वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ३५
विद्यासमुद्देश प्रकरण में गीत आदि चौंसठ कलाएँ कही गयी हैं, और पाञ्चाल चौंसठ
कामकलाओं की विवेचना करते हैं, ये दोनों ही कलाएँ सम्प्रयोग का अङ्ग बनती हैं, अतः
'चतुःषष्टि' शब्द न केवल कलाओं, अपितु कामशास्त्र और उसके प्रयोजन सम्प्रयोग के लिये
भी प्रयुक्त होता है। जिस प्रकार 'ऋग्वेद' में दस मण्डल होने के कारण, उसे 'दशतयी' भी कहा
जाता है, उसी प्रकार सम्प्रयोग में दस अध्याय होने से, उसे भी 'दशतयी' कहा जाता है; क्योंकि
'दशतयी' का वैसा ही अर्थ यहाँ भी है। क्योंकि साम्प्रयोगिक अधिकरण के स्वतन्त्र व्याख्याता
बाभ्रव्य ने ही 'ऋग्वेद' को चौंसठ अध्यायों में विभक्त किया था, अतएव ग्रन्थकार के प्रति
अनुराग और महत्त्व प्रकट करने के लिये ही कामशास्त्र को भी चौंसठ अङ्गों वाला कहा जाने
लगा—ऐसा भी कई आचार्यों का मत है ॥ ३ ॥
आलिङ्गनचुम्बननखच्छेददशनच्छेद्यसंवेशनसीत्कृतपुरुषाायितौपरिष्टिकानाम्
अष्टानाामष्टधा विकल्पभेदादष्टावष्टकाश्रतःषष्टिरिति बाभ्रतीगाः ॥ ४ ॥
चतुःषष्टि का स्वरूप— १. आलिङ्गन, २. चुम्बन, ३. नखक्षत, ४. दन्तक्षत, ५. संवेशन,
६. सीत्कार, ७. पुरुषायित (विपरीत रति) और ८. औपरिष्टक (मुखमैथुन)—इन आठ अङ्गों
के आठ आठ भेद होने के कारण, सम्प्रयोग के कुल चौंसठ भेद हो जाते हैं—यह आचार्य
बाभ्रव्य के अनुयायियों (शिष्यों) का मत है ॥ ४ ॥
विकल्पवर्गाणामष्टानां न्यूनाधिकत्वदर्शनात् प्रहणनविरुतपुरुषोपसृप्तचित्र-
रतादीनामन्येषामपि वर्गाणामिह प्रवेशनात् प्रायोवादोऽयम्। यथा सप्तपर्णो वृक्षः
पञ्चवर्णो बलिरिति वात्स्यायनः ॥ ५ ॥
वात्स्यायन द्वारा खण्डन—क्योंकि आलिङ्गनादिकों में प्रत्येक के आठ-आठ भेद नहीं
होते, किसी के कम होते हैं और किसी के अधिक, तथा इनके अतिरिक्त प्रहणन, विरुत,
पुरुषोपसृप्त और चित्ररत आदि अन्य वर्गों का भी साम्प्रयोगिक अधिकरण में प्रवेश देखा जाता
है, अतः बाभ्रव्य के अनुयायियों का उक्त कथन प्रायोवादमात्र है। सम्प्रयोग को चौंसठ अङ्ग वाला
मानना वैसा ही प्रायोवाद है, जैसे सप्तपर्ण (सप्तपत्र) कह देने से छतिवन वृक्ष को सात पत्तों
वाला एवं पंचवर्ण कह देने से बलि को पाँच रंगों वाला मानना—ऐसा आचार्य वात्स्यायन का
मत है। तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार सप्तपर्ण नाम होने से छतिवन सात-सात पत्तों वाला और
पंचवर्ण नाम होने से बलि पाँच वर्ण वाली नहीं हो जाती, उसी प्रकार 'चतुःषष्टि' नाम रखे जाने
से सम्प्रयोग चौंसठ अङ्गों वाला नहीं हो जाता ॥ ५ ॥
तत्रासमागतयोः प्रीतिलिङ्गद्योतनार्थमालिङ्गनचतुष्टयम्। स्पृष्टकम्, विद्धकम्,
उद्घृष्टकम्, पीडितकम् इति ॥ ६ ॥
जो प्रेमपात्र पहले मिले नहीं हैं, उनमें परस्पर अनुराग को द्योतित करने के लिये चार
प्रकार के आलिङ्गन होते हैं—(१) स्पृष्टक, (२) विद्धक, (३) उद्घृष्टक और
(४) पीड़ितक ॥ ६ ॥
सर्वत्र संज्ञार्थेनैव कर्मातिदेशः ॥ ७ ॥
स्पृष्टक, विद्धक आदि शब्द ही अपने अभिधेय कर्म को व्यक्त कर देते हैं। अर्थात् इन