सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 62, कुल 248 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 62

३६ वात्स्यायन-कामसूत्र
पारिभाषिक शब्दों से अर्थ स्वतः विदित हो जाता है, अतएव इनकी परिभाषाएँ देने की
आवश्यकता भी नहीं है ॥ ७ ॥
सम्मुखागतायां प्रयोज्यायामन्यापदेशेन गच्छतो गात्रेण गात्रस्य स्पर्शनं
स्पृष्टकम् ॥ ८ ॥
स्पृष्टक—किसी बहाने से आती हुई नायिका के शरीर से अपने शरीर से अपने शरीर को
छुआ देना ही स्पृष्टक आलिङ्गन है ॥ ८ ॥
प्रयोज्यं स्थितमुपविष्टं वा विजने किञ्चिद् गृहती पयोधरेण विध्येत्।
नायकोऽपि तामवपीड्य गृह्णीयादिति विद्धकम् ॥ ९ ॥
विद्धक—नायिका भी जब एकान्त में खड़े या बैठे नायक को देखकर किसी वस्तु को
रखने या लेने के बहाने अपने स्तनों को उससे छुआ दे और नायक भी अनुराग समझकर उसे
कसकर दबावे—वह विद्धक आलिङ्गन है ॥ ९ ॥
तदुभयमनतिप्रवृत्तसंभाषणयोः ॥ १० ॥
स्पृष्टक और विद्धक आलिङ्गनों का प्रयोग तभी किया जाता है जब नायक और नायिका
दोनों के मध्य अधिक वार्तालाप न हो ॥ १० ॥
तमसि जनसंबाधे विजने वाथ शनकैर्गच्छतोर्नातिह्रस्वकालमुद्धर्षणं परस्परस्य
गात्राणामुद्घृष्टकम् ॥ ११ ॥
उद्घृष्टक—अन्धकार में, भीड़भरे स्थान में अथवा निर्जन स्थान में धीरे-धीरे चलते हुए
चिरकाल तक एक का शरीर दूसरे के शरीर से घर्षण करता रहे, तो उसे उद्घृष्टक कहते हैं ॥ ११ ॥
तदेव कुड्यसंदंशेन स्तम्भसंदंशेन वा स्फुटकमवपीडयेदिति पीडित-
कम् ॥ १२ ॥
पीडितक—वह उद्घृष्टक आलिङ्गन ही, यदि दीवार या स्तम्भ के सहारे हो, तो नायक
और नायिका, दोनों के शरीरों के परस्पर पीड़न के कारण पीड़ितक कहलाता है। अर्थात्
पीड़ितक आलिङ्गन में नायक और नायिका दीवार या स्तम्भ के सहारे एक-दूसरे के शरीर को
अच्छी तरह दबाते हैं ॥ १२ ॥
तदुभयमवगतपरस्पराकारयोः ॥ १३ ॥
उद्घृष्टक और पीड़ितक आलिङ्गन उन नायक-नायिकाओं के लिये है जो परस्पर प्रीति से
अवगत हों, लेकिन समागम न हुआ हो ॥ १३ ॥
लतावेष्टितकं वृक्षाधिरूढकं तिलतण्डुलकं क्षीरनीरकमिति चत्वारि
सम्प्रयोगकाले ॥ १४ ॥
सुरत के समय चार आलिङ्गन अधिक उपयुक्त रहते हैं—लतावेष्टितक, वृक्षाधिरूढक,
तिलतण्डुलक और क्षीरनीरक ॥ १४ ॥
लतेव शालमावेष्टयन्ती चुम्बनार्थं मुखमवनयेत्। उद्धृत्य मन्दसीत्कृता
तमाश्रिता वा किञ्चिद्रामणीयकं पश्येत्तल्लतावेष्टितकम् ॥ १५ ॥
१. लतावेष्टितक—जिस प्रकार लता शाल के वृक्ष से लिपटती है, उसी प्रकार नायिका