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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 69, कुल 248 में से

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पृष्ठ 69

२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ४३
संक्रान्तकचुम्बन—बालक, चित्र और प्रतिमा के चुम्बन और आलिङ्गन के बहाने
अपना प्रेम-प्रदर्शित करना चाहिये—यह संक्रान्तकचुम्बन या आलिङ्गन कहलाता है ॥ २९ ॥
तथा निशि प्रेक्षणके स्वजनसमाजे वा समीपे गतस्य प्रयोज्याया हस्ताङ्गुलि-
चुम्बनं संविष्टस्य वा पादाङ्गुलिचुम्बनम् ॥ ३० ॥
अङ्गुलिचुम्बन—रात्रि में होने वाले खेल-तमाशे या स्वजन सम्बन्धियों के मध्य
आयोजित कार्यक्रम में, समीप में आये या साथ-साथ होने पर नायक या नायिका के हाथ की
अंगुलि को और सोते हुए के पैर की अंगुलि का चुम्बन कर प्रेम प्रदर्शित करना चाहिये—इसे
ही अंगुलिचुम्बन कहा जाता है ॥ ३० ॥
संवाहिकायास्तु नायकमाकारयन्त्या निद्रावशादकामाया इव तस्योर्वोर्वदनस्य
निधानमूरूचुम्बनं चेत्याभियोगिकानि ॥ ३१ ॥
संवाहिका की प्रेमाभिव्यक्ति—यदि संवाहिका (हाथ-पैर दबाने वाली स्त्री) नायक से
प्रेम करती हो, तो अपना प्रेम प्रदर्शित करने के लिये निद्रा के बहाने, उसकी जाँघ पर अपना सिर
रख दे और फिर उसे चूम ले—यह सब मिलन के उपाय हैं ॥ ३१ ॥
भवति चात्र श्लोकः—
कृते प्रतिकृतं कुर्यात् ताडिते प्रतिताडितम्।
करणेन च तेनैव चुम्बिते प्रतिचुम्बितम्॥ ३२॥
इस विषय में एक आनुवंश्य श्लोक है—
समागम के समय रागभाव उद्दीप्त करने के लिये नायक जो भी करे, नायिका को वही
करना चाहिये। यदि नायक हस्तप्रहार करे, तो नायिका को भी उसी प्रकार हस्तप्रहार करना
चाहिये, नायक जिस रीति से चुम्बन करे, नायिका को भी उसी रीति से चुम्बन करना
चाहिये ॥ ३२ ॥
चुम्बनादिविकल्पप्रकरण नामक तृतीय अध्याय सम्पन्न॥
●
चतुर्थ अध्याय
नखक्षत आदि प्रकरण
रागवृद्धौ सङ्घर्षात्मकं नखविलेखनम् ॥ १ ॥
नखक्षत का स्वरूप—नायक-नायिका में राग बढ़ जाने पर परस्पर संघर्षात्मक रूप में
नखक्षत किये जाते हैं ॥ १ ॥
तस्य प्रथमसमागमे प्रवासप्रत्यागमने प्रवासगमने क्रुद्धप्रसन्नायां मत्तायां च
प्रयोगः। न नित्यमचण्डवेगयोः ॥ २ ॥
समय और स्थान—प्रथम समागम में, प्रवास से लौटने पर, प्रवास पर जाते समय,
मानवती नायिका के प्रसन्न होने पर और नायिका के काम या मद से उन्मत्त होने पर नखक्षतों का
काम० ५