मेखलापथे चोत्पलपत्राकृतीत्युत्पलपत्रकम्॥ २१॥
४६ वात्स्यायन-कामसूत्र
उत्पलपत्रक—स्तनों एवं कमर में नखों से अङ्कित कमल की आकृति का चिह्न उत्पल-
पत्रक कहलाता है ॥ २१ ॥
ऊर्वोः स्तनपृष्ठे च प्रवासं गच्छतः स्मरणीयकं संहताश्चतस्रस्तिस्रो वा लेखाः।
इति नखकर्माणि ॥ २२ ॥
स्मरणीयक—प्रवास जाते समय पुरुष, स्त्री के स्तनों और जाँघों पर स्मृति के लिये
मिली हुई तीन या चार रेखाएँ खींच देते हैं। स्मृति के लिये होने के कारण ये स्मरणीयक
कहलाते हैं। नखक्षत के भेद समाप्त हुए ॥ २२ ॥
आकृतिविकारयुक्तानि चान्यान्यपि कुर्वीत ॥ २३ ॥
इनके अतिरिक्त अन्य वस्तुओं की आकृति के चिह्न भी बनाने चाहिये ॥ २३ ॥
विकल्पानामनन्तत्वादानन्त्याच्च कौशलविधेरभ्यासस्य च सर्वगामित्वाद्-
रागात्मकत्वाच्छेद्यस्य प्रकारान् कोऽभिसमीक्षितुमर्हतीत्याचार्याः ॥ २४ ॥
भेद और कौशल की अनन्तता—नखक्षत के भेद अनन्त हैं, कौशल की भी कोई सीमा
नहीं है, और यह व्यक्ति के अभ्यास पर निर्भर करता है, फलतः उसे सभी स्थलों पर और सभी
प्रकार के नखक्षत करने का अभ्यास होना चाहिये। क्योंकि कामातुर होकर ही नायक नखक्षतों
का प्रयोग करता है, अतः उसके समस्त भेदों की समीक्षा (विवेचना) कौन कर सकता है—
ऐसा कामशास्त्र के आचार्यों का मत है ॥ २४ ॥
भवति हि रागेऽपि चित्रापेक्षा। वैचित्र्याच्च परस्परं रागो जनयितव्यः।
वैचक्षण्ययुक्ताश्च गणिकास्तत्कामिनश्च परस्परं प्रार्थनीया भवन्ति। धनुर्वेदादिष्वपि
हि शस्त्रकर्मशास्त्रेषु वैचित्र्यमेवापेक्ष्यते किं पुनरिहेति वात्स्यायनः ॥ २५ ॥
वात्स्यायन का मत—सामान्य अवस्था में ही नहीं, रागावस्था में भी वैचित्र्य की अपेक्षा
रहती है, क्योंकि वैचित्र्य से ही नायक और नायिका परस्पर राग (कामोद्रेक) को उत्पन्न करते
हैं। यही कारण है कि कामकलानिपुण गणिका और क्रियाविदग्ध कामी, दोनों एक-दूसरे की
कामना करते हैं। जब शस्त्रकर्म से सम्बद्ध धनुर्वेद आदि शास्त्रों में भी शस्त्रसञ्चालन का वैचित्र्य
अपेक्षित रहता है, तब कामशास्त्र में, जिसका उद्देश्य ही नवीनता और सरसता से प्रेम और काम
की अभिवृद्धि करना है, कलानैपुण्य और क्रियावैचित्र्य का महत्त्व क्यों न अपेक्षित हो—ऐसा
महर्षि वात्स्यायन का मत है ॥ २५ ॥
न तु परपरिगृहीतास्वेवं कुर्यात्। प्रच्छन्नेषु प्रदेशेषु तासामनुस्मरणार्थं
रागवर्धनाच्च विशेषान् दर्शयेत् ॥ २६ ॥
चौर्यरति में क्षत-निषेध—परकीया नायिका में नखक्षत-दन्तक्षत आदि का प्रयोग नहीं
करना चाहिये। स्मृति एवं अनुरागवर्धन के लिए केवल गुह्यस्थानों पर नखक्षत बना देने चाहिये,
अन्यत्र नहीं ॥ २६ ॥
नखक्षतानि पश्यन्त्या गूढस्थानेषु योषितः।
चिरोत्सृष्टाप्यभिनवा प्रीतिर्भवति पेशला ॥ २७ ॥
नखक्षतों की प्रशंसा—गुह्यस्थानों में नखक्षतों को देखकर तरुणी की त्यागी हुई पुरातन
प्रीति भी सहज रूप में नवीन हो जाती है ॥ २७ ॥
२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ४७
चिरोत्सृष्टेषु रागेषु प्रीतिर्गच्छेत् पराभवम् ।
रागायतनसंस्मारि यदि न स्यान्नखक्षतम् ॥ २८ ॥
यदि नायिका के शरीर पर राग के आश्रय (रूप, गुण, यौवन आदि) का स्मरण कराने
वाले नखक्षत न हों, तो त्यागी हुई पुरातन प्रीति धीरे धीरे नष्ट हो जाती है ॥ २८ ॥
पश्यतो युवतिं दूरान्नखोच्छिष्टपयोधराम् ।
बहुमानः परस्यापि रागयोगश्च जायते ॥ २९ ॥
नखों से चिह्नित स्तनों वाली तरुणी को दूर से ही देखकर अपरिचित पुरुष में भी उसके
प्रति सम्मान और अनुराग उत्पन्न हो जाता है ॥ २९ ॥
पुरुषश्च प्रदेशेषु नखचिह्नैर्विचिह्नितः ।
चित्तं स्थिरमपि प्रायश्चलयत्येव योषितः ॥ ३० ॥
इसी प्रकार यदि पुरुष के विभिन्न अङ्गों में नायिका के नखक्षत अंकित हों, तो स्त्रियों का
स्थिर मन भी प्रायः चलायमान हो जाता है ॥ ३० ॥
नान्यत् पटुतरं किञ्चिदस्ति रागविवर्धनम् ।
नखदन्तसमुत्थानां कर्मणां गतयो यथा ॥ ३१ ॥
पुरुष और स्त्री की कामवासना की वृद्धि में नखक्षत और दन्तक्षत जितने सहायक होते हैं,
उतनी अन्य कोई उपक्रिया नहीं ॥ ३१ ॥
नखक्षतादिप्रकरण नामक चतुर्थ अध्याय सम्पन्न ॥
पञ्चम अध्याय
दशनक्षतविधिप्रकरण
उत्तरौष्ठमन्तर्मुखं नयनमिति मुक्त्वा चुम्बनवद् दशनरदनस्थानानि ॥ १ ॥
दन्तक्षत के स्थान—ऊपर का ओष्ठ, अन्तर्मुख (मुख का आन्तरिक भाग, तालु आदि)
और नेत्र—इनके अतिरिक्त शेष सभी स्थान, जो चुम्बन के लिये बताये गये हैं, दन्तक्षत के भी
स्थान हैं ॥ १ ॥
समाः स्निग्धच्छाया रागग्राहिणी युक्तप्रमाणा निश्छिद्रास्तीक्ष्णाग्रा इति
दशनगुणाः ॥ २ ॥
दाँतों के गुण—अच्छे दाँतों के गुण ये हैं—दाँत ऊँचे-नीचे न होकर समतल होने
चाहियें, साफ और चमकीले होने चाहियें, पान आदि की लालिमा को शीघ्र ही पकड़ने वाले
होने चाहियें, बहुत पतले और बहुत मोटे न होकर सुन्दर आकार के होने चाहियें, परस्पर सटे
हुए और नुकीले होने चाहियें ॥ २ ॥
कुण्ठा राज्युद्गताः परुषाः विषमाः श्लक्ष्णाः पृथवो विरला इति च
दोषाः ॥ ३ ॥
४८ वात्स्यायन-कामसूत्र
दाँतों के दोष—कुण्ठित (अतीक्ष्ण या भोथरे) हों; तीक्ष्ण न हों, दन्तपंक्ति से बाहर
निकले हुए हों, स्वाभाविक चमक से रहित हों, या रूक्ष हो, ऊँचे नीचे या खुरदुरे हों, बहुत पतले
या बहुत मोटे हों, और विरल हों ॥ ३ ॥
गूढकमुच्छूनकं बिन्दुबिन्दुमाला प्रवालमणिर्मणिमाला खण्डाभ्रकं वराह-
चर्वितकमिति दशनच्छेदनविकल्पाः ॥ ४ ॥
दन्तक्षत के आठ भेद—गूढ़क, उच्छूनक, बिन्दु, बिन्दुमाला, प्रवालमणि, मणिमाला,
खण्डाभ्रक और वराहचर्वितक ॥ ४ ॥
नातिलोहितेन रागमात्रेण विभावनीयं गूढकम् ॥ ५ ॥
गूढ़क—जब अधर को इस प्रकार कोमलतापूर्वक दबाया जाये कि ओष्ठ में चिह्न न बने,
मात्र हल्की सी लालिमा ही आये, तो उसे गूढ़क कहते हैं ॥ ५ ॥
तदेव पीडनादुच्छूनकम् ॥ ६ ॥
उच्छूनक—जब गूढ़क कुछ दबाकर सम्पादित किया जाये, तो यह दन्तक्षत उच्छूनक
कहलाता है ॥ ६ ॥
तदुभयं बिन्दुरधरमध्य इति ॥ ७ ॥
गूढ़क, उच्छूनक और बिन्दु का स्थान—गूढ़क, उच्छूनक और बिन्दु—ये तीनों
दन्तक्षत अधर के मध्य में ही किये जाते हैं ॥ ७ ॥
उच्छूनकं प्रवालमणिश्च कपोले ॥ ८ ॥
उच्छूनक और प्रवालमणि का स्थान—उच्छूनक और प्रवालमणि दन्तक्षत कपोल पर
किये जाते हैं ॥ ८ ॥
कर्णपूरचुम्बनं नखदशनच्छेद्यमिति सव्यकपोलमण्डनानि ॥ ९ ॥
कर्णपूर (कर्णफूल या कर्णाभरण), चुम्बन, नखक्षत और दन्तक्षत—ये सब बायें कपोल
के भूषण हैं। अर्थात् इन्हें नायिका के बायें कपोल पर ही सम्पादित करना चाहिये ॥ ९ ॥
दन्तौष्ठसंयोगाभ्यासनिष्पादनात् प्रवालमणिसिद्धिः ॥ १० ॥
प्रवालमणि—ऊपर के दाँत और अधर से बार-बार एक ही स्थान को दबाते रहने से
प्रवालमणि दन्तक्षत होता है ॥ १० ॥
सर्वस्येयं मणिमालायाश्च ॥ ११ ॥
मणिमाला—एक ही स्थान पर कई प्रवालमणि बनाना मणिमाला कहलाता है ॥ ११ ॥
अल्पदेशायाश्च त्वचो दशनद्वयसंदंशजा बिन्दुसिद्धिः ॥ १२ ॥
बिन्दु—ऊपर और नीचे के दो दाँतों की नोंक से दबाने पर तिलभर चिह्न बना देना बिन्दु
कहलाता है ॥ १२ ॥
सर्वैर्बिन्दुमालायाश्च ॥ १३ ॥
बिन्दुमाला—एक ही स्थान पर सब दाँतों से बने अनेक बिन्दुओं को (माला के समान
आकार होने के कारण) बिन्दुमाला कहते हैं ॥ १३ ॥
तस्मान्मालाद्वयमपि गलकक्षवंक्षणप्रदेशेषु ॥ १४ ॥