वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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प्रयोग होता है। मन्दवेग नायक-नायिकाओं में इनका सदैव प्रयोग नहीं होता, अर्थात् चण्डवेग
नायक-नायिका ही इसका नित्य प्रयोग कर सकते हैं ॥ २ ॥
तथा दशनच्छेद्यस्य सात्म्यवशाद्वा ॥ ३ ॥
नखक्षतों के समान, इन्हीं परिस्थितियों में, ही दन्तक्षतों का भी प्रयोग किया जाता है ॥ ३ ॥
तदाच्छुरितकमर्धचन्द्रो मण्डलं रेखा व्याघ्रनखं मयूरपदकं शशप्लुतक-
मुत्पलपत्रकमिति रूपतोऽष्टविकल्पम् ॥ ४ ॥
नखक्षत के आठ भेद—(१) आच्छुरितक, (२) अर्धचन्द्र, (३) मण्डल, (४) रेखा,
(५) व्याघ्रनख, (६) मयूरपदक, (७) शशप्लुतक और (८) उत्पलपत्रक ॥ ४ ॥
कक्षौ स्तनौ गलः पृष्ठं जघनमूरू च स्थानानि ॥ ५ ॥
नखक्षतों के वे स्थान—काँख, स्तन, ग्रीवा (गला), पीठ, जाँघें और ऊरु (जाँघों के
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