वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८ वात्स्यायन-कामसूत्र
आचार्य सुवर्णनाभ के मत से आलिङ्गन के चार अन्य भेद अधिक हैं, जिनमें पुरुष के
किसी एक अङ्ग का स्त्री के उसी अङ्ग द्वारा आलिङ्गन किया जाता है ॥ २२ ॥
तत्रोरुसन्दंशेनैकमूरूमूरुद्वयं वा सर्वप्राणं पीडयेदित्यूरूपगूहनम् ॥ २३ ॥
ऊरूपगूहन—जब एक-दूसरे की ओर मुख करके करवट के बल लेटे हुए नायक या
नायिका एक-दूसरे की एक या दोनों जाँघों को अपनी जाँघों में लेकर सँड़सी की तरह पूरी शक्ति
से दबायें, तो ऊरूपगूहन आलिङ्गन होता है ॥ २३ ॥
जघनेन जघनमवपीड्य प्रकीर्यमाणकेशहस्ता नखदशनप्रहरणचुम्बनप्रयोज-
नाय तदुपरि लङ्घयेत् तज्जघनोपगूहनम् ॥ २४ ॥
जघनोपगूहन—अपने बिखरे हुए बालों को हाथ में लिये हुए नायिका, नायक के
जघनस्थल को अपने जघनस्थल से दबाती हुई नखक्षत, दन्तक्षत और प्रहरण के उद्देश्य से
उसके ऊपर लेट जाये, तो जघनोपगूहन आलिङ्गन होता है ॥ २४ ॥
स्तनाभ्यामुरः प्रविश्य तत्रैव भारमारोपयेदिति स्तनालिङ्गनम् ॥ २५ ॥
स्तनालिङ्गन—जब नायिका अपने वक्ष को पुरुष के वक्ष पर झुकाकर स्तनों का भार
उसके ऊपर रख दे और दृढ़ आलिङ्गन करे, तो उसे स्तनालिङ्गन कहते हैं ॥ २५ ॥
मुखे मुखमासज्ज्याक्षिणी अक्ष्णोर्ललाटेन ललाटमाहन्यात् सा
ललाटिका ॥ २६ ॥
ललाटिका—मुख के सामने मुख करके और आँखों में आँखें मिलाकर मस्तक से
मस्तक को दबाये—इस आलिङ्गन को ललाटिका कहते हैं ॥ २६ ॥
संवाहनमप्युपगूहनप्रकारमित्येके मन्यन्ते। संस्पर्शत्वात् ॥ २७ ॥
कुछ आचार्य संवाहन (मुट्ठियों से अङ्ग दबाना) को भी आलिङ्गन मानते हैं, क्योंकि
इसमें भी स्पर्श-सुख होता है ॥ २७ ॥
पृथक्कालत्वाद्भिन्त्रप्रयोजनत्वादसाधारणत्वान्नेति वात्स्यायनः ॥ २८ ॥
क्योंकि संवाहन का समय आलिङ्गन (सम्भोग) काल से भिन्न है, उसका प्रयोजन थकान
दूर करना है, रतिसुख देना नहीं, और संवाहन का सुख एक को मिलता है जबकि आलिङ्गन का
नायक-नायिका दोनों को, फलतः संवाहन को आलिङ्गनप्रकार नहीं माना जा सकता—
ऐसा आचार्य वात्स्यायन का मत है ॥ २८ ॥
पृच्छतां शृण्वतां वापि तथा कथयतामपि ।
उपगूहविधिं कृत्स्नं रिरंसा जायते नृणाम् ॥ २९ ॥
आलिङ्गन का महत्त्व—आलिङ्गन की विधि को पूछते, सुनते और कहते हुए ही मनुष्य
की रमण की इच्छा जाग्रत हो जाती है ॥ २९ ॥
येऽपि ह्यशास्त्रिताः केचित् संयोगा रागवर्धनाः ।
आदरेणैव तेऽप्यत्र प्रयोज्याः साम्प्रयोगिकाः ॥ ३० ॥
अशास्त्रीय योग—जो योग शास्त्र में न कहे गये हों, लेकिन रागवर्धक और कामोत्तेजक
हों, सम्भोग के समय उनका भी आदरपूर्वक प्रयोग करना चाहिये ॥ ३० ॥