वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ३३
प्रथमरते चण्डवेगता शीघ्रकालता च पुरुषस्य, तद्विपरीतमुत्तरेषु। योषितः
पुनरेतदेव विपरीतम्। आ धातुक्षयात्॥ ३५॥
प्रथम समागम में पुरुष चण्डवेग होता है, फलतः शीघ्र स्खलित हो जाता है, किन्तु उसी
समय पुनः मैथुन करने पर पुरुष मन्दवेग हो जाता है, फलतः देर से स्खलित होता है। स्त्रियों की
प्रवृत्ति इसके विपरीत होती है। अर्थात् प्रथम समागम में मन्दवेग होती हैं, फलतः देर से स्खलित
होती हैं, लेकिन उसी समय पुनः मैथुन करने पर वे चण्डवेग होने से शीघ्र स्खलित हो जाती हैं।
यह अपने स्थान से च्युत धातु (रज और वीर्य) के क्षय होने तक रहता है॥ ३५॥
प्राक् च स्त्रीधातुक्षयात् पुरुषधातुक्षय इति प्रायोवादः॥ ३६॥
समागम में पुरुष स्त्री से पहले ही स्खलित हो जाता है—यह प्रायः देखा जाता है॥ ३६॥
मृदुत्वादुपमृद्यत्वान्निसर्गाच्चैव योषितः।
प्राप्नुवन्त्याशु ताः प्रीतिमित्याचार्या व्यवस्थिताः॥ ३७॥
जो स्त्रियाँ स्वभावतः कोमलाङ्गी हैं और जो किञ्चित् कठोर अङ्गों वाली, फलतः
आलिङ्गन, चुम्बन, कुचमर्दन आदि बाह्य उपचारों से उपमर्दन करने योग्य हैं, वे सभी समुचित
रीति से समागम करने पर शीघ्र ही रतिसुख प्राप्त कर लेती हैं—ऐसा कामशास्त्र के आचार्यों का
मत है॥ ३७॥
एतावदेव युक्तानां व्याख्यातं साम्प्रयोगिकम्।
मन्दानामवबोधार्थं विस्तरोऽतः प्रवक्ष्यते॥ ३८॥
स्त्री-पुरुष के समागम के विषय में, विद्वानों के लिए, इतना विवेचन ही पर्याप्त है।
मन्दबुद्धि व्यक्तियों को समझाने के लिये अब इसे विस्तार से कहेंगे॥ ३८॥
अभ्यासादभिमानाच्च तथा सम्प्रत्ययादपि।
विषयेभ्यश्च तन्त्रज्ञाः प्रीतिमाहुश्चतुर्विधाम्॥ ३९॥
प्रीति के भेद—कामशास्त्र के आचार्यों का मत है कि प्रीति चार प्रकार की होती है—
१. आभ्यासिकी—निन्तर कर्मों के अभ्यास से उत्पन्न, २. आभिमानिकी—सङ्कल्पमात्र से
उत्पन्न, ३. सम्प्रत्ययात्मिका—विश्वास से उत्पन्न, और ४. विषयात्मिका—विषयों से
उत्पन्न॥ ३९॥
शब्दादिभ्यो बहिर्भूता या कर्माभ्यासलक्षणा।
प्रीतिः साभ्यासिकी ज्ञेया मृगयादिषु कर्मसु॥ ४०॥
१. आभ्यासिकी प्रीति—शब्दादिक के अतिरिक्त कर्मों में निरन्तर लगे रहने से जो प्रीति
उत्पन्न होती है, वह अभ्यास से बढ़ने के कारण आभ्यासिकी कहलाती है, जैसे मृगया (शिकार)
आदि कर्मों में देखी जाती है॥ ४०॥
अनभ्यस्तेष्वपि पुरा कर्मस्वविषयात्मिका।
सङ्कल्पाज्जायते प्रीतिर्या सा स्यादाभिमानिकी॥ ४१॥
२. आभिमानिकी प्रीति—पहले जिन कर्मों का अभ्यास न किया हो, उनमें संकल्पमात्र
से जो प्रीति उत्पन्न होती है, वह विषयों से उत्पन्न होने वाली प्रीति से भिन्न आभिमानिकी
कहलाती है॥ ४१॥