वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२. साम्प्रयोगिक अधिकरण ३१
तस्मात् पुरुषवदेव योषितोऽपि रसव्यक्तिर्द्रष्टव्या ॥ २३ ॥
वात्स्यायन का मत—इससे यही समझना चाहिये कि पुरुष के समान स्त्री को भी
समागम के अन्त में सुखानुभूति (स्खलन-सुख) होती है ॥ २३ ॥
कथं हि समानायामेवाकृतावेकार्थमभिप्रपन्नयोः कार्यवैलक्षण्यं
स्यात् ? ॥ २४ ॥
स्त्री-पुरुष के सुख की अभिन्नता—समान जाति और समान कार्य में संलग्न स्त्री-
पुरुष का सुख परस्पर भिन्न कैसे हो सकता है ? अर्थात् दोनों का सुख परस्पर अभिन्न ही
होगा ? ॥ २४ ॥
उपायवैलक्षण्यादभिमानवैलक्षण्याच्च ॥ २५ ॥
उपाय (स्थिति) और अनुभूति में भिन्नता होने से सुखानुभूति में भिन्नता हो सकती
हैं ॥ २५ ॥
कथम् ? उपायवैलक्ष्यं तु सर्गात् । कर्ता हि पुरुषोऽधिकरणं युवतिः । अन्यथा
हि कर्ता क्रियां प्रतिपद्यतेऽन्यथा चाधारः । तस्माच्चोपायवैलक्षण्यात् सर्गाद-
भिमानवैलक्षण्यमपि भवति । अभियोक्ताहमिति पुरुषोऽनुरज्यते । अभियुक्ता-
हमनेनेति युवतैरिति वात्स्यायनः ॥ २६ ॥
सुखानुभूति की अभिन्नता की स्थापना—स्थिति की भिन्नता तो प्राकृतिक है। पुरुष
कर्ता (मैथुन करने वाला) है और स्त्री अधिकरण या आधार (मैथुन कराने वाली)। कर्ता की
क्रिया, आधार की क्रिया से सदैव भिन्न होती है, इसलिये स्थिति और अनुभूति की भिन्नता से
व्यापार में कुछ भिन्नता अवश्य आयेगी। समागम करते समय पुरुष सोचता है कि मैं सम्भोग कर
रहा हूँ, और स्त्री सोचती है कि मैं सम्भोग करा रही हूँ, लेकिन दोनों की अनुभूति में कोई अन्तर
नहीं होता—यह महर्षि वात्स्यायन का मत है ॥ २६ ॥
तत्रैतत्स्यात्—उपायवैलक्षण्यवदेव हि कार्यवैलक्षण्यमपि कस्मान्न
स्यादिति ? तच्च न; हेतुमदुपायवैलक्षण्यम् । तत्र कर्त्राधारयोर्भिन्नलक्षणत्वाद-
हेतुमत्कार्यवैलक्षण्यमन्याय्यं स्यात् । आकृतेरभेदादिति ॥ २७ ॥
यदि आप कहें कि जब आप स्त्री-पुरुष की स्थिति और अनुभूति में भिन्नता मानते हैं, तो
उसकी सुखानुभूति में भी भिन्नता क्यों नहीं मान लेते ? तो हम उत्तर देते हैं कि ऐसा नहीं हो
सकता। उपाय के हेतुरूप स्त्री-पुरुष भिन्न भिन्न हैं, इसलिये कर्ता (पुरुष) और आधार (स्त्री)
के भिन्न होने से उनका व्यापार भी भिन्न होगा, किन्तु वे जिस रतिरूप कार्य को सिद्ध कर रहे हैं,
वह एक ही है, इसलिये दोनों को समान सुखानुभूति ही होगी ॥ २७ ॥
तत्रैतत्स्यात्—संहत्य कारकैरेकोऽर्थोऽभिनिर्वर्त्यते । पृथक्पृथक् स्वार्थ-
साधकौ पुनरिमौ तदयुक्तमिति ॥ २८ ॥
आपके कथन पर यह शङ्का होती है कि लोक में भिन्न कारक मिलकर एक काम को
करते हैं, लेकिन स्त्री-पुरुष तो भिन्न-भिन्न स्वार्थों को सिद्ध करते हैं, इसलिए वे समागमरूप
एक कार्य करते हैं—यह कहना युक्तिसङ्गत नहीं है ॥ २८ ॥