वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३० वात्स्यायन-कामसूत्र
सातत्याद्युवतिरारम्भात्प्रभृति भावमधिगच्छति । पुरुषः पुनरन्त एव । एतदुप-
पन्नतरम्। नह्यसत्यां भावप्राप्तौ गर्भसम्भव इति बाभ्रवीयाः ॥ १८ ॥
बाभ्रव्य का मत—समागम में स्त्री प्रारम्भ से ही निरन्तर स्खलन-सुख को प्राप्त करती
रहती हैं और पुरुष स्खलन-सुख को अन्त में ही प्राप्त करता है। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि
स्खलन के बिना कदापि गर्भ स्थिर नहीं हो सकता—ऐसा आचार्य बाभ्रव्य के अनुयायियों का
मत है ॥ १८ ॥
अत्रापि तावेवाशङ्कापरिहारौ भूयः ॥ १९ ॥
पुरुषवत् स्खलन मानने वालों की शंका और समाधान—आचार्य बाभ्रव्य के मत में
भी वही शङ्काएँ उठती हैं जो आचार्य श्वेतकेतु के मत में उठायी गयी हैं, और उनका समाधान भी
पूर्ववत् ही समझ लेना चाहिये ॥ १९ ॥
तत्रैतत्स्यात्—सातत्येन रसप्राप्तावारम्भकाले मध्यस्थचित्तता नातिसहिष्णुता
च । ततः क्रमेणाधिको रागयोगः, शरीरे निरपेक्षत्वम्, अन्ते च विरामाभीप्सेत्ये-
तदुपपन्नमिति ॥ २० ॥
बाभ्रव्य के मत पर शङ्का—इस पर यह शङ्का होती है कि यदि स्त्री समागम के प्रारम्भ
से ही निरन्तर स्खलित होती रहती है, तो क्या कारण है कि प्रारम्भ में वह शान्त और निश्चेष्ट
रहती है, नखक्षत, दन्तक्षत, कुचमर्दन आदि प्रयोगों का निषेध करती है, परन्तु ज्यों ज्यों राग
बढ़ता जाता है, वह शरीर से निरपेक्ष होती है, अर्थात् रागाधिक्य में नखक्षत, दन्तक्षत, कुचमर्दन
आदि प्रयोगों के प्रति सहिष्णु हो जाती है, और अन्त में विराम की इच्छा करती है। यदि स्त्री
प्रारम्भ से अन्त तक निरन्तर स्खलित होती रहती है, तो यह अवस्था-भेद नहीं बन सकता
॥ २० ॥
तच्च न। सामान्येऽपि भ्रान्तिसंस्कारे कुलालचक्रस्य भ्रमरकस्य वा भ्रान्तावेव
वर्तमानस्य प्रारम्भे मन्दवेगता ततश्च क्रमेण पूर्णं वेगस्येत्युपपद्यते । धातुक्षयाच्च
विरामाभीप्सेति। तस्मादनाक्षेपः ॥ २१ ॥
बाभ्रव्य का समाधान—ऐसी शङ्का करना ठीक नहीं है। सामान्यतः घूमने वाले कुम्हार
के चाक (चक्र) या लट्टू (भ्रमरक) में घूमने की क्रिया निरन्तर विद्यमान रहने पर भी वे प्रारम्भ
में मन्दवेग से घूमते हैं। बाद में क्रमशः उनका बेग बढ़ता है, और अन्त में वेग बन्द हो जाता है।
इसी प्रकार स्त्री का स्खलन भी प्रारम्भ में मन्द रहता है, तदुपरान्त वह क्रमशः बढ़ता है, और
च्युत हुए रज के पूर्णतः झड़ जाने पर वह समागम से विराम चाहती है। इसमें शङ्का के लिये कोई
अवकाश नहीं है ॥ २१ ॥
सुरतान्ते सुखं पुंसां स्त्रीणां तु सततं सुखम्।
धातुक्षयनिमित्ता च विरामेच्छोपजायते ॥ २२ ॥
बाभ्रव्य का सार-संक्षेप—पुरुष को स्खलन-सुख समागम के अन्त में ही प्राप्त होता है
किन्तु स्त्रियों को वह सुखानुभूति प्रारम्भ से अन्त तक होती रहती है, और स्थान से च्युत हुए
सम्पूर्ण धातु (रज) के झड़ जाने पर समागम से विराम की इच्छा होती है ॥ २२ ॥