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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 72, कुल 248 में से

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पृष्ठ 72

४६ वात्स्यायन-कामसूत्र
उत्पलपत्रक—स्तनों एवं कमर में नखों से अङ्कित कमल की आकृति का चिह्न उत्पल-
पत्रक कहलाता है ॥ २१ ॥
ऊर्वोः स्तनपृष्ठे च प्रवासं गच्छतः स्मरणीयकं संहताश्चतस्रस्तिस्रो वा लेखाः।
इति नखकर्माणि ॥ २२ ॥
स्मरणीयक—प्रवास जाते समय पुरुष, स्त्री के स्तनों और जाँघों पर स्मृति के लिये
मिली हुई तीन या चार रेखाएँ खींच देते हैं। स्मृति के लिये होने के कारण ये स्मरणीयक
कहलाते हैं। नखक्षत के भेद समाप्त हुए ॥ २२ ॥
आकृतिविकारयुक्तानि चान्यान्यपि कुर्वीत ॥ २३ ॥
इनके अतिरिक्त अन्य वस्तुओं की आकृति के चिह्न भी बनाने चाहिये ॥ २३ ॥
विकल्पानामनन्तत्वादानन्त्याच्च कौशलविधेरभ्यासस्य च सर्वगामित्वाद्-
रागात्मकत्वाच्छेद्यस्य प्रकारान् कोऽभिसमीक्षितुमर्हतीत्याचार्याः ॥ २४ ॥
भेद और कौशल की अनन्तता—नखक्षत के भेद अनन्त हैं, कौशल की भी कोई सीमा
नहीं है, और यह व्यक्ति के अभ्यास पर निर्भर करता है, फलतः उसे सभी स्थलों पर और सभी
प्रकार के नखक्षत करने का अभ्यास होना चाहिये। क्योंकि कामातुर होकर ही नायक नखक्षतों
का प्रयोग करता है, अतः उसके समस्त भेदों की समीक्षा (विवेचना) कौन कर सकता है—
ऐसा कामशास्त्र के आचार्यों का मत है ॥ २४ ॥
भवति हि रागेऽपि चित्रापेक्षा। वैचित्र्याच्च परस्परं रागो जनयितव्यः।
वैचक्षण्ययुक्ताश्च गणिकास्तत्कामिनश्च परस्परं प्रार्थनीया भवन्ति। धनुर्वेदादिष्वपि
हि शस्त्रकर्मशास्त्रेषु वैचित्र्यमेवापेक्ष्यते किं पुनरिहेति वात्स्यायनः ॥ २५ ॥
वात्स्यायन का मत—सामान्य अवस्था में ही नहीं, रागावस्था में भी वैचित्र्य की अपेक्षा
रहती है, क्योंकि वैचित्र्य से ही नायक और नायिका परस्पर राग (कामोद्रेक) को उत्पन्न करते
हैं। यही कारण है कि कामकलानिपुण गणिका और क्रियाविदग्ध कामी, दोनों एक-दूसरे की
कामना करते हैं। जब शस्त्रकर्म से सम्बद्ध धनुर्वेद आदि शास्त्रों में भी शस्त्रसञ्चालन का वैचित्र्य
अपेक्षित रहता है, तब कामशास्त्र में, जिसका उद्देश्य ही नवीनता और सरसता से प्रेम और काम
की अभिवृद्धि करना है, कलानैपुण्य और क्रियावैचित्र्य का महत्त्व क्यों न अपेक्षित हो—ऐसा
महर्षि वात्स्यायन का मत है ॥ २५ ॥
न तु परपरिगृहीतास्वेवं कुर्यात्। प्रच्छन्नेषु प्रदेशेषु तासामनुस्मरणार्थं
रागवर्धनाच्च विशेषान् दर्शयेत् ॥ २६ ॥
चौर्यरति में क्षत-निषेध—परकीया नायिका में नखक्षत-दन्तक्षत आदि का प्रयोग नहीं
करना चाहिये। स्मृति एवं अनुरागवर्धन के लिए केवल गुह्यस्थानों पर नखक्षत बना देने चाहिये,
अन्यत्र नहीं ॥ २६ ॥
नखक्षतानि पश्यन्त्या गूढस्थानेषु योषितः।
चिरोत्सृष्टाप्यभिनवा प्रीतिर्भवति पेशला ॥ २७ ॥
नखक्षतों की प्रशंसा—गुह्यस्थानों में नखक्षतों को देखकर तरुणी की त्यागी हुई पुरातन
प्रीति भी सहज रूप में नवीन हो जाती है ॥ २७ ॥