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सर्वकोश
वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 73, कुल 248 में से

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पृष्ठ 73

२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ४७
चिरोत्सृष्टेषु रागेषु प्रीतिर्गच्छेत् पराभवम् ।
रागायतनसंस्मारि यदि न स्यान्नखक्षतम् ॥ २८ ॥
यदि नायिका के शरीर पर राग के आश्रय (रूप, गुण, यौवन आदि) का स्मरण कराने
वाले नखक्षत न हों, तो त्यागी हुई पुरातन प्रीति धीरे धीरे नष्ट हो जाती है ॥ २८ ॥
पश्यतो युवतिं दूरान्नखोच्छिष्टपयोधराम् ।
बहुमानः परस्यापि रागयोगश्च जायते ॥ २९ ॥
नखों से चिह्नित स्तनों वाली तरुणी को दूर से ही देखकर अपरिचित पुरुष में भी उसके
प्रति सम्मान और अनुराग उत्पन्न हो जाता है ॥ २९ ॥
पुरुषश्च प्रदेशेषु नखचिह्नैर्विचिह्नितः ।
चित्तं स्थिरमपि प्रायश्चलयत्येव योषितः ॥ ३० ॥
इसी प्रकार यदि पुरुष के विभिन्न अङ्गों में नायिका के नखक्षत अंकित हों, तो स्त्रियों का
स्थिर मन भी प्रायः चलायमान हो जाता है ॥ ३० ॥
नान्यत् पटुतरं किञ्चिदस्ति रागविवर्धनम् ।
नखदन्तसमुत्थानां कर्मणां गतयो यथा ॥ ३१ ॥
पुरुष और स्त्री की कामवासना की वृद्धि में नखक्षत और दन्तक्षत जितने सहायक होते हैं,
उतनी अन्य कोई उपक्रिया नहीं ॥ ३१ ॥
नखक्षतादिप्रकरण नामक चतुर्थ अध्याय सम्पन्न ॥
पञ्चम अध्याय
दशनक्षतविधिप्रकरण
उत्तरौष्ठमन्तर्मुखं नयनमिति मुक्त्वा चुम्बनवद् दशनरदनस्थानानि ॥ १ ॥
दन्तक्षत के स्थान—ऊपर का ओष्ठ, अन्तर्मुख (मुख का आन्तरिक भाग, तालु आदि)
और नेत्र—इनके अतिरिक्त शेष सभी स्थान, जो चुम्बन के लिये बताये गये हैं, दन्तक्षत के भी
स्थान हैं ॥ १ ॥
समाः स्निग्धच्छाया रागग्राहिणी युक्तप्रमाणा निश्छिद्रास्तीक्ष्णाग्रा इति
दशनगुणाः ॥ २ ॥
दाँतों के गुण—अच्छे दाँतों के गुण ये हैं—दाँत ऊँचे-नीचे न होकर समतल होने
चाहियें, साफ और चमकीले होने चाहियें, पान आदि की लालिमा को शीघ्र ही पकड़ने वाले
होने चाहियें, बहुत पतले और बहुत मोटे न होकर सुन्दर आकार के होने चाहियें, परस्पर सटे
हुए और नुकीले होने चाहियें ॥ २ ॥
कुण्ठा राज्युद्गताः परुषाः विषमाः श्लक्ष्णाः पृथवो विरला इति च
दोषाः ॥ ३ ॥