वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ३९
शास्त्राणां विषयस्तावद्यावन्मन्दरसा नराः ।
रतिचक्रे प्रवृत्ते तु नैव शास्त्रं न च क्रमः ॥ ३१ ॥
अशास्त्रीय योगों के उपयोग का कारण—मनुष्य को शास्त्र का ज्ञान तभी तक रहता
है, जब तक राग-मन्द रहता है। राग के प्रचण्ड होनेपर तो मनुष्य कामान्ध हो उठता है और तब
उसे न शास्त्र के ज्ञान का ध्यान रहता है और न उसमें कथित आलिङ्गन, चुम्बन आदि के क्रम
का ही ॥ ३१ ॥
आलिङ्गनविचारप्रकरण नामक द्वितीय अध्याय सम्पन्न ॥
तृतीय अध्याय
चुम्बनादिविकल्पप्रकरण
चुम्बननखदशनच्छेद्यानां न पौर्वापर्यमस्ति। रागयोगात् प्राक्संयोगादेषां
प्राधान्येन प्रयोगः। प्रहणनसीत्कृतयोश्च सम्प्रयोगे ॥ १ ॥
चुम्बन, नखक्षत, दन्तक्षत—इन तीनों में पूर्व और अपर का क्रम नहीं है, क्योंकि ये तीनों
ही उपक्रियाएँ राग के योग से होती हैं। प्रायः समागम से पूर्व काम को उत्तेजित करने के निमित्त
इनका प्रयोग होता है। समागम के समय तो केवल प्रहणन और सीत्कार का ही प्रयोग
होता है ॥ १ ॥
सर्वं सर्वत्र। रागस्यानपेक्षितत्वात्। इति वात्स्यायनः ॥ २ ॥
चुम्बन आदि सभी उपक्रियाओं का प्रयोग शिश्नप्रवेश के पहले और बाद में सर्वत्र किया
जा सकता है, क्योंकि इनके प्रयोग में नायक-नायिका दोनों के राग की अपेक्षा नहीं है—यह
आचार्य वात्स्यायन का मत है ॥ २ ॥
तानि प्रथमरते नातिव्यक्तानि विश्रब्धिकायां विकल्पेन च प्रयुञ्जीत।
तथाभूतत्वाद्रागस्य। ततः परमतित्वरया विशेषवत्समुच्चयेन रागसंधुक्षणार्थम् ॥ ३ ॥
प्रथम समागम में चुम्बन आदि का एक साथ और अतिव्यक्त प्रयोग नहीं करना चाहिये
और कुछ विश्रब्ध नायिका में इनका वैकल्पिक प्रयोग करना चाहिये, क्योंकि राग की यही रीति
है। नायिका के पूर्ण विश्रब्ध हो जाने पर—राग और रति के बढ़ जाने पर—राग को प्रदीप्त करने *
(भड़काने) के लिये इनका शीघ्रतापूर्वक और एक साथ प्रयोग करना चाहिये ॥ ३ ॥
ललाटालककपोलनयनवक्षःस्तनोष्ठान्तर्मुखेषु चुम्बनम् ॥ ४ ॥
मस्तक, केश, कपोल, नेत्र, वक्ष, स्तन, ओष्ठ और मुख का आन्तरिक भाग—ये चुम्बन के
स्थान हैं ॥ ४ ॥
ऊरुसन्धिबाहुनाभिमूलयोर्लाटानाम् ॥ ५ ॥
लाटवासियों की रीति—लाट देश के निवासी योनि के ओष्ठों, जाँघों के सन्धिस्थल
और काँख का भी चुम्बन करते हैं ॥ ५ ॥